शत्रुघ्न सिन्हा जन्मदिन विशेष: लालकृष्ण आडवाणी के प्रति अटूट निष्ठा की क्या वाकई भारी कीमत चुकानी पड़ी थी उन्हें?

फिल्म अभिनेता से राजनेता बने शत्रुघ्न सिन्हा के जन्मदिन के अवसर पर रशीद किदवई का विशेष लेख, जो उनके राजनीतिक उतार-चढ़ाव और आडवाणी के प्रति उनकी निष्ठा के सियासी परिणामों पर प्रकाश डालता है।

जन्मदिन पर विशेष चर्चा

हिंदी सिनेमा के धाकड़ कलाकार और तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शत्रुघ्न सिन्हा आज 15 जुलाई को अपना जन्मदिन मना रहे हैं। अपने बेबाक अंदाज और दमदार आवाज के लिए मशहूर सिन्हा न केवल फिल्मी पर्दे पर अपने अभिनय के लिए जाने जाते हैं, बल्कि भारतीय राजनीति में उनके सफर के कई अनछुए पहलू भी रहे हैं। जयप्रकाश नारायण के क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित होकर सियासत में आए शत्रुघ्न सिन्हा का राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव और सिद्धांतों के प्रति वफादारी की कहानियों से भरा पड़ा है। आज वे जीवन के एक ऐसे पड़ाव पर हैं, जहां उनका राजनीतिक भविष्य कई चुनौतियों से घिरा है। उनकी वर्तमान पार्टी, तृणमूल कांग्रेस से कई बड़े नेता किनारा कर चुके हैं, लेकिन शॉटगन के नाम से मशहूर सिन्हा अब भी मजबूती से अपनी पार्टी और नेता ममता बनर्जी के साथ खड़े हैं।

आडवाणी के प्रति वफादारी और सियासी दूरी

शत्रुघ्न सिन्हा की पहचान राजनीति में हमेशा से एक ऐसे व्यक्ति की रही है जो अपनी निष्ठाओं से कभी समझौता नहीं करता। भारतीय जनता पार्टी में रहते हुए उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के प्रति जो सम्मान दिखाया, वह जगजाहिर है। विशेष रूप से मोदी युग की शुरुआत के बाद भी वे लालकृष्ण आडवाणी के प्रति पूरी तरह वफादार बने रहे। हालांकि, सिन्हा का यह गुण उनके लिए फायदे के बजाय नुकसान का सौदा साबित हुआ। मई 2014 में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली पहली कैबिनेट ने शपथ ग्रहण की, तो उसमें शत्रुघ्न सिन्हा का नाम कहीं नहीं था। पार्टी के भीतर के कई जानकार मानते हैं कि मोदी और सिन्हा के बीच बढ़ती हुई इस खाई की मुख्य वजह आडवाणी के साथ उनकी नजदीकी थी। सिन्हा ने भी इस बात को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि आडवाणी के प्रति अपनी निष्ठा के कारण उन्हें राजनीतिक हाशिए पर डाल दिया गया और उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। यही वह सिलसिला था, जिसकी परिणति साल 2019 में उनके भाजपा छोड़ने के निर्णय के रूप में हुई।

सत्ता की परिपाटी तोड़ने वाले पहले स्टार

भारतीय सिनेमा के इतिहास में शत्रुघ्न सिन्हा एक अपवाद की तरह रहे हैं। अगर हम उस दौर के अन्य बड़े अभिनेताओं जैसे सुनील दत्त, अमिताभ बच्चन या राजेश खन्ना को देखें, तो वे सभी अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत उस पार्टी के साथ कर रहे थे, जो उस समय सत्ता के शीर्ष पर थी। लेकिन शत्रुघ्न सिन्हा ने लीक से हटकर रास्ता चुना और सत्तारूढ़ दल के बजाय विपक्षी राजनीति का दामन थामा। यह उनका सत्ता विरोधी रुख अचानक नहीं आया था, बल्कि इसके पीछे साल 1975 में जयप्रकाश नारायण द्वारा किए गए 'संपूर्ण क्रांति' के आह्वान का गहरा प्रभाव था। जेपी के सिद्धांतों ने उनके भीतर सत्ता की खामियों के खिलाफ लड़ने का जज्बा पैदा किया था। यही कारण था कि 1990 के दशक में जब उन्होंने औपचारिक राजनीति में कदम रखा, तो उन्होंने कांग्रेस के बजाय गैर-कांग्रेसी मोर्चे को चुना। हालांकि वे हिंदुत्ववादी विचारधारा के कट्टर समर्थक नहीं थे, फिर भी वाजपेयी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर वे भाजपा में शामिल हो गए। वे पहले ऐसे फिल्म स्टार बने, जिन्होंने केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री के पद को सुशोभित किया। उन्होंने साल 2002 से 2004 के दौरान केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री और बाद में जहाजरानी मंत्री के रूप में देश की सेवा की।

प्रतिद्वंद्वियों के प्रति आदर का भाव

शत्रुघ्न सिन्हा की राजनीति का एक सबसे दिलचस्प और मानवीय पक्ष यह है कि उन्होंने विचारधाराओं के मतभेदों को कभी व्यक्तिगत दुश्मनी में नहीं बदलने दिया। वे भाजपा में रहकर भी विपक्ष के दिग्गज नेताओं की प्रशंसा करने से नहीं हिचकिचाते थे। सुनील दत्त को वे सदैव अपने बड़े भाई के समान मानते थे। साल 1992 का वाकया इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जब भाजपा ने नई दिल्ली लोकसभा सीट के उपचुनाव में उन्हें राजेश खन्ना के खिलाफ उतारा था। एक तरफ उन्होंने मंच से अपनी पार्टी के लिए चुनाव प्रचार किया, लेकिन दूसरी तरफ उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी राजेश खन्ना के खिलाफ एक भी अभद्र शब्द नहीं बोला। वर्षों बाद उन्होंने स्वीकार किया कि राजेश खन्ना के खिलाफ लड़ना उनके राजनीतिक जीवन का सबसे अफसोसजनक फैसला था। उन्होंने इसके लिए कई बार माफी भी मांगी और यह स्पष्ट किया कि वे अपने गुरु लालकृष्ण आडवाणी को मना नहीं कर सके थे, वरना वे कभी भी सक्रिय राजनीति की शुरुआत उपचुनाव से नहीं करना चाहते थे।

सोनिया गांधी से मुलाकात और अटकलें

सिन्हा के राजनीतिक जीवन में कई बार कांग्रेस के साथ उनकी नजदीकियों की खबरें भी उड़ीं। एक बार जब वे कमलनाथ के साथ सोनिया गांधी के घर मुलाकात के लिए पहुंचे, तो राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई। बाद में सामने आया कि यह कोई राजनीतिक बैठक नहीं थी, बल्कि सोनिया गांधी द्वारा आयोजित एक इफ्तार पार्टी का हिस्सा थी। उस दौरान शत्रुघ्न सिन्हा ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी से जुड़ी कुछ बेहद भावुक यादें साझा की थीं, जिससे प्रभावित होकर सोनिया गांधी ने उन्हें चाय पर आमंत्रित किया था। इस शिष्टाचार मुलाकात को मीडिया ने राजनीतिक रंग दे दिया। दिसंबर 2016 में बेंगलुरु लिटरेरी फेस्टिवल में भी उन्होंने खुले दिल से माना कि वे व्यक्तिगत रूप से सोनिया गांधी की बहुत सराहना करते हैं। अंततः, भाजपा से मोहभंग के बाद उन्होंने कांग्रेस का हाथ थामा, लेकिन वहां भी वे ज्यादा समय तक टिक नहीं सके और अंततः तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए। आज जन्मदिन के मौके पर शत्रुघ्न सिन्हा का सफर यह सिखाता है कि राजनीति में निष्ठा और सिद्धांतों की अपनी एक कीमत होती है, जिसे केवल कुछ ही राजनेता चुकाने का साहस रखते हैं।

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