महाराष्ट्र की सियासत में शरद पवार का नया दांव
महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार को राजनीति का चाणक्य और ग्रैंडमास्टर कहा जाता है। उनके हर कदम और हर बयान के पीछे एक गहरा सियासी अर्थ छिपा होता है। इन दिनों राज्य की राजनीति में केवल एक ही चर्चा है कि आखिर शरद पवार क्या खिचड़ी पका रहे हैं। विपक्षी खेमे के सबसे अनुभवी नेता होने के बावजूद, उनकी महायुति सरकार के नेताओं के साथ बढ़ती नजदीकियां उद्धव ठाकरे जैसे सहयोगियों की चिंता का कारण बन गई हैं। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के साथ संवाद हो या फिर उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के फैसलों की खुलेआम तारीफ, शरद पवार के ये कदम सामान्य नहीं माने जा रहे हैं।
देवेंद्र फडणवीस के फैसले का समर्थन
शुक्रवार का दिन महाराष्ट्र की राजनीति में काफी हलचल भरा रहा। शरद पवार ने राज्य सरकार द्वारा किसान कर्ज माफी योजना की शर्तों में दी गई ढील का खुलकर स्वागत किया। उन्होंने एक आधिकारिक बयान जारी करते हुए देवेंद्र फडणवीस की सरकार को धन्यवाद दिया। पवार का मानना है कि सरकार के इस फैसले से राज्य के लाखों ऐसे किसानों को बड़ी राहत मिलेगी, जो पहले इस योजना के लाभ से वंचित रह जाते। उन्होंने कहा कि पुरानी शर्तें किसानों के लिए एक बड़ी बाधा बन रही थीं और उन्हें हटाना एक सकारात्मक कदम है।
क्या है किसान कर्ज माफी योजना में बदलाव
महाराष्ट्र सरकार ने हाल ही में किसानों के हित में कर्ज माफी योजना को लेकर बड़े बदलाव किए हैं। पहले जो शर्तें लगाई गई थीं, उनसे कई किसान बाहर हो रहे थे। देवेंद्र फडणवीस ने विधानसभा में जो बदलाव पेश किए, उनके मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
- महात्मा ज्योतिराव फुले कर्ज माफी योजना के तहत जो सीमा पहले 50,000 रुपये थी, उसे अब बढ़ाकर 2 लाख रुपये कर दिया गया है।
- पूर्व में एक शर्त थी कि लाभ लेने के लिए किसानों को वित्तीय वर्ष 2025-26 और 2026-27 के दौरान अपना फसल ऋण चुकाना अनिवार्य होगा, जिसे अब पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है।
- अब वे सभी किसान इस योजना के पात्र होंगे, जिन्होंने पिछले किन्हीं भी दो वर्षों में अपने कर्ज का भुगतान किया है।
इन बदलावों ने सीधे तौर पर बड़ी संख्या में किसानों को लाभान्वित किया है और इसी कारण शरद पवार ने इसकी सराहना की है।
तारीफ के पीछे छिपी राजनीति
शरद पवार अपनी राजनीति के लिए जाने जाते हैं, जिसमें वे किसी को नाराज किए बिना अपना संदेश दे जाते हैं। सरकार की तारीफ करने के साथ ही उन्होंने बहुत चतुराई से इसका क्रेडिट अपने नेताओं और किसानों के संघर्ष को दिया है। पवार ने जोर देकर कहा कि सरकार का यह फैसला अपने आप नहीं आया, बल्कि यह महाराष्ट्र के उन तमाम किसानों की भावनाओं और आंदोलनों का परिणाम है जो प्राकृतिक आपदाओं और कृषि उपज की गिरती कीमतों से जूझ रहे थे। इस तरह से उन्होंने तारीफ के जरिए सरकार को घेरने का मौका भी नहीं गंवाया और अपनी राजनीतिक भूमिका को भी मजबूत बनाए रखा।
महाविकास अघाड़ी में बढ़ी बेचैनी
शरद पवार के इन कदमों से उनके गठबंधन के साथियों में स्पष्ट रूप से बेचैनी देखी जा सकती है। आदित्य ठाकरे ने शरद पवार और एकनाथ शिंदे की मुलाकात पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि वे उन लोगों के साथ नहीं बैठना चाहते जिन्होंने राम मंदिर को लूटा है। आदित्य ठाकरे ने एकनाथ शिंदे पर आरोप लगाते हुए उन्हें भ्रष्ट करार दिया और कहा कि भाजपा ऐसे लोगों को सत्ता में बिठाती है। वहीं, संजय राउत जैसे नेता भी पहले इस तरह की मुलाकातों पर सवाल उठा चुके हैं। हालांकि, पवार अपनी धुन में हैं और वे किसी भी गठबंधन की सीमा में बंधकर रहने से इनकार करते दिख रहे हैं।
भविष्य की संभावनाएं और पवार की रणनीति
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि शरद पवार यह भली-भांति समझते हैं कि राजनीति में कोई भी दोस्त या दुश्मन स्थायी नहीं होता। शिवसेना और एनसीपी के विभाजन के बाद महाराष्ट्र का राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। ऐसे में पवार सत्तापक्ष के साथ संवाद बनाए रखकर भविष्य के लिए अपने विकल्प खुले रखना चाहते हैं। महाविकास अघाड़ी में कांग्रेस, शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी (शरद पवार) का गठबंधन है, लेकिन पवार समय-समय पर ऐसे संकेत देकर यह भी स्पष्ट कर देते हैं कि वे किसी एक गठबंधन के मोहताज नहीं हैं। राज्य के हित और अपनी पार्टी के अस्तित्व को बचाने के लिए वे सरकार के साथ खड़े होने से भी परहेज नहीं करते। इससे गठबंधन में उनका दबदबा बना रहता है और उनके सहयोगियों को भी यह संदेश जाता है कि वे अपनी स्वतंत्र राजनीतिक राह तय करने में सक्षम हैं। आगामी चुनावों और महाराष्ट्र की बदलती राजनीति में यह देखना दिलचस्प होगा कि शरद पवार का अगला कदम क्या होता है।
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