सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और केंद्र का पक्ष
देश के शैक्षणिक ढांचे में बड़े बदलाव लाने वाली नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP) 2020 के अंतर्गत थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी के क्रियान्वयन को लेकर विवाद गहरा गया है। इस नीति के बचाव में केंद्र सरकार, सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ सेकेंडरी एजुकेशन (CBSE) और नेशनल काउंसिल ऑफ़ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। इन संस्थाओं का तर्क है कि बहुभाषी शिक्षा और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के लिए यह व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है। केंद्र और संबंधित बोर्डों ने स्पष्ट रूप से अदालत से आग्रह किया है कि इस पॉलिसी को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया जाए।
कानूनी लड़ाई और अदालती निर्देश
इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान केंद्र, CBSE और NCERT को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने इन संस्थानों को 10 दिनों के भीतर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। यह विवाद मुख्य रूप से उस नीति के इर्द-गिर्द घूम रहा है, जिसके तहत कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य किया गया है, जिनमें से दो भाषाएं भारतीय होना जरूरी है। इस मामले की अगली सुनवाई 29 जुलाई को निर्धारित की गई है। इस दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी.मोहना भी पीठ का हिस्सा रहेंगे।
शिक्षा मंत्रालय का तर्क
शिक्षा मंत्रालय ने अपने हलफनामे में जोर देकर कहा है कि थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी का क्रियान्वयन शिक्षा के क्षेत्र में लाए जा रहे व्यापक सुधारों का एक अभिन्न अंग है। मंत्रालय के अनुसार, नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क फॉर स्कूल एजुकेशन (NCFSE) 2023 में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि कक्षा 6 से 10 तक के छात्रों को तीन भाषाओं का अध्ययन करना चाहिए। इनमें से कम से कम दो भाषाएं भारत की मूल भाषाएं होनी अनिवार्य हैं, ताकि छात्रों में भाषाई विविधता और भाषाई कौशल का विकास हो सके।
अभिभावकों और शिक्षकों की चिंताएं
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील आनंद ग्रोवर और गोपाल शंकरनारायणन ने व्यावहारिक कठिनाइयों का मुद्दा उठाया। उन्होंने तर्क दिया कि बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के छात्रों पर भाषाओं का बोझ डालना शिक्षा के अधिकार (RTE) अधिनियम की भावना के विरुद्ध है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी स्कूल में संस्कृत के शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं और वहां पंजाबी पढ़ाने का आदेश दे दिया जाता है, तो इसके लिए शिक्षक कहां से आएंगे? इसके अलावा, पाठ्यपुस्तकों की भारी किल्लत एक बड़ी समस्या बनी हुई है। एक राज्य का उदाहरण देते हुए बताया गया कि 22 भाषाओं के पाठ्यक्रम के लिए किताबें उपलब्ध होनी चाहिए थीं, लेकिन वर्तमान में केवल 3 भाषाओं की ही किताबें मिल पा रही हैं।
बुनियादी ढांचे और अचानक बदलाव पर सवाल
वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अदालत के समक्ष एक बड़ा सवाल खड़ा किया। उन्होंने कहा कि जो छात्र अब तक अंग्रेजी और फ्रेंच जैसी विदेशी भाषाओं के साथ अपनी पढ़ाई कर रहे थे, उन पर अचानक 14 वर्ष की आयु में तमिल जैसी नई भाषा सीखने का दबाव डालना अव्यावहारिक है। सवाल यह है कि अचानक आए इस बदलाव के लिए स्कूलों के पास न तो पर्याप्त शिक्षक हैं और न ही जरूरी बुनियादी ढांचा। उन्होंने बताया कि CBSE के हालिया परिपत्र के अनुसार, आने वाले शैक्षणिक सत्र से छात्रों के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य किया गया है। यह सर्कुलर 1 जुलाई से प्रभावी माना जा रहा है, जिससे देशभर के छात्रों और स्कूलों के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है। अब देखना यह होगा कि अगली सुनवाई में सरकार इन समस्याओं का क्या समाधान पेश करती है।
https://www.indiatv.in/india/national/3-language-policy-phased-sc-issue-notice-to-center-cbse-ncert-2026-07-14-1231188