28 साल से डॉक्टर बनकर घूम रहा था शख्स, 10 करोड़ के घोटाले में गिरफ्तारी से खुला बड़ा राज

मुंबई क्राइम ब्रांच ने एक 50 वर्षीय व्यक्ति को गिरफ्तार किया है जो पिछले 28 वर्षों से फर्जी डॉक्टर बनकर रह रहा था और करीब 10 करोड़ रुपये के CSR फंड घोटाले में लिप्त था।

फर्जीवाड़े का पर्दाफाश

मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने एक ऐसे व्यक्ति को हिरासत में लिया है जिसने पिछले करीब 28 वर्षों तक समाज को अपनी फर्जी पहचान के जरिए गुमराह किया। 50 वर्षीय यह व्यक्ति खुद को डॉ. धर्मेंद्र कुमार बताकर प्रैक्टिस कर रहा था। पुलिस की गिरफ्त में आने के बाद जब इस शख्स के अतीत की परतें खुलीं, तो जांच अधिकारी भी हैरान रह गए। केवल डॉक्टर का चोला ओढ़कर घूमना ही इसका मकसद नहीं था, बल्कि पुलिस को संदेह है कि इसने अपनी इस फर्जी पहचान का इस्तेमाल करके लगभग 10 करोड़ रुपये के CSR फंड घोटाले को अंजाम दिया है। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस अब इस बात की जांच कर रही है कि यह नेटवर्क केवल मुंबई तक सीमित है या इसके तार अन्य राज्यों तक भी फैले हुए हैं।

गुप्त सूचना के बाद कार्रवाई

इस पूरे मामले की शुरुआत एक गुप्त सूचना के साथ हुई। मुंबई क्राइम ब्रांच की यूनिट-1 को खबर मिली थी कि शहर में एक व्यक्ति जाली दस्तावेजों और नकली पहचान पत्रों के माध्यम से खुद को मेडिकल पेशेवर के रूप में पेश कर रहा है। इस सूचना को गंभीरता से लेते हुए क्राइम ब्रांच ने जाल बिछाया और 50 वर्षीय आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। शुरुआती पूछताछ में आरोपी ने खुद को डॉक्टर बताने की कोशिश की, लेकिन जब पुलिस ने उससे जुड़े दस्तावेजों और प्रमाणपत्रों की पड़ताल की, तो एक के बाद एक फर्जीवाड़े सामने आने लगे। यह मामला केवल एक व्यक्ति के ढोंग का नहीं, बल्कि एक बड़े आर्थिक अपराध से जुड़ा हुआ दिखाई दे रहा है।

क्या बरामद हुआ आरोपी के पास?

पुलिस की तलाशी में आरोपी के पास से बड़ी संख्या में संदिग्ध दस्तावेज बरामद किए गए हैं। इनमें प्रमुख रूप से 'डॉ. धर्मेंद्र कुमार' के नाम से बना पहचान पत्र, पैन कार्ड और विजिटिंग कार्ड शामिल हैं। इसके अलावा, उसे अलग-अलग संस्थानों द्वारा जारी किए गए प्रमाण पत्र भी मिले हैं। हैरानी की बात यह है कि आरोपी के पास से चिकित्सा उपकरणों और इलाज से संबंधित सामग्री भी मिली है। अब पुलिस के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह व्यक्ति वास्तव में मरीजों का इलाज कर रहा था और यदि हाँ, तो उसने पिछले 28 वर्षों में किन-किन लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ किया है। पुलिस उन मरीजों और चिकित्सा संबंधी संपर्कों की सूची तैयार कर रही है जो आरोपी के संपर्क में रहे थे।

बैंक खातों और दस्तावेजों का जाल

जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपी ने नकली पहचान का उपयोग करके कई बैंक खाते खोले थे। पुलिस का आरोप है कि इन बैंक खातों का इस्तेमाल अवैध रूप से फंड के लेनदेन और गबन के लिए किया जाता था। क्राइम ब्रांच अब इन सभी खातों का फॉरेंसिक ऑडिट करवा रही है ताकि यह पता चल सके कि पैसा कहाँ से आया और कहाँ ट्रांसफर किया गया। यह भी जांच की जा रही है कि फर्जी दस्तावेजों को तैयार करने में किन लोगों ने उसकी मदद की थी और बैंक में खाता खोलने के दौरान नियमों की अनदेखी कैसे हुई।

फ्लैट की तलाशी में मिले घोटाले के सबूत

आरोपी के फ्लैट की तलाशी के दौरान पुलिस को रिकॉर्ड्स का एक बड़ा जखीरा मिला है, जिसमें कई प्रोजेक्ट रिपोर्ट्स और महत्वपूर्ण फाइलें शामिल हैं। पुलिस सूत्रों के अनुसार, इन फाइलों में केवल महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि भारत के अन्य राज्यों की कंपनियों और संस्थाओं के नाम भी दर्ज हैं। इससे संकेत मिलता है कि आरोपी का नेटवर्क काफी फैला हुआ था। यहीं से जांच का रुख CSR फंड घोटाले की तरफ मुड़ गया, क्योंकि उन फाइलों में बड़ी वित्तीय अनियमितताओं के स्पष्ट संकेत मौजूद थे।

3 साल में 10 करोड़ का गबन?

जांच में सबसे चौंकाने वाला खुलासा कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी यानी CSR फंड को लेकर हुआ है। शुरुआती अनुमानों के अनुसार, पिछले 3 वर्षों के भीतर आरोपी और उसके साथियों ने मिलकर लगभग 10 करोड़ रुपये का गबन किया है। आरोपी ने खुद को डॉक्टर और समाज सुधारक के रूप में पेश करके कंपनियों को CSR फंड देने के लिए राजी किया, लेकिन उस पैसे को नेक काम में लगाने के बजाय अपने निजी खातों में स्थानांतरित कर लिया। पुलिस फिलहाल यह पता लगाने में जुटी है कि इस पूरी राशि का अंतिम गंतव्य क्या था और इसमें कौन-कौन से अन्य लोग या संस्थान शामिल थे। यह जांच अब एक व्यापक दिशा ले चुकी है और आने वाले दिनों में और भी गिरफ्तारियां होने की संभावना जताई जा रही है।

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