40 हजार किलो घी की नींव पर खड़ा है बीकानेर का यह ऐतिहासिक मंदिर, जानिए भांडाशाह जैन मंदिर की अनोखी गाथा

राजस्थान के बीकानेर में स्थित करीब 500 साल पुराना भांडाशाह जैन मंदिर अपनी बेजोड़ वास्तुकला और अनोखी निर्माण शैली के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है, जिसकी नींव में पानी की जगह हजारों किलो देसी घी का इस्तेमाल किया गया था।

भारतीय संस्कृति और वास्तुकला अपने भीतर कई ऐसे अनूठे रहस्यों को समेटे हुए है, जिन्हें देखकर आज का आधुनिक विज्ञान और इंजीनियर भी दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। राजस्थान के ऐतिहासिक शहर बीकानेर में स्थित भांडाशाह जैन मंदिर भी एक ऐसा ही जीवंत चमत्कार है। लगभग 500 साल पुराना यह ऐतिहासिक मंदिर न केवल अपनी धार्मिक महत्ता के लिए जाना जाता है, बल्कि इसकी निर्माण शैली पूरी दुनिया में अद्वितीय मानी जाती है। लाल और पीले बलुआ पत्थरों से तराशा गया यह भव्य तीन मंजिला मंदिर अपनी अनोखी नींव के लिए विख्यात है, जिसके निर्माण में पानी की जगह भारी मात्रा में शुद्ध देसी घी का प्रयोग किया गया था।

नींव में पानी की जगह इस्तेमाल हुआ 40 हजार किलो घी

भांडाशाह जैन मंदिर की सबसे बड़ी और विस्मयकारी विशेषता इसकी नींव से जुड़ी हुई है। ऐतिहासिक दस्तावेजों और मान्यताओं के अनुसार, जब 15वीं शताब्दी में इस विशाल मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हुआ, तब इसकी मजबूत नींव को तैयार करने के लिए पानी का उपयोग नहीं किया गया था। इसके बजाय, करीब 40,000 किलोग्राम यानी 40 टन शुद्ध देसी घी और बजरी के मिश्रण का इस्तेमाल किया गया था।

इस अनोखी निर्माण सामग्री का असर आज भी महसूस किया जा सकता है। मंदिर प्रबंधन और स्थानीय लोगों का कहना है कि भीषण गर्मी के दिनों में आज भी इस मंदिर के फर्श और कुछ खंभों से हल्की सी चिकनाहट या तैलीय अंश बाहर निकलता दिखाई देता है। यही कारण है कि साल भर देश और दुनिया के कोने-कोने से हजारों श्रद्धालु और सैलानी विशेष रूप से इस अद्भुत नजारे को देखने और महसूस करने के लिए यहाँ खिंचे चले आते हैं। हालांकि, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस चिकनाहट के पीछे पत्थरों की विशेष पॉलिश, स्थानीय मौसम की परिस्थितियां या फिर रखरखाव में इस्तेमाल होने वाली प्राचीन सामग्रियां भी हो सकती हैं, लेकिन यह पारंपरिक विश्वास इस मंदिर की प्रसिद्धि को और भी दिलचस्प बना देता है।

भगवान सुमतिनाथ का दिव्य और अलौकिक गर्भगृह

मंदिर के मुख्य गर्भगृह में प्रवेश करते ही श्रद्धालुओं को एक अलग ही आध्यात्मिक शांति और दिव्य ऊर्जा का अनुभव होता है। यहाँ जैन धर्म के पाँचवें तीर्थंकर भगवान श्री सुमतिनाथ जी की अत्यंत सौम्य, शांत और ध्यानमग्न मुद्रा में अलौकिक प्रतिमा स्थापित है। गर्भगृह को बहुत ही कलात्मक ढंग से सजाया गया है, जहाँ वेदी पर विराजमान भगवान सुमतिनाथ के दर्शन मात्र से ही मन भक्ति के सागर में डूब जाता है।

गर्भगृह की आंतरिक दीवारों पर की गई सजावट भी अपने आप में अद्वितीय है। यहाँ सोने के वर्क की तरह चमकती हुई सुनहरी चित्रकारी, अत्यंत जटिल और रंगीन मीनाकारी तथा संगमरमर के पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी भक्तों को मंत्रमुग्ध कर देती है। रोजाना सैकड़ों स्थानीय श्रद्धालु और बाहरी पर्यटक यहाँ आकर अपनी आस्था प्रकट करते हैं और इस पवित्र स्थल की सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव करते हैं।

500 साल पुरानी भित्ति चित्रकला का अनूठा संग्रह

भांडाशाह जैन मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं है, बल्कि यह पारंपरिक भारतीय चित्रकला और शिल्पकला का एक उत्कृष्ट जीवित संग्रहालय भी है। मंदिर की दीवारों, खंभों और विशाल छतों पर की गई चित्रकारी इसकी सुंदरता में चार चांद लगाती है।

इस मंदिर की चित्रकला की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:

  • प्राकृतिक रंगों का अनूठा प्रयोग: सदियों पहले बिना किसी रासायनिक मिलावट के, केवल जड़ी-बूटियों, प्राकृतिक वनस्पति और खनिजों से तैयार किए गए प्राकृतिक रंगों का उपयोग इन भित्ति चित्रों को बनाने में किया गया था। इसी वजह से आज 500 साल बाद भी ये कलाकृतियां अपनी मूल चमक और जीवंतता को बनाए हुए हैं।
  • विविध विषयों का सजीव चित्रण: इन चित्रों में जैन धर्म की पौराणिक कथाओं, विभिन्न तीर्थंकरों के जीवन चरित्र, तत्कालीन समृद्ध नगरों की बनावट, राजदरबारों के वैभव और उस दौर के सामाजिक जनजीवन का बहुत ही बारीक और सुंदर चित्रण किया गया है।
  • पारंपरिक भित्ति कला का प्रमाण: यहाँ की पच्चीकारी और चित्रकारी को भारतीय पारंपरिक भित्ति कला (फ्रेस्को आर्ट) का सबसे बेहतरीन और बेजोड़ उदाहरण माना जाता है।

विशाल गुंबद और उसकी सूक्ष्म नक्काशी

मंदिर का विशाल गुंबद कला के क्षेत्र में मध्यकालीन कलाकारों के उत्कृष्ट कौशल का प्रमाण है। जब आप मंदिर के भीतर खड़े होकर ऊपर की ओर देखते हैं, तो ऐसा महसूस होता है मानो पूरा ब्रह्मांड और इतिहास एक ही गोलाकार कैनवास पर जीवंत हो उठा हो।

गुंबद के ठीक केंद्र में एक बहुत ही सुंदर और भव्य कमल के फूल की आकृति उकेरी गई है। इस कमल के चारों तरफ अलग-अलग गोलाकार फ्रेम बने हुए हैं, जिनमें भारत के कई सुप्रसिद्ध जैन तीर्थ स्थलों, पावन पर्वत शिखरों और ऐतिहासिक धार्मिक इमारतों के अत्यंत सजीव और ज्यामितीय संतुलन से भरपूर चित्र अंकित किए गए हैं। कलाकारों की यह सूक्ष्म कारीगरी और उनकी अद्भुत कल्पनाशीलता पर्यटकों को विस्मित कर देती है और लोग इस कलात्मक कृति को अपने कैमरों में कैद करने से खुद को रोक नहीं पाते हैं।

महामंडप के खंभे और उनकी अनोखी बनावट

मंदिर का महामंडप और सभा मंडप भी स्थापत्य कला के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हैं। यहाँ बने संगमरमर और लाल बलुआ पत्थरों के स्तंभों पर की गई नक्काशी देखते ही बनती है। इन खंभों पर पारंपरिक राजस्थानी और जैन वास्तुकला शैली के अलंकरण साफ तौर पर दिखाई देते हैं।

मंडप के प्रत्येक स्तंभ पर देवी-देवताओं, स्वर्ग की अप्सराओं, द्वारपालों, पारंपरिक बेल-बूटों और विभिन्न मांगलिक प्रतीकों की आकृतियों को बहुत ही बारीकी से तराशा गया है। आश्चर्य की बात यह है कि मंदिर के हर खंभे का डिज़ाइन और उसकी पच्चीकारी एक-दूसरे से पूरी तरह से अलग और अनूठी है, जो तत्कालीन शिल्पकारों की असाधारण प्रतिभा और धैर्य का परिचय देती है।

सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण

बीकानेर का यह ऐतिहासिक भांडाशाह जैन मंदिर आज भी अपनी प्राचीन और समृद्ध धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत को सहेजे हुए है। मंदिर परिसर के विभिन्न कक्षों में स्थापित अन्य तीर्थंकरों की प्राचीन प्रतिमाएं भी श्रद्धालुओं की अगाध श्रद्धा का केंद्र हैं। सदियों पुरानी यह ऐतिहासिक धरोहर न केवल बीकानेर की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक पटल पर चमका रही है, बल्कि इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और कला प्रेमियों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्ययन केंद्र भी बनी हुई है।

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