अमेठी में मनरेगा का संकट
उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम यानी मनरेगा योजना इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। जिन मजदूरों के लिए यह योजना आजीविका का बड़ा जरिया मानी जाती थी, आज वही मजदूर अपनी ही मेहनत के पैसे के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। सरकारी फाइलों में दर्ज मजदूरों की मेहनत का पैसा अधिकारियों की सुस्ती और बजट के अभाव के कारण अधर में लटका हुआ है।
47 करोड़ रुपये का भारी बकाया
अमेठी जिले की कुल 4 तहसीलों और उसके अंतर्गत आने वाले 13 ब्लॉकों में मनरेगा मजदूरों की स्थिति काफी दयनीय हो गई है। आंकड़ों के अनुसार, इन ब्लॉकों में मजदूरों की मजदूरी का लगभग 47 करोड़ रुपये का भुगतान बकाया है। भीषण गर्मी और कड़ाके की धूप में दिन भर हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद भी जब जेब खाली रहती है, तो इन मजदूरों का भरोसा व्यवस्था से उठने लगता है।
दफ्तरों के चक्कर काट रहे मजदूर
अपनी बकाया मजदूरी की मांग को लेकर मजदूर लगातार ब्लॉक, तहसील और विकास भवन के चक्कर काट रहे हैं। काम पूरा करने के बाद भी भुगतान न होने से परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल हो गया है। मजदूरों का कहना है कि उन्होंने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया है, लेकिन अब उन्हें अपने ही पैसे पाने के लिए अधिकारियों की मिन्नतें करनी पड़ रही हैं।
जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी
इस पूरे मामले पर जब अधिकारियों से सवाल किया गया, तो उनका जवाब बेहद सीमित रहा। जिम्मेदार अधिकारी केवल बजट न होने का हवाला देकर पल्ला झाड़ते नजर आ रहे हैं। महीनों से भुगतान न होने के कारण अब मजदूरों का मनरेगा योजना से मोहभंग होता जा रहा है। सबसे निराशाजनक बात यह है कि इस गंभीर मुद्दे पर जिले के जिम्मेदार अधिकारी कैमरे के सामने कुछ भी बोलने से पूरी तरह कतरा रहे हैं, जिससे मजदूरों की परेशानी और अधिक बढ़ गई है।
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