धान की खेती में क्रांतिकारी बदलाव लाएगी 'चोपी' तकनीक, कम खर्च में बंपर मुनाफे का तरीका

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में किसान अब पारंपरिक चोपी खेती तकनीक को अपनाकर अपनी आय बढ़ा रहे हैं। यह विधि कम लागत और कम पानी में भी बेहतर उत्पादन सुनिश्चित करने में सक्षम है।

खेती के लिए नया मंत्र बनी चोपी तकनीक

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में कृषि के क्षेत्र में एक पुरानी परंपरा फिर से चर्चा का विषय बनी हुई है। ग्रामीण इलाकों के किसान धान की खेती के लिए पारंपरिक 'चोपी' तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। वर्तमान समय में जब खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, यह तकनीक किसानों के लिए कम खर्च में अधिक मुनाफा कमाने का एक सफल विकल्प साबित हो रही है। इस विधि की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह कम बारिश वाले मौसम में भी फसलों को सुरक्षित रखने और पैदावार बनाए रखने में कारगर है।

चोपी तकनीक का बढ़ता महत्व

स्थानीय जानकारों के अनुसार, किसी समय सरगुजा के अधिकांश किसान धान की बुवाई के लिए चोपी विधि का ही उपयोग करते थे। समय के साथ रोपा पद्धति का प्रचलन बढ़ा, लेकिन चोपी तकनीक की उपयोगिता आज भी कायम है। खेती के जानकार सिकंदर प्रजापति का मानना है कि चोपी न केवल किफायती है, बल्कि इससे धान का बेहतर उत्पादन भी प्राप्त होता है। कम लागत और अधिक उत्पादकता के कारण आज फिर से किसान इस पुरानी विधा की ओर रुख कर रहे हैं।

खेत तैयार करने की पूरी प्रक्रिया

चोपी तकनीक के जरिए सफल फसल उगाने के लिए खेत की तैयारी करना सबसे पहला चरण होता है। सिकंदर प्रजापति ने बताया कि इस प्रक्रिया में खेत में पर्याप्त मात्रा में पानी भरा जाता है। इसके बाद हल या ट्रैक्टर की मदद से खेत की गहरी जुताई की जाती है। जुताई के बाद पाटा लगाकर मिट्टी को पूरी तरह से मुलायम और समतल कर दिया जाता है। चोपी के लिए खेत तैयार करने में सामान्यतः तीन से चार दिन का समय लगता है।

बीजों का चयन और बुवाई

बीजों को तैयार करने का तरीका भी इस तकनीक में बहुत महत्वपूर्ण है। बुवाई से तीन से पांच दिन पहले ही धान के बीजों को पानी में भिगोकर रखा जाता है और फिर उन्हें बोरियों में बांध दिया जाता है। इस प्रक्रिया से बीजों में अंकुर निकल आते हैं। इसके बाद इन अंकुरित बीजों को तैयार किए गए गीले खेत में सीधे बिखेरकर बो दिया जाता है। यह प्रक्रिया रोपा लगाने की तुलना में बहुत सरल और कम समय लेने वाली है।

कम खर्च और खरपतवार पर नियंत्रण

चोपी खेती की सबसे बड़ी आर्थिक विशेषता इसका कम खर्चीला होना है। रोपा पद्धति की तुलना में इसमें मजदूरी और अन्य खर्चों में भारी कटौती होती है। इसके अतिरिक्त, इस विधि में खरपतवार की समस्या भी बहुत कम देखने को मिलती है। खेत की मिट्टी में बीज बोने के बाद अधिकांश घास कीचड़ के नीचे दब जाती है, जिससे धान की फसल को बढ़ने के लिए पर्याप्त जगह और पोषक तत्व मिल पाते हैं। इससे धान की गुणवत्ता बेहतर होती है और किसान अधिक उत्पादन प्राप्त कर पाते हैं।

कम बारिश में भी फसल सुरक्षित

जलवायु परिवर्तन और बारिश की अनिश्चितता के दौर में चोपी तकनीक एक ढाल का काम करती है। यदि मानसून में बारिश सामान्य से कम भी होती है, तब भी हल्की वर्षा का लाभ उठाकर इस विधि से बुवाई की जा सकती है। खेत की सही तरीके से मेड़बंदी करने के कारण पानी लंबे समय तक खेत के भीतर जमा रहता है, जो फसल को आवश्यक नमी प्रदान करता है। इससे सूखे की स्थिति में भी उत्पादन पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता है।

बैल बनाम ट्रैक्टर

तकनीक के उपयोग को लेकर सिकंदर प्रजापति ने एक महत्वपूर्ण सलाह दी है। उनका कहना है कि चोपी खेती बैल और ट्रैक्टर दोनों के माध्यम से की जा सकती है, लेकिन बैल से जुताई करना ज्यादा बेहतर परिणाम देता है। ट्रैक्टर बहुत गहराई तक मिट्टी पलट देता है, जिससे अत्यधिक गीली मिट्टी में बीज अधिक नीचे दब सकते हैं। इसके विपरीत, बैल से की गई हल्की जुताई के कारण बीज उचित गहराई पर ही रहते हैं, जिससे अंकुरण बहुत ही प्रभावशाली तरीके से होता है।

लागत और मुनाफे का गणित

आंकड़ों की बात करें तो किसान इस तकनीक को लेकर काफी उत्साहित हैं। उचित खाद के प्रबंधन और नियमित देखभाल के साथ, किसान एक कट्टा बीज से करीब 20 कट्टा तक धान के उत्पादन का दावा करते हैं। यह अनुपात कम बजट वाले सीमांत किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। अंत में, विशेषज्ञों ने सभी किसानों को सलाह दी है कि यदि बजट सीमित है या बारिश की कमी की आशंका है, तो उन्हें चोपी विधि को प्राथमिकता देनी चाहिए। यह पारंपरिक तकनीक आज के आधुनिक कृषि दौर में भी कम लागत में बेहतर और सुरक्षित उत्पादन सुनिश्चित करने का सबसे प्रभावी जरिया है।

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