पटना का गौरव: सौ साल की सिनेमाई विरासत
वक्त की तेज रफ्तार के साथ पटना शहर पूरी तरह बदल चुका है, लेकिन गांधी मैदान के नजदीक स्थित रिजेंट सिनेमा अपनी ऐतिहासिक पहचान को आज भी मजबूती से थामे हुए है। यह केवल एक सिनेमाघर नहीं, बल्कि बिहार के सिनेमाई इतिहास का सबसे बड़ा गवाह है। करीब 100 साल पुराना यह थिएटर तब का है जब फिल्मों में संवाद नहीं हुआ करते थे और आज यह 3D तकनीक और लेजर प्रोजेक्टर के साथ नई पीढ़ी को मनोरंजन का आधुनिक अनुभव दे रहा है। मल्टीप्लेक्स की चकाचौंध के बीच भी रिजेंट सिनेमा ने अपनी एक अलग पहचान और साख को बरकरार रखा है।
शुरुआत और पैलेस ऑफ वैरायटीज का किस्सा
इस ऐतिहासिक सिनेमाघर की नींव रिजेंट सिनेमा के मौजूदा मैनेजिंग डायरेक्टर सुमन सिन्हा के दादाजी, स्वर्गीय कैलाश बिहारी सिन्हा ने 1929 में रखी थी। इस सिनेमाघर को स्थापित करने से पहले उन्होंने बाकायदा एक शोध किया था। उन्होंने पटना के लेडी स्टीफेंस हॉल को 8 महीने के लिए किराए पर लिया ताकि यह समझ सकें कि बिहार के दर्शक फिल्मों के प्रति कितने उत्सुक हैं। उस दौर में वहां साइलेंट फिल्में दिखाई जाती थीं। वहां से मिले शानदार रिस्पॉन्स के बाद उन्होंने गांधी मैदान के पास जमीन ली और 1928 में निर्माण कार्य शुरू करवाया। 1929 तक यह बनकर तैयार हो गया और इसमें पहली फिल्म के तौर पर रूसी फिल्म बैटलशिप पोटेमकिन प्रदर्शित की गई थी। उस वक्त भारत में फिल्मों का निर्माण बहुत कम होता था, इसलिए इस हॉल का नाम पैलेस ऑफ वैरायटीज रखा गया था। यहां फिल्में कम और सांस्कृतिक कार्यक्रम, जैसे नाटक, डांस और ड्रामा ज्यादा होते थे। प्रसिद्ध अभिनेता पृथ्वीराज कपूर भी अपनी टीम के साथ यहां परफॉर्म कर चुके हैं। यहां तक कि देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भी यहां फिल्म का लुत्फ उठाया था। लोग हंसी-मजाक में इसे पैलेस ऑफ भरभररैयटीज भी कहा करते थे।
चौथी पीढ़ी संभाल रही है विरासत
रिजेंट सिनेमा का प्रबंधन आज भी उसी परिवार के हाथों में है जिसने इसकी शुरुआत की थी। यह इस परिवार की चौथी पीढ़ी है जो इस विरासत को पूरी निष्ठा से आगे बढ़ा रही है। सुमन सिन्हा के बेटे इशान सिन्हा और उनकी बेटी वर्तमान में इस थिएटर के डायरेक्टर के तौर पर काम देख रहे हैं। 100 साल के सफर में उन्होंने आधुनिकता और परंपरा के बीच एक बेहतरीन संतुलन बनाया है। 1980 में पहली बार इस इमारत का रेनोवेशन किया गया था। सुमन सिन्हा याद करते हैं कि उस समय फिल्म गंगाधाम लगी हुई थी और दर्शकों की इतनी भारी भीड़ थी कि फिल्म 25 हफ्ते तक लगातार चली, जिस कारण रेनोवेशन का काम एक साल तक टालना पड़ा था। आज जो इमारत दिखाई देती है, वह 1980 के उस पुनर्निर्माण के बाद की ही है।
तकनीक और बड़े पर्दे का जादू
भले ही आज शहर में कई मल्टीप्लेक्स खुल गए हों, लेकिन रिजेंट सिनेमा आज भी अपनी यूएसपी के कारण दर्शकों की पहली पसंद बना हुआ है। इसका मुख्य आकर्षण इसका 52×22 फीट का विशाल पर्दा है, जो पूरे बिहार में सबसे बड़ा है। थिएटर प्रबंधन का कहना है कि वे इस बड़े पर्दे की खासियत को कभी नहीं बदलेंगे। तकनीकी मोर्चे पर भी यह हॉल हमेशा सबसे आगे रहा है। जब देश में पहली बार डॉल्बी एटमॉस साउंड सिस्टम आया, तो रिजेंट उसे अपनाने वाला देश का पहला सिनेमाघर था। 3D सिस्टम के मामले में यह देश का तीसरा और हाल ही में लगाए गए लेजर प्रोजेक्टर के मामले में यह भारत का चौथा सिनेमाघर बना है।
आम जनता के लिए सिनेमा
सुमन सिन्हा का मानना है कि सिनेमा का मतलब केवल मुनाफा कमाना नहीं है, बल्कि आम लोगों को एक सस्ता और अच्छा मनोरंजन उपलब्ध कराना है। आज के दौर में जब टिकटें बहुत महंगी हो गई हैं, रिजेंट में टिकट की कीमत 120, 130 और 140 रुपये के बीच रखी गई है। शुरुआती दौर की बात करें तो तब टिकट की दरें एक आना, दो आना, तीन आना और चार आना हुआ करती थीं। उस वक्त बाहर टेबल लगाकर टिकट काटे जाते थे। पहले इस थिएटर की क्षमता 735 सीटों की थी, जो रेनोवेशन के बाद 1,166 तक पहुंच गई थी, लेकिन अब व्यावसायिक उपयोग के कारण वर्तमान में दो मंजिलों पर करीब 616 सीटें उपलब्ध हैं। इस सिनेमाघर की प्राथमिकता हमेशा से परिवार रहे हैं। यही कारण है कि यहां खाने-पीने से लेकर टिकट तक की कीमतें किफायती रखी जाती हैं, ताकि समाज के हर वर्ग के लोग एक साथ बैठकर फिल्म देख सकें।
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