यूपी पंचायत चुनाव पर बड़ी खबर: ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में आज सुनवाई

पंचायत चुनाव में देरी के चलते ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने के योगी सरकार के 25 मई के फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है, जिस पर शुक्रवार को सुनवाई होनी है।

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव टलने और ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में नियुक्त किए जाने का मामला अब अदालत तक जा पहुंचा है। योगी सरकार के इस फैसले के विरोध में इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई है, जिस पर शुक्रवार को सुनवाई निर्धारित है।

किस बेंच में होगी सुनवाई

प्रयागराज में दाखिल इस याचिका पर शुक्रवार को हाईकोर्ट के जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की सिंगल बेंच सुनवाई करेगी। याचिका में राज्य सरकार के 25 मई के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसके तहत ग्राम प्रधानों का कार्यकाल छह महीने के लिए बढ़ाते हुए उन्हें प्रशासक नियुक्त कर दिया गया था।

किन्हें बनाया गया पक्षकार

याचिका में यूपी सरकार, डायरेक्टर पंचायती राज, डीएम, चीफ डेवलपमेंट ऑफिसर और जिला पंचायती राज अधिकारी को पक्षकार बनाया गया है। यह याचिका कौशांबी निवासी आशीष कुमार की ओर से दाखिल की गई है।

इसके साथ ही कौशांबी के ही हेमचंद्र और अधिवक्ता इम्तियाज हुसैन तथा अलीगढ़ के अनिल कुमार ने भी अलग से याचिका दाखिल की है। अदालत ने तीनों याचिकाओं को आपस में संबद्ध कर एक साथ सुनवाई करने का निर्णय लिया है, जिसकी सुनवाई जुलाई में होगी।

लखनऊ बेंच में भी पहुंचा मामला

उल्लेखनीय है कि इससे पहले हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में भी ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई हो चुकी है। सुनवाई के दौरान अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए निर्वाचन आयोग से पूछा कि वह चुनाव की तारीख स्पष्ट करे कि आखिर मतदान कब कराया जाएगा।

इसके अलावा कोर्ट ने 10 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई में राज्य सरकार को पंचायत चुनाव के लिए ओबीसी आरक्षण को लेकर भी स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया है। यह याचिका एक स्थानीय अधिवक्ता द्वारा दाखिल की गई है।

फैसले को बताया गया गैरकानूनी

याचिका में दलील दी गई है कि यूपी पंचायत राज अधिनियम की धारा 12 के अनुसार प्रधानों का कार्यकाल शपथ ग्रहण की तिथि से केवल 5 साल का ही हो सकता है। लेकिन सरकार ने समय पर पंचायत चुनाव न कराकर मौजूदा प्रधानों को ही प्रशासक बना दिया है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि ऐसा करके एक तरह से प्रधानों का कार्यकाल अनिश्चितकाल के लिए बढ़ा दिया गया है, जो कानून के विरुद्ध है। याचिका में यह भी कहा गया है कि पहले जब पंचायत चुनाव समय पर नहीं हो पाते थे, तब एडीओ पंचायत या किसी अन्य अधिकारी को प्रशासक नियुक्त किया जाता था और इस बार भी ऐसा ही किया जाना चाहिए था।

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