श्रद्धा और आस्था का केंद्र पूर्णिया का मां कामाख्या मंदिर
जीवन में आने वाली बाधाओं और अधूरी इच्छाओं को पूरा करने के लिए लोग अक्सर विभिन्न धार्मिक स्थलों पर जाते हैं और ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। कई बार कड़ी मेहनत के बावजूद काम पूरे नहीं हो पाते, जिससे व्यक्ति मानसिक रूप से परेशान हो जाता है। ऐसे में पूर्णिया का मां कामाख्या मंदिर एक ऐसी पवित्र जगह के रूप में उभरा है, जहां भक्तों की अटूट आस्था है। यह मंदिर न केवल अपनी प्राचीनता के लिए जाना जाता है, बल्कि यहां होने वाली विशेष पूजा और अनुष्ठान के कारण भी प्रसिद्ध है।
700 साल से अधिक का गौरवशाली इतिहास
पूर्णिया जिले के के नगर प्रखंड के अंतर्गत मजरा पंचायत में स्थित यह मां कामाख्या मंदिर लगभग 700 साल से भी अधिक पुराना माना जाता है। इस मंदिर के साथ कई धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं का मानना है कि इस दिव्य स्थल पर आने वाला कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं लौटता। मंदिर के बारे में एक विशेष मान्यता यह भी प्रचलित है कि यहां आने वाले कुष्ठ रोगियों को कुछ ही महीनों के भीतर इस गंभीर बीमारी से राहत मिल जाती है।
हर मंगलवार को होता है विशेष अनुष्ठान
मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता मंगलवार को होने वाली पूजा है। माना जाता है कि असम स्थित मां कामाख्या का आशीर्वाद इस मंदिर में प्रत्यक्ष रूप से मिलता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, मां कामाख्या प्रतिदिन सुबह 8:00 बजे से लेकर शाम 4:00 बजे तक इस मंदिर में भक्तों के कल्याण के लिए विराजमान रहती हैं। प्रत्येक मंगलवार को यहां बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं और अपनी समस्याओं का समाधान ढूंढते हैं।
क्या है आज्ञापान की प्रक्रिया
मंदिर के पुजारी पंडित गौरी कांत झा और कमेटी के सदस्य भोला यादव व पवन कुमार झा बताते हैं कि इस मंदिर में मनोकामना पूरी करने के लिए एक विशेष प्रक्रिया अपनाई जाती है, जिसे आज्ञापान या मनोकामना पान कहा जाता है। यदि किसी भक्त को संतान की प्राप्ति की इच्छा हो, धन की समस्या हो, या बिगड़े हुए काम बनाने हों, तो वे इस रस्म के जरिए मां से अर्जी लगा सकते हैं।
- भक्तों को मंगलवार के दिन उपवास रखना होता है।
- मंदिर पहुंचकर विधिवत मां कामाख्या की पूजा-अर्चना करनी होती है।
- मंदिर ट्रस्ट द्वारा निर्धारित 25 रुपये का चंदा शुल्क जमा करना होता है।
- शुल्क जमा करने के बाद आज्ञापान की रसीद प्राप्त होती है।
मां कामाख्या के दरबार में अर्जी
रसीद कटवाने के बाद मंदिर परिसर में मौजूद पंडित जी भक्त की मनोकामना को मां कामाख्या के दरबार में रखते हैं। आज्ञापान की इस प्रक्रिया के माध्यम से मां से भक्त की इच्छा पूरी करने का आशीर्वाद मांगा जाता है। यह अनुष्ठान पूरी तरह से विश्वास और धैर्य पर आधारित है। मंदिर कमेटी के सदस्यों का कहना है कि जो भी व्यक्ति सच्चे मन और शुद्ध भावना के साथ मां के दरबार में आकर आज्ञापान का आशीर्वाद लेता है, उसे सकारात्मक परिणाम अवश्य प्राप्त होते हैं। यही कारण है कि दूर-दूर से लोग अपनी परेशानियां लेकर इस प्राचीन मंदिर में पहुंचते हैं।
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