सिंधु जल संधि पर भारत का रुख और पाकिस्तान की बौखलाहट
सिंधु जल संधि को लेकर भारत ने अब बेहद कड़ा रुख अपना लिया है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद से ही भारत ने सिंधु नदी के पानी के प्रवाह को नियंत्रित किया है, जिसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान में पानी की भारी किल्लत शुरू हो गई है। अपनी इस बदहाली से निपटने और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को घेरने के लिए पाकिस्तान ने अब एक नई कूटनीतिक चाल चलते हुए चीन का दामन थाम लिया है। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने हाल ही में एक चौंकाने वाला बयान दिया है, जिसमें उन्होंने हिमालय से निकलने वाली नदियों को साझा प्राकृतिक धरोहर करार देते हुए चीन को भी इस नदी तंत्र का एक प्रमुख हितधारक बता दिया है।
पाकिस्तान ने चीन को क्यों बनाया ढाल?
पिछले कई दशकों से पाकिस्तान सिंधु नदी के पानी का भरपूर लाभ उठाता रहा है। उसे हमेशा यह भ्रम रहा कि भारत इस समझौते की सीमाओं से बंधा हुआ है और पानी को लेकर कभी कड़ा कदम नहीं उठाएगा। हालांकि, पहलगाम में हुए हमले के बाद भारत का धैर्य जवाब दे गया। भारत ने न केवल ऑपरेशन सिंदूर के जरिए सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर पाकिस्तान को करारा जवाब दिया, बल्कि सिंधु जल संधि के नियमों को भी कड़ाई से लागू करना शुरू कर दिया। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक सीमा पार से आतंकवाद को पूरी तरह से समाप्त नहीं किया जाता, तब तक संधि की शर्तों का पालन वैसा नहीं होगा जैसा पहले था।
पाकिस्तान की नई कूटनीतिक रणनीति
पाकिस्तान इस समय पानी की गंभीर कमी से जूझ रहा है और उसके नेता लगातार सिंधु जल के मुद्दे पर भारत के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं। जब भारत ने उनके दबाव के सामने घुटने नहीं टेके, तो पाकिस्तान ने अब चीन को इस विवाद में घसीटने का फैसला किया है। ताहिर अंद्राबी के अनुसार, हिमालय से निकलने वाली नदियां सिंधु से लेकर मेकांग तक कई देशों को जीवन देती हैं। उन्होंने तर्क दिया है कि चीन भी इन जल प्रणालियों का एक अहम हिस्सा है, इसलिए यह केवल भारत और पाकिस्तान का आपसी मुद्दा नहीं बल्कि एक बड़ा क्षेत्रीय मामला है। पाकिस्तान की कोशिश है कि इस मुद्दे को वैश्विक और क्षेत्रीय स्तर पर ले जाकर भारत पर दबाव बनाया जाए।
पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय का आधिकारिक पक्ष
पाकिस्तानी प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने अपने बयान में कहा कि हिमालयी क्षेत्र से निकलने वाली नदियों का पानी प्रकृति का एक अनुपम उपहार है। उन्होंने आगे कहा कि चीन से भी कई विशाल नदियां निकलती हैं, जो पूरे दक्षिण एशिया और सुदूर पूर्व के देशों के लिए महत्वपूर्ण हैं। पाकिस्तान यह संदेश देने की पुरजोर कोशिश कर रहा है कि चीन भी इस जल प्रणाली का एक प्रमुख पक्ष है और यदि पानी का संकट बढ़ता है, तो चीन की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाएगी। उनका दावा है कि चीन का रुख पानी से जुड़े बड़े वैश्विक मुद्दों पर हमेशा सकारात्मक रहा है, इसलिए वह हिमालयी नदियों के मामले में भी अपनी आवाज उठा सकता है।
क्या चीन पाकिस्तान की मदद के लिए आएगा?
पाकिस्तान द्वारा चीन का नाम लेना सीधे तौर पर भारत पर कूटनीतिक दबाव डालने की एक कोशिश है। पाकिस्तान को यह उम्मीद है कि उसका सदाबहार दोस्त चीन, जिसके साथ उसका चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी CPEC जैसी बड़ी परियोजनाएं चल रही हैं, वह भारत के खिलाफ खुलकर बोलेगा। लेकिन, वर्तमान भू-राजनीतिक परिस्थितियों में यह बहुत ही मुश्किल लगता है। बीते कुछ समय में भारत और चीन के आपसी संबंधों में सुधार आया है। अमेरिका की टैरिफ नीतियों के चलते भी भारत और चीन के बीच समीकरण बदले हैं। ऐसे में इस बात की संभावना ना के बराबर है कि चीन बिना किसी ठोस आधार के भारत के खिलाफ जाकर पाकिस्तान का समर्थन करेगा।
सिंधु जल संधि में चीन की कोई भूमिका नहीं
कानूनी दृष्टिकोण से भी देखा जाए तो सिंधु जल विवाद में चीन को घसीटने का पाकिस्तान का दांव कमजोर नजर आता है। सिंधु जल संधि मुख्य रूप से भारत और पाकिस्तान के बीच हुई थी, जिसमें किसी तीसरे देश के हस्तक्षेप का कोई प्रावधान नहीं है। चीन इस संधि का हिस्सा नहीं है और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत वह इस द्विपक्षीय मसले में हस्तक्षेप करने की स्थिति में नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान केवल अपनी घरेलू जनता को यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि वह पानी के संकट को सुलझाने के लिए गंभीर है, जबकि सच्चाई यह है कि वह भारत की सख्ती के आगे बेबस है।
पाकिस्तान के लिए सिंधु का महत्व
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और जीवनशैली काफी हद तक सिंधु नदी प्रणाली पर टिकी है। उसकी खेती, पीने का पानी और बिजली का एक बड़ा हिस्सा इसी नदी पर निर्भर है। भारत के सख्त होने के बाद से पाकिस्तान में पानी का त्राहिमाम मचा हुआ है। हालांकि, इस बार समय पर आई बाढ़ ने पाकिस्तान को कुछ हद तक राहत दी है, अन्यथा वहां के हालात और भी बदतर हो सकते थे। भारत ने साफ कर दिया है कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। जब तक पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं करता, उसे भारत से मिलने वाले पानी के प्रवाह में कोई राहत नहीं मिलेगी। भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए सिंधु जल संधि की समीक्षा करने का पूर्ण अधिकार रखता है और इस पर किसी भी अन्य देश का दखल स्वीकार्य नहीं है।
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