सिनेमा टिकटों की 'ब्लैक मार्केटिंग' पर पटना के इस सबसे पुराने थिएटर ने कैसे लगाई थी लगाम? जानिए दिलचस्प इतिहास

पटना के ऐतिहासिक रिजेंट सिनेमा ने कभी टिकटों की कालाबाजारी रोकने के लिए किराना और मेडिकल दुकानों से टिकट बेचने का अनोखा फॉर्मूला निकाला था, जानिए यह पूरी कहानी।

भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक ऐसा दौर भी था, जब किसी लोकप्रिय फिल्म के रिलीज होते ही सिनेमाघरों के बाहर पैर रखने की जगह नहीं बचती थी। हाउसफुल का बोर्ड टंगते ही उन लोगों की चांदी हो जाती थी, जो सिनेमा टिकटों की कालाबाजारी यानी 'ब्लैकिंग' का अवैध कारोबार करते थे। बिहार की राजधानी पटना के सिनेमाघरों में भी यह खेल बड़े पैमाने पर खेला जाता था। दर्शक अपनी पसंदीदा फिल्म देखने के लिए निर्धारित कीमत से कई गुना अधिक पैसे देने को तैयार रहते थे। फिल्मों में दिखाए जाने वाले टिकट ब्लैकिंग के दृश्य असल जिंदगी का ही हिस्सा थे, जिससे निपटना सिनेमाघर संचालकों के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका था।

पटना के सबसे पुराने और ऐतिहासिक सिनेमाघर, रिजेंट सिनेमा ने इस समस्या से पार पाने के लिए कुछ ऐसे अनोखे और नायाब तरीके अपनाए थे, जिनकी कहानी आज भी लोगों को हैरान कर देती है। इस सिनेमाघर के प्रबंधन ने न केवल अपने स्तर पर स्थानीय स्तर पर क्रांतिकारी कदम उठाए, बल्कि सरकार के साथ मिलकर इस समस्या की जड़ पर प्रहार करने की कोशिश भी की थी।

टिकटों की कालाबाजारी के पीछे की असली वजह

साल 1929 में स्थापित हुए बिहार के पहले सिनेमाघर रिजेंट सिनेमा के डायरेक्टर ईशान सिन्हा ने इस पूरी व्यवस्था और इसके पीछे की कहानी को बेहद करीब से समझाया है। उन्होंने बताया कि आम लोगों के बीच अक्सर यह गलत धारणा रहती थी कि टिकटों की ब्लैकिंग में सिनेमाघर मालिकों की भी मिलीभगत होती है, जबकि हकीकत इसके बिल्कुल उलट थी।

इस पूरी समस्या को समझने के लिए हमें आजादी के बाद के उस दौर में जाना होगा जब देश नया-नया आजाद हुआ था। उस समय सिनेमा मनोरंजन का एकमात्र साधन नहीं था, बल्कि यह समाज तक कोई बड़ा संदेश पहुंचाने का सबसे सशक्त माध्यम भी था। तत्कालीन सरकारें चाहती थीं कि सामाजिक संदेशों से भरपूर ये फिल्में देश के हर गरीब और मध्यमवर्गीय नागरिक तक पहुंचें। सरकार का मानना था कि अगर टिकटों के दाम बहुत अधिक होंगे, तो आम जनता फिल्मों से वंचित रह जाएगी। इसी सोच के तहत सरकार ने सिनेमा टिकटों की दरों को अपने नियंत्रण में रखा था और सिनेमाघर मालिकों को अपनी मर्जी से दाम बढ़ाने की अनुमति नहीं थी।

मांग और आपूर्ति का खेल

ईशान सिन्हा ने इसे एक बहुत ही सीधे उदाहरण के जरिए समझाया है। मान लीजिए कि कोई बड़ी और बहुप्रतीक्षित फिल्म रिलीज हुई है, जिसे देखने के लिए शहर के करीब 1 लाख लोग उत्सुक हैं। लेकिन सिनेमाघर में सीटों की संख्या सीमित होने के कारण केवल 1 हजार टिकट ही उपलब्ध हैं। जब मांग इतनी अधिक हो और आपूर्ति बेहद कम, तो वहां कालाबाजारी की गुंजाइश अपने आप बन जाती है।

चूंकि सिनेमाघर मालिक सरकारी नियमों के कारण टिकटों के दाम नहीं बढ़ा सकते थे, इसलिए कुछ असामाजिक तत्वों ने इसे कमाई का जरिया बना लिया। वे कतारों में लगकर तय सरकारी दरों पर टिकट खरीद लेते थे और फिर जरूरतमंद दर्शकों को वही टिकट कई गुना ज्यादा कीमतों पर बेच देते थे। इस तरह सिनेमाघरों के बाहर ब्लैक मार्केटिंग का एक समानांतर और अवैध बाजार खड़ा हो गया था, जिसका सीधा नुकसान दर्शकों और सिनेमाघर संचालकों दोनों को हो रहा था।

जब नीतीश सरकार ने लिया ऐतिहासिक फैसला

इस समस्या से तंग आकर सिनेमाघर मालिकों ने संगठित होकर सरकार के सामने अपनी बात रखने का फैसला किया। साल 2007-08 के दौरान बिहार में नीतीश कुमार की सरकार थी और सुशील कुमार मोदी राज्य के वित्त मंत्री का कार्यभार संभाल रहे थे। सिनेमाघर संचालकों के एक प्रतिनिधिमंडल ने उनसे मुलाकात की और इस व्यावहारिक समस्या को उनके सामने रखा।

सिनेमाघर मालिकों का तर्क बेहद स्पष्ट था:

  • सिनेमाघरों को सरकार द्वारा तय की गई कम दरों के हिसाब से ही कमाई हो रही है।
  • सरकार को भी उसी निर्धारित दर पर मनोरंजन कर (टैक्स) मिल रहा है।
  • इन सबके बावजूद, जिस आम जनता के लिए टिकट सस्ते रखे गए हैं, उन्हें वे टिकट सस्ते दामों पर मिल ही नहीं रहे हैं।
  • सस्ते टिकटों का पूरा फायदा बीच के बिचौलिए और ब्लैक करने वाले उठा रहे हैं, जो बिना किसी टैक्स के सीधे मोटी कमाई कर रहे हैं।

तत्कालीन नीतीश सरकार ने इस तार्किक बात को गहराई से समझा और सिनेमा उद्योग को बचाने के लिए एक बड़ा कदम उठाया। सरकार ने सिनेमाघर मालिकों को मांग और स्थिति के अनुसार खुद टिकटों की दरें तय करने की छूट दे दी। इस फैसले का असर बाजार पर बहुत जल्द दिखने लगा और साल 2009 तक आते-आते टिकटों की कालाबाजारी पर काफी हद तक लगाम लग गई।

रिजेंट सिनेमा का किराना और मेडिकल स्टोर वाला फॉर्मूला

सरकारी नीति में बदलाव से पहले भी रिजेंट सिनेमा ने अपने स्तर पर टिकट ब्लैकिंग को रोकने के लिए कई बेहतरीन और देसी जुगाड़ अपनाए थे। साल 1999-2000 के आसपास, रिजेंट सिनेमा के वर्तमान मैनेजिंग डायरेक्टर सुमन सिन्हा ने एक बेहद अभिनव प्रयोग किया था, जिसकी चर्चा पूरे शहर में हुई थी।

उस दौर में रिजेंट सिनेमा ने अपनी फिल्मों के टिकट बेचने के लिए पटना के विभिन्न रिहायशी इलाकों की प्रसिद्ध दुकानों के साथ साझेदारी की थी। वीकेंड के शोज के टिकट केवल सिनेमाघर के काउंटर पर ही नहीं मिलते थे, बल्कि लोगों के मोहल्ले की किराना दुकानों और प्रमुख मेडिकल स्टोर पर भी उपलब्ध कराए जाते थे। इस अनोखे कदम के पीछे मुख्य उद्देश्य यह था कि दर्शकों को टिकट खरीदने के लिए सिनेमाघर के काउंटर तक आने की जरूरत ही न पड़े। जब दर्शक अपने घर के पास ही आसानी से टिकट खरीद सकेंगे, तो वे थिएटर के बाहर सक्रिय ब्लैक करने वालों के चंगुल में नहीं फंसेंगे।

इसके साथ ही, रिजेंट सिनेमा ने निम्नलिखित उपाय भी लागू किए थे:

  • अग्रिम बुकिंग की शुरुआत: दर्शकों को शो के दिन ही नहीं, बल्कि कई दिन पहले से अपनी पसंदीदा सीटों को बुक करने की सुविधा दी गई।
  • एकमुश्त टिकटों की खरीद पर पाबंदी: एक ही व्यक्ति को बड़ी संख्या में टिकट देने पर सख्त रोक लगाई गई, ताकि कोई भी असामाजिक तत्व थोक में टिकट खरीदकर उन्हें बाहर महंगे दामों पर न बेच सके।

डिजिटल युग ने किया कालाबाजारी का हमेशा के लिए अंत

आज के आधुनिक और डिजिटल युग में टिकटों की कालाबाजारी का पुराना दौर पूरी तरह से इतिहास बन चुका है। अब सिनेमा टिकटों की कीमतें गतिशील (डायनेमिक) होती हैं, जो मांग और समय के अनुसार बदलती रहती हैं। ऐसे में कालाबाजारी करने वालों के लिए मुनाफा कमाने की गुंजाइश ही खत्म हो गई है।

इसके अलावा, इंटरनेट और मोबाइल क्रांति ने इस खेल को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है। आज बाजार में कई तरह के मोबाइल एप्लिकेशन और ऑनलाइन टिकट बुकिंग वेबसाइट उपलब्ध हैं, जिनकी मदद से दर्शक घर बैठे ही अपनी मनपसंद सीट चुनकर टिकट बुक कर लेते हैं। वर्तमान में स्थिति यह है कि सिनेमाघरों के काउंटरों की तुलना में अधिकांश टिकटों की बुकिंग ऑनलाइन माध्यमों से ही की जाती है। तकनीक के इस हस्तक्षेप ने उस काली छाया को हमेशा के लिए मिटा दिया है, जो कभी सिनेमा देखने के आनंद को फीका कर देती थी।

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