बिहार का पश्चिम चम्पारण जिला अपनी बेहतरीन गन्ने की खेती के लिए पूरे प्रदेश में एक विशेष पहचान रखता है। इस क्षेत्र के अधिकांश किसानों की आजीविका मुख्य रूप से गन्ने की फसल पर ही टिकी हुई है। जिले में संचालित पांच चीनी मिलें स्थानीय किसानों को उनकी उपज बेचने के लिए एक बेहतर मंच प्रदान करती हैं, जिससे उन्हें अपनी फसल का सही दाम समय पर मिल जाता है। इसी वजह से यहां के सैकड़ों परिवारों का भरण-पोषण सीधे तौर पर इस नकदी फसल से जुड़ा हुआ है। वर्तमान समय में मानसून की सक्रियता के कारण खेतों में गन्ने की फसल तेजी से बढ़ रही है और देखने में काफी अच्छी लग रही है।
लेकिन इसके साथ ही, लगातार हो रही भारी बारिश और खेतों में पानी जमा होने की आशंका ने किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। गन्ना उत्पादकों को इस बात का डर सता रहा है कि अत्यधिक जलजमाव या मौसम के मिजाज में अचानक आने वाले बदलाव से उनकी महीनों की कड़ी मेहनत कहीं बर्बाद न हो जाए। इस संकट को देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने मानसून के इस नाजुक दौर में गन्ने की फसल की सुरक्षा और बेहतर देखभाल के लिए कुछ बेहद कारगर और जरूरी दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिन्हें अपनाकर किसान भारी नुकसान से बच सकते हैं।
जल निकासी को दें सर्वोच्च प्राथमिकता
क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. सतीश चंद्र नारायण ने गन्ने की खेती करने वाले किसानों को सबसे पहले खेत के जल प्रबंधन पर ध्यान देने की सलाह दी है। उनके अनुसार, बरसात के मौसम में सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण काम यह है कि खेतों से पानी की निकासी का पुख्ता इंतजाम किया जाए। यदि गन्ने के खेत में लंबे समय तक पानी ठहरा रहता है, तो इससे पौधों की जड़ों को हवा नहीं मिल पाती और वे सड़ने लगती हैं, जिससे पूरी फसल तबाह हो सकती है।
इस समस्या से बचने के लिए किसानों को तुरंत अपने खेतों में जलनिकासी के लिए नालियां बनानी चाहिए। यदि भारी बारिश के कारण खेतों में अत्यधिक पानी जमा हो गया हो, तो जरूरत पड़ने पर पंप सेट की सहायता से उस पानी को तत्काल बाहर निकाल देना चाहिए। डॉ. नारायण का कहना है कि खेत जितनी जल्दी सूखकर चलने लायक स्थिति में आएगा, फसल के सुरक्षित और स्वस्थ रहने की संभावना उतनी ही ज्यादा बढ़ जाएगी। एक बार जब खेत की मिट्टी सूख जाए, तो पौधों की तीव्र वृद्धि के लिए तुरंत पोषक तत्वों और खाद का छिड़काव करना बेहद आवश्यक हो जाता है।
सल्फर, पोटाश और नाइट्रोजन का सही तालमेल
फसल को फिर से ऊर्जावान बनाने और उसकी विकास दर को बनाए रखने के लिए वैज्ञानिक डॉ. सतीश चंद्र नारायण ने खादों के एक विशेष संतुलन को अपनाने पर जोर दिया है। उनके द्वारा सुझाए गए मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
- अतिरिक्त नाइट्रोजन का प्रयोग: मानसून के दिनों में गन्ने के पौधों को अधिक पोषण की जरूरत होती है। इसलिए सामान्य दिनों में दी जाने वाली नाइट्रोजन की मात्रा से लगभग 20 प्रतिशत अधिक नाइट्रोजन का इस्तेमाल इस समय किया जाना चाहिए।
- पोटाश की खुराक: फसल को मजबूती देने और रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ाने के लिए प्रति हेक्टेयर के हिसाब से तकरीबन 30 किलोग्राम पोटाश का इस्तेमाल करना चाहिए।
- सल्फर का महत्व: इसके साथ ही प्रति हेक्टेयर लगभग 25 किलोग्राम सल्फर का प्रयोग भी गन्ने की फसल के लिए बेहद गुणकारी साबित होता है। सल्फर न केवल पौधों को भीतर से मजबूती प्रदान करता है, बल्कि अत्यधिक बारिश और प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण कमजोर हुई फसल को दोबारा तेजी से पनपने में मदद करता है।
इसके अलावा, वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि जिन खेतों में पानी जमा हो जाता है, वहां की मिट्टी में फास्फोरस की उपलब्धता पहले से ही प्रचुर मात्रा में बनी रहती है। यही कारण है कि इस मौसम में गन्ने की फसल में अलग से फास्फोरस डालने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं होती है।
फफूंद जनित रोगों और रेड रॉट से ऐसे बचाएं फसल
कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, जब खेत गीले हों और जड़ें कमजोर हों, तो गन्ने के पौधों को तुरंत पोषण देने के लिए उनकी पत्तियों पर सीधे पोषक तत्वों का छिड़काव करना सबसे उत्तम उपाय माना जाता है। इसके लिए एक खास घोल तैयार करने की सलाह दी गई है। किसानों को 3 किलोग्राम यूरिया और जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्वों के मिश्रण को अच्छी तरह से 200 लीटर पानी में घोल लेना चाहिए। इस तैयार घोल का प्रति एकड़ की दर से फसल की पत्तियों पर समान रूप से छिड़काव करना चाहिए। यह सीधे तौर पर पौधों को ऊर्जा देता है और उनकी पत्तियों में हरियाली लाता है
इसके साथ ही, लगातार जलजमाव की वजह से गन्ने की फसल में रेड रॉट जैसी खतरनाक फफूंद जनित बीमारियों के फैलने का खतरा बहुत अधिक बढ़ जाता है। इस भयानक रोग से फसल को बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने सुरक्षात्मक उपाय सुझाए हैं। किसानों को ट्राइकोडर्मा हार्ज़ियनम का उपयोग करना चाहिए। इसे 15-15 दिन के अंतराल पर दो बार या तो सीधे मिट्टी में मिलाकर देना चाहिए या फिर सिंचाई के पानी के साथ बहा देना चाहिए। इस जैविक कवकनाशी के प्रयोग से फफूंद जनित बीमारियों का प्रकोप पूरी तरह थम जाता है, जिससे गन्ने की गुणवत्ता बनी रहती है और अंततः किसानों को बंपर उत्पादन प्राप्त होता है।
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