सारण में नई कृषि क्रांति
बिहार के छपरा जिले यानी सारण में खेती का स्वरूप धीरे धीरे बदल रहा है। अब यहां के किसान केवल पारंपरिक फसलों पर ही निर्भर नहीं रह गए हैं, बल्कि नई और नकदी फसलों को अपनाकर अपनी आमदनी में इजाफा कर रहे हैं। इसी कड़ी में किसान अब काली हल्दी की खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं। इस बदलाव की शुरुआत कृषि विज्ञान केंद्र मांझी के मार्गदर्शन और प्रशिक्षण से हुई है, जहाँ से किसानों को जैविक खेती की बारीकियां सिखाई जा रही हैं।
औषधीय गुणों से भरपूर है काली हल्दी
काली हल्दी का महत्व आम पीली हल्दी से काफी अलग है। इसका मुख्य उपयोग रसोई में सब्जी के तड़के के लिए नहीं होता, बल्कि बड़े पैमाने पर आयुर्वेदिक दवाएं और औषधियां बनाने में किया जाता है। यही कारण है कि बाजार में इसकी मांग हमेशा बनी रहती है और किसानों को इसकी अच्छी कीमत भी मिलती है। शारीरिक समस्याओं के उपचार में इस्तेमाल होने के कारण इसे एक विशेष औषधीय फसल माना जाता है।
खेती में खर्च न के बराबर
किसानों के लिए काली हल्दी की सबसे बड़ी खूबी इसका कम खर्चीला होना है। जो किसान इसे उगा रहे हैं, वे पूरी तरह से जैविक पद्धति का पालन करते हैं। इसमें रासायनिक खाद या कीटनाशकों पर पैसा खर्च करने की आवश्यकता नहीं होती है। घर पर तैयार की गई गोबर की खाद से ही इसकी पैदावार शानदार हो जाती है। इसे बगीचों में भी लगाया जा सकता है, क्योंकि इसे बहुत ज्यादा सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती है। काली हल्दी के लिए हल्की मिट्टी, पीली मिट्टी या सफेद मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है। फिलहाल सारण जिले के दिघवारा, मांझी, रिविलगंज और गरखा जैसे प्रखंडों में इसकी बड़े पैमाने पर खेती शुरू हो गई है।
पहचान और विशेषताएं
दिखने में काली हल्दी का पौधा सामान्य हल्दी जैसा ही होता है, लेकिन इसकी पहचान करने के लिए कुछ खास संकेत हैं। जब आप इसके कंद को तोड़ते हैं, तो इसमें से विक्स जैसी तीखी खुशबू आती है। इसका आंतरिक हिस्सा गाढ़े काले या नीले रंग का होता है, जो इसे दूसरी किस्मों से अलग करता है। यह अपनी विशिष्ट गंध और रंग के कारण ही औषधि निर्माण के क्षेत्र में काफी लोकप्रिय है।
किसानों का अनुभव और सुझाव
जलालपुर प्रखंड के सरगड्डी गांव के किसान अनिल कुमार भारती ने पहली बार काली हल्दी की खेती को आजमाया है। उनका कहना है कि सारण की जमीन इस फसल के लिए बहुत ही उपजाऊ साबित हो रही है। अनिल के अनुसार, इस फसल की सबसे अच्छी बात यह है कि इसे मवेशियों और आवारा पशुओं से कोई खतरा नहीं होता है। पशु इस फसल को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं, जिससे किसान को फसल की रखवाली का तनाव कम रहता है।
मुनाफा और बिक्री के रास्ते
अनिल बताते हैं कि दवा कंपनियों में इसकी निरंतर मांग बनी रहती है, जिससे बाजार में इसका भाव काफी अच्छा मिलता है। किसान इसे स्थानीय स्तर पर किसी भी आयुर्वेदिक दवा दुकान पर बेच सकते हैं। इसके अलावा आजकल ऑनलाइन प्लेटफार्म के माध्यम से भी काली हल्दी की बिक्री काफी आसान हो गई है। इसका बीज प्राप्त करने के लिए किसान कृषि विज्ञान केंद्र, मांझी से संपर्क कर सकते हैं, साथ ही यह बाजार में भी आसानी से मिल जाता है। कम निवेश में बंपर मुनाफा कमाने का यह तरीका आज जिले के अन्य किसानों के लिए भी एक नई राह बन रहा है।
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