रवि प्रदोष व्रत 2026: आज वृद्धि योग में शिव की पूजा का विशेष संयोग, जानें पूजन विधि और मुहूर्त

आज 12 जुलाई 2026 को रवि प्रदोष व्रत मनाया जा रहा है, जिसमें वृद्धि और ध्रुव योग जैसे शुभ संयोग बन रहे हैं। भगवान शिव की विशेष कृपा पाने के लिए प्रदोष काल में पूजा करने का विधान है, जिससे सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

रवि प्रदोष व्रत 2026: भक्ति और शुभ योगों का संगम

सनातन हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का अत्यधिक महत्व है और जब यह व्रत रविवार के दिन पड़ता है, तो इसे रवि प्रदोष व्रत के नाम से जाना जाता है। आज 12 जुलाई 2026 को रवि प्रदोष का पावन अवसर है। भगवान शिव को समर्पित यह व्रत विशेष रूप से सुख, शांति और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए रखा जाता है। इस वर्ष के रवि प्रदोष व्रत में वृद्धि योग और ध्रुव योग जैसे अत्यंत दुर्लभ और शुभ योगों का निर्माण हो रहा है, जिससे इस दिन की महिमा कई गुना बढ़ गई है। रविवार का दिन होने के कारण, इस व्रत में सूर्य देव की कृपा भी भक्तों को प्राप्त होती है, जो स्वास्थ्य और तेज में वृद्धि करती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आज के दिन भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से उपासना करने पर भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं और जीवन में समृद्धि का आगमन होता है।

रवि प्रदोष व्रत का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

प्रदोष काल वह समय होता है जब भगवान शिव कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा में नृत्य करते हैं। इस समय की गई प्रार्थनाएं सीधे महादेव तक पहुँचती हैं। रविवार को पड़ने वाले इस व्रत का प्रभाव शारीरिक रोगों को दूर करने और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने में सहायक माना गया है। जो भक्त इस दिन व्रत रखते हैं, उनकी कुंडली में सूर्य ग्रह की स्थिति मजबूत होती है, जिससे मान-सम्मान में वृद्धि होती है। मानसिक तनाव से मुक्ति पाने और आर्थिक समस्याओं के निवारण के लिए यह व्रत अत्यंत प्रभावी माना जाता है। इस बार हंस राजयोग भी बन रहा है क्योंकि गुरु ग्रह अपनी उच्च राशि कर्क में स्थित हैं। इन शुभ ग्रहों की स्थिति में शिव पूजन करना साधकों के लिए सौभाग्य लेकर आता है।

तिथि और पंचांग का विवरण

रवि प्रदोष व्रत 2026 के लिए त्रयोदशी तिथि का समय पंचांग के अनुसार इस प्रकार निर्धारित है:

  • त्रयोदशी तिथि की शुरुआत: 12 जुलाई, सुबह 02:04 बजे से
  • त्रयोदशी तिथि का समापन: 12 जुलाई, रात 10:29 बजे तक

चूंकि उदय तिथि और प्रदोष काल का समय रविवार को ही मिल रहा है, इसलिए 12 जुलाई दिन रविवार को ही रवि प्रदोष व्रत का अनुष्ठान किया जा रहा है।

पूजन के लिए शुभ मुहूर्त

आज के दिन पूजा के लिए कई शुभ मुहूर्त उपलब्ध हैं, जिनका लाभ उठाकर भक्त भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं:

  • ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:10 बजे से 04:51 बजे तक
  • लाभ-उन्नति मुहूर्त: सुबह 08:59 बजे से 10:43 बजे तक
  • अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त: सुबह 10:43 बजे से दोपहर 12:27 बजे तक
  • अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:59 बजे से 12:54 बजे तक
  • शुभ-उत्तम मुहूर्त: शाम 07:22 बजे से 08:38 बजे तक
  • अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त: रात 08:38 बजे से 09:54 बजे तक

पूजा की सरल विधि

रवि प्रदोष व्रत के दिन भक्तों को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके पश्चात व्रत का संकल्प लेना चाहिए। मुख्य पूजा प्रदोष काल के दौरान की जाती है। पूजा विधि इस प्रकार है:

  • सबसे पहले भगवान शिव, माता पार्वती, नंदी महाराज और भगवान गणेश की पूजा करें।
  • शिवलिंग का अभिषेक गंगाजल, शुद्ध दूध, दही, शहद, घी और शक्कर से करें।
  • अभिषेक के बाद शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल, भांग, सफेद चंदन और अक्षत अर्पित करें।
  • धूप-दीप प्रज्वलित करें और भक्ति भाव के साथ शिव चालीसा का पाठ करें।
  • महामृत्युंजय मंत्र और पंचाक्षर मंत्र का जाप करना अत्यंत लाभकारी होता है।
  • पूजा के समापन पर भगवान शिव की आरती करें और अपनी मनोकामनाएं महादेव के सामने रखें।

प्रदोष काल और इसका महत्व

प्रदोष काल वह अवधि है जो सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पहले शुरू होती है और सूर्यास्त के 45 मिनट बाद तक रहती है। सामान्यतः यह समय शाम 06:30 बजे से रात 08:30 बजे के बीच होता है। शास्त्रानुसार, इसी अवधि में महादेव की आराधना करने से विशेष फल प्राप्त होता है। प्रत्येक भक्त को अपने शहर के स्थानीय पंचांग के अनुसार प्रदोष काल का निर्धारण कर पूजा करनी चाहिए।

शिवजी के कल्याणकारी मंत्र और आरती

पूजा के दौरान निम्नलिखित मंत्रों का जाप रुद्राक्ष की माला से करना अत्यंत शुभ माना जाता है:

  • पंचाक्षरी मंत्र: ॐ नमः शिवाय (108 बार जाप)
  • महामृत्युंजय मंत्र: ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥ (11, 21 या 108 बार)
  • शिव गायत्री मंत्र: ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥ (108 बार)

अंत में ओम जय शिव ओंकारा आरती का गायन करना चाहिए। आरती का सार यही है कि भगवान शिव ब्रह्मा, विष्णु और स्वयं सदाशिव के रूप में संपूर्ण जगत का कल्याण करते हैं। उनकी भक्ति करने से व्यक्ति को मनवांछित फल की प्राप्ति होती है और वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करता है। यह व्रत न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि मानसिक शांति और पारिवारिक उन्नति के लिए भी अनिवार्य माना गया है।

https://hindi.news18.com/news/dharm/ravi-pradosh-vrat-2026-today-in-vriddhi-yog-know-puja-vidhi-pradosh-kaal-time-and-shiv-mantra-or-aarti-10648818.html