सफलता की नई इबारत
कहावत है कि कामयाबी उन्हीं के हिस्से आती है जो असफलता से सबक लेकर निरंतर आगे बढ़ने का हौसला रखते हैं। भोजपुर के आरा शहर की निवासी शिवांगिनी सिंह ने इस बात को अपने जीवन में पूरी तरह से सच साबित कर दिखाया है। अपनी मेहनत और अटूट संकल्प के दम पर उन्होंने 70वीं BPSC परीक्षा में ग्रामीण विकास पदाधिकारी यानी RDO का पद प्राप्त कर अपने सपनों को साकार किया है। शिवांगिनी की यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि वह शादी के बंधन में बंधने के महज सात महीने के भीतर एक अधिकारी बनी हैं। उनकी इस कामयाबी से उनके मायके और ससुराल में जश्न का माहौल है।
असफलता से सीखने का सफर
शिवांगिनी के लिए यह राह आसान नहीं थी। उन्होंने जब पहली बार BPSC की परीक्षा दी थी, तो वह प्रारंभिक परीक्षा यानी PT भी पास नहीं कर सकी थीं। आमतौर पर कई अभ्यर्थी एक बार मिली हार के बाद अपना रास्ता बदल लेते हैं या हिम्मत हार बैठते हैं, लेकिन शिवांगिनी ने अपनी हार को ही अपनी सबसे बड़ी सीख बना लिया। उन्होंने अपनी रणनीति में बदलाव किया, अपनी कमजोरियों की पहचान की और लगातार मेहनत जारी रखी। परिणाम स्वरूप, अपने दूसरे प्रयास में न केवल उन्होंने परीक्षा पास की, बल्कि अधिकारी बनकर एक मिसाल पेश की।
शिक्षा और करियर की नींव
उनकी सफलता की जड़ें उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि में गहराई से जमी हुई हैं। शिवांगिनी ने वर्ष 2013 में आरा के धनुपरा स्थित डीएवी पब्लिक स्कूल से प्रथम श्रेणी में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद 2015 में उन्होंने इंटरमीडिएट पूरा किया। उनकी उच्च शिक्षा की बात करें तो उन्होंने वाराणसी के बीएचयू से वर्ष 2019 में सोशल साइंस में स्नातक किया और इसके बाद इग्नू से स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। वर्ष 2022 से उन्होंने पूरी निष्ठा के साथ BPSC की तैयारी को अपना एकमात्र लक्ष्य बना लिया।
दैनिक दिनचर्या और तैयारी का तरीका
अपनी तैयारी के दौरान शिवांगिनी प्रतिदिन 6 से 8 घंटे की पढ़ाई करती थीं। वह बताती हैं कि उन्होंने बहुत ही सीमित संसाधनों का इस्तेमाल किया, लेकिन उनकी पढ़ाई हमेशा क्वालिटी और फोकस्ड रही। इसके अलावा, उन्होंने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और यूट्यूब के लेक्चर की भी मदद ली। लिखित परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद इंटरव्यू की तैयारी के लिए उन्होंने मॉक टेस्ट पर विशेष ध्यान दिया, जो उनकी अंतिम सफलता का एक बड़ा कारण बना।
एक ऐसा राज जो केवल करीबियों को था पता
शिवांगिनी ने अपनी तैयारी के सफर को काफी निजी रखा था। वह बताती हैं कि उन्होंने बहुत कम लोगों को अपनी तैयारी के बारे में जानकारी दी थी। उनके घर में केवल उनकी मां संजना सिंह को इस बारे में पूरी जानकारी थी। दिसंबर 2025 में जब उनका विवाह हुआ, तो उनके ससुराल में भी केवल उनके पति को ही यह पता था कि वह BPSC की तैयारी कर रही हैं। जिस दिन अंतिम परिणाम आया, उस समय वह पुणे में थीं। जैसे ही परिणाम की सूचना मिली, मायके और ससुराल दोनों जगह खुशियों की लहर दौड़ गई।
परिवार का अटूट विश्वास
जब शिवांगिनी दिल्ली में रहकर तैयारी कर रही थीं, तब समाज में कई तरह की बातें होती थीं। लेकिन उनके माता-पिता ने उन नकारात्मक बातों पर कभी ध्यान नहीं दिया। सरकारी शिक्षिका मां संजना सिंह ने हमेशा विपरीत परिस्थितियों में भी बेटी का मनोबल बनाए रखा, वहीं वकील पिता संतोष कुमार सिंह ने उन्हें हमेशा अपनी पसंद का करियर चुनने की पूरी आजादी दी। परिवार ने बेटा और बेटी में कभी फर्क नहीं समझा और आज उसी सोच का नतीजा है कि शिवांगिनी अधिकारी बनी हैं। उनके पैतृक गांव भोजपुर के बड़हरा प्रखंड के बखोरापुर में भी लोग इस उपलब्धि पर गर्व महसूस कर रहे हैं।
युवाओं के लिए प्रेरणा
अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता और परिवार को देते हुए शिवांगिनी ने युवाओं को एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है। उनका कहना है कि जीवन में सफलता पाने का कोई शॉर्टकट नहीं होता है। लगातार की गई मेहनत, एक सटीक रणनीति और धैर्य ही आपको आपकी मंजिल तक ले जाते हैं। वह कहती हैं कि पहली असफलता से कभी घबराना नहीं चाहिए, बल्कि उससे सीख लेकर आगे बढ़ना चाहिए क्योंकि वही सीख भविष्य की जीत का मार्ग प्रशस्त करती है।
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