बिलासपुर: स्कूल का भवन ढहा तो पेड़ के नीचे पढ़ने को मजबूर हुए बच्चे, अधिकारियों की सुस्ती से भविष्य अधर में

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में शासकीय प्राथमिक शाला के जर्जर भवन के बाद बच्चों को खुले आसमान और पेड़ के नीचे पढ़ाई करनी पड़ रही है, जिससे अभिभावक अपने बच्चों का नाम कटवाने को मजबूर हैं।

बिलासपुर में शिक्षा व्यवस्था की बदहाली

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के अंतर्गत आने वाले तखतपुर विधानसभा क्षेत्र के ग्राम घुटकू के स्टेशनपारा से शिक्षा विभाग की एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। यहां के शासकीय प्राथमिक शाला के विद्यार्थी पिछले काफी समय से बुनियादी सुविधाओं से पूरी तरह वंचित हैं। स्कूल के पास अपना कोई भवन नहीं है, जिसके कारण नौनिहाल खुले आसमान के नीचे एक पीपल के पेड़ की छांव में बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं। यह स्थिति उस समय पैदा हुई जब स्कूल का जर्जर हो चुका भवन रहने लायक नहीं बचा और स्थानीय स्तर पर कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई।

पांच साल से निजी मकान में चल रही थी कक्षाएं

इस स्कूल का मूल भवन वर्षों पहले ही जर्जर हो चुका था, जिसके बाद पांच साल तक स्कूल का संचालन एक निजी पीएम आवास यानी इंदिरा आवास में किया जा रहा था। स्कूल को यह भवन मकान मालिक मुकेश लोनिया ने चार महीने के लिए उपलब्ध कराया था, लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों की विफलता देखिए कि पांच साल बीत जाने के बाद भी विभाग इस समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं ढूंढ सका। आखिरकार, जब मकान मालिक को अपने घर की आवश्यकता हुई और किराया भी नहीं मिला, तो उन्होंने मकान खाली करवाकर उसमें ताला जड़ दिया। इसके बाद से ही छात्र मजबूरन पेड़ के नीचे बैठकर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

11.48 लाख की स्वीकृति के बावजूद निर्माण कार्य अटका

हद तो तब हो गई जब यह पता चला कि इस स्कूल के नए भवन के निर्माण के लिए शासन स्तर से 23 अप्रैल 2026 को ही 11.48 लाख रुपये की राशि स्वीकृत की जा चुकी है। इतने बड़े बजट के बावजूद आज तक निर्माण कार्य धरातल पर शुरू नहीं हो सका है। पंचायत और जिम्मेदार अधिकारियों की सुस्ती के चलते बच्चों का भविष्य दांव पर लगा हुआ है। सरपंच का तर्क है कि निर्माण कार्य बारिश का मौसम समाप्त होने के बाद ही शुरू किया जाएगा, जबकि ग्रामीणों और अभिभावकों का कहना है कि यह केवल बहानेबाजी है और अधिकारियों की लापरवाही के कारण बच्चों के कीमती दिन बर्बाद हो रहे हैं।

महज 10 बच्चे बचे, नए दाखिले शून्य

सरकारी स्कूल की इस बदहाली का सीधा असर प्रवेश प्रक्रिया पर पड़ा है। इस शैक्षणिक सत्र में कक्षा पहली और दूसरी में एक भी नया दाखिला नहीं हो सका है। वर्तमान में स्कूल में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या घटकर मात्र 10 रह गई है। शिक्षकों की स्थिति भी नाजुक है। स्कूल में नियुक्त दो शिक्षकों में से एक शिक्षक 30 जुलाई को सेवानिवृत्त होने वाले हैं, जिसके बाद शैक्षणिक गतिविधियों पर और अधिक विपरीत प्रभाव पड़ना तय है।

पेड़ के नीचे पढ़ाई: धूप, बारिश और खतरों का साया

प्रधान पाठिका खगेश्वरी दुबे ने बताया कि पेड़ के नीचे कक्षाएं चलाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। तेज धूप में बच्चों को बैठाना कठिन होता है, वहीं पेड़ से गिरने वाले कीड़े-मकोड़े बच्चों के लिए खतरा पैदा करते हैं। बारिश या आंधी-तूफान के समय तो पढ़ाई पूरी तरह से ठप हो जाती है। इसके अलावा, यदि गांव में कोई शोक कार्यक्रम होता है, तब भी पेड़ के नीचे कक्षाएं होने के कारण स्कूल बंद करना पड़ता है। स्कूल में शौचालय की सुविधा न होने के कारण छात्राओं और महिला शिक्षकों को तालाब की मेड़ पर खुले में शौच के लिए जाने को मजबूर होना पड़ता है। यहाँ तक कि किताबों का वितरण भी पेड़ के नीचे किया जा रहा है और मध्याह्न भोजन को रसोइया के घर में तैयार किया जा रहा है, जो सरकारी दावों की पोल खोलने के लिए काफी है।

शिक्षकों और अभिभावकों का दर्द

सहायक शिक्षक संतराम यादव ने अपनी व्यथा बताते हुए कहा कि स्कूल में न भवन है, न किचन और न ही स्कूल तक पहुँचने के लिए कोई सुरक्षित सड़क है। बच्चों की सुरक्षा को लेकर हमेशा एक डर का माहौल बना रहता है। उन्होंने कहा कि कई बार अधिकारियों को इस समस्या से अवगत कराया गया लेकिन आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। प्रधान पाठिका खगेश्वरी दुबे ने साझा किया कि जब उन्होंने यहां कार्यभार संभाला था, तब लगभग 30 बच्चे स्कूल आते थे। पुराना भवन भी एक ऐसी जगह स्थित था जहाँ नाला पार करके जाना पड़ता था। बुनियादी सुविधाओं की लगातार कमी के कारण छात्रों की संख्या निरंतर गिरती गई।

अभिभावकों में भी भारी आक्रोश है। सीमा लोनिया, जिनके दो बच्चे इस स्कूल में पढ़ते हैं, उन्होंने स्पष्ट किया कि वे अपने बच्चों को अब और अधिक जोखिम में नहीं डाल सकतीं। उनका कहना है कि बारिश, सांप-बिच्छू और अन्य अनहोनी का डर उन्हें हर पल सताता है। वे लगातार अपने बच्चों का नाम कटवाने के लिए टीसी की मांग कर रही हैं ताकि उन्हें किसी दूसरे बेहतर स्कूल में दाखिला दिलाया जा सके।

प्रशासन का क्या है पक्ष?

इस पूरे मामले पर बिलासपुर के जिला शिक्षा अधिकारी रामेश्वर जायसवाल ने कहा कि भवन निर्माण के लिए अप्रैल में ही राशि स्वीकृत हो चुकी है, लेकिन पंचायत स्तर पर निर्माण कार्य शुरू न होना एक प्रशासनिक विफलता है। उन्होंने आश्वासन दिया कि फिलहाल बच्चों की पढ़ाई को प्रभावित होने से बचाने के लिए स्कूल को पास के ही किसी अन्य सुरक्षित भवन में स्थानांतरित करने की व्यवस्था की जा रही है। अब देखना यह है कि यह आश्वासन कब तक धरातल पर उतरता है और बच्चे कब तक अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित रहेंगे।

https://hindi.news18.com/news/chhattisgarh/bilaspur-ghutku-primary-school-have-no-building-operating-under-a-peepal-tree-local18-10623701.html