नेपाल से शादी कर हर साल हजारों महिलाएं भारत आती हैं, लेकिन उत्तराखंड में अब इन महिलाओं के सामने बड़ी परेशानी खड़ी हो गई है। इनकी नागरिकता का मसला तो पहले से ही उलझा हुआ था, मगर अब एसआईआर की प्रक्रिया के बाद इनके मतदान अधिकार पर भी तलवार लटक गई है।
खुला बॉर्डर और रोटी-बेटी के पुराने रिश्ते
उत्तराखंड में नेपाल और भारत के बीच 275 किलोमीटर का खुला बॉर्डर है। इस सीमा पर टिंकर से लेकर बनबसा तक हजारों की आबादी के बीच रोटी-बेटी के संबंध जुड़े हुए हैं। आज भी यहां दोनों देशों के बीच विवाह होना आम बात है। हालत यह है कि इस बॉर्डर से हर साल हजारों की संख्या में लड़कियां शादी कर भारत आती हैं, लेकिन ब्याह कर लाई गई इन लड़कियों को कोई नागरिक अधिकार नहीं मिल पा रहा है।
सामाजिक कार्यकर्ता की चिंता
सामाजिक कार्यकर्ता दीपक जोशी का कहना है कि नागरिकता का मामला तो पहले से ही अधर में लटका हुआ है, मगर अब इन महिलाओं को मतदाता सूची से बाहर हो जाने का डर भी सता रहा है। उनके अनुसार नेपाल से सटे क्षेत्रों में वैवाहिक संबंधों में काफी बढ़ोतरी हुई है। पहले भी ऐसा होता था, लेकिन पिछले दो-चार सालों में यह संख्या काफी बढ़ गई है।
जोशी बताते हैं कि वहां से विवाह कर यहां आ रही कन्याओं की नागरिकता एक बड़ी समस्या है, क्योंकि जब तक वे यहां की नागरिक नहीं बनेंगी, तब तक उन्हें मतदान का अधिकार नहीं मिल पाएगा।
एसआईआर के नियम और 2003 की शर्त
उत्तराखंड में एसआईआर की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। चुनाव आयोग के मुताबिक, 2003 की मतदाता सूची में मतदाता या उसके अभिभावक का नाम होना अनिवार्य है। ऐसे में यह तय है कि 2003 के बाद शादी कर भारत आई हर महिला का नाम वोटर लिस्ट से हटना तय है। इतना ही नहीं, नियमों के अनुसार मतदान का अधिकार सिर्फ भारत के नागरिक को ही मिलता है। ऐसी स्थिति में शादी के बाद भारत आई महिलाओं के लिए एसआईआर की शर्तों को पूरा करना लगभग असंभव है।
प्रशासन का पक्ष
पिथौरागढ़ के एडीएम योगेंद्र सिंह ने इस मामले पर कहा कि जो व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं है, वह मतदाता नहीं हो सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि कोई अपनी नागरिकता प्रमाणित करता है, 18 साल से अधिक उम्र का है और मतदाता बनने के सभी मानकों को पूरा करता है, तो ही उसका नाम मतदाता सूची में शामिल हो सकता है।
बदल सकता है चुनावी समीकरण
कुमाऊं की 7 विधानसभा सीटों पर नेपाली मूल की महिलाओं की संख्या अच्छी-खासी है। ऐसे में जब एसआईआर के बाद इनके नाम मतदाता सूची से हटेंगे, तो राजनीतिक दलों के चुनावी समीकरण पर भी असर पड़ना तय है। अब देखना यह होगा कि इससे किस दल को फायदा होगा और किसे नुकसान।
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