निकाह हलाला के नाम पर यौन उत्पीड़न का मामला: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 9 आरोपियों को नहीं दी राहत

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निकाह हलाला की आड़ में हुए कथित यौन शोषण के एक मामले में नौ आरोपियों की याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक आरोपों को व्यक्तिगत कानूनों की आड़ में नहीं दबाया जा सकता और पुलिस जांच जारी रहेगी।

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

प्रयागराज में निकाह हलाला के नाम पर महिला के यौन उत्पीड़न का मामला सामने आया है, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपियों को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने अपने हालिया आदेश में नौ आरोपियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग वाली याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट लहजे में कहा है कि जब किसी शिकायत में प्रथम दृष्टया गंभीर आपराधिक कृत्य के आरोप शामिल हों, तो उसे महज पर्सनल लॉ या धार्मिक प्रथाओं का हवाला देकर खारिज नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह पूरा घटनाक्रम उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से जुड़ा हुआ है। एक पीड़िता ने आरोप लगाया था कि निकाह हलाला की प्रक्रिया के दौरान उसके साथ यौन शोषण किया गया। पीड़िता की शिकायत को गंभीरता से लेते हुए स्थानीय पुलिस ने नौ नामजद लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। कानूनी शिकंजा कसता देख सभी आरोपियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और दलील दी थी कि यह पूरा मामला मुस्लिम पर्सनल लॉ के दायरे में आता है, इसलिए इसे आपराधिक कार्रवाई से बाहर रखा जाना चाहिए।

पर्सनल लॉ से ऊपर है आपराधिक कानून

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया कि पर्सनल लॉ का संरक्षण किसी भी तरह के अपराध को वैध बना सकता है। कोर्ट ने कहा कि आपराधिक कानूनों का स्थान सर्वोपरि है और व्यक्तिगत या धार्मिक कानूनों के आधार पर किसी गंभीर अपराध की जांच को नहीं रोका जा सकता। अदालत ने यह भी साफ किया कि इस चरण पर आरोपों की सत्यता या सबूतों की गहराई में जाना संभव नहीं है, लेकिन यदि एफआईआर में संज्ञेय अपराध के तथ्य मौजूद हैं, तो पुलिस को अपनी तफ्तीश आगे बढ़ाने का पूरा अधिकार है।

जांच पर अदालत का रुख

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि एफआईआर रद्द करने की प्रक्रिया के दौरान अदालत का कार्यक्षेत्र बहुत सीमित होता है। इस स्तर पर सबूतों का ट्रायल या आरोपों की प्रमाणिकता की परख नहीं की जाती है। यदि शिकायत में उल्लेखित तथ्यों से स्पष्ट होता है कि कानून का उल्लंघन हुआ है, तो जांच प्रक्रिया को बाधित नहीं किया जा सकता। इस फैसले के बाद अब पुलिस इस मामले में अपनी कानूनी कार्रवाई जारी रखेगी और नियमानुसार साक्ष्य एकत्र करेगी।

क्या है निकाह हलाला की अवधारणा

निकाह हलाला मुस्लिम पारिवारिक कानून से जुड़ी एक ऐसी व्यवस्था है जिसे लेकर अक्सर विवाद बना रहता है। इस्लामी व्याख्याओं के अनुसार, यदि कोई पति अपनी पत्नी को तीन बार तलाक देकर रिश्ता खत्म कर देता है और बाद में वे दोबारा वैवाहिक जीवन में आना चाहते हैं, तो महिला को किसी अन्य पुरुष से निकाह करना पड़ता है। यदि उस दूसरे निकाह का अंत तलाक या पति की मृत्यु जैसे कारणों से होता है, तभी वह महिला अपने पहले पति से पुनः निकाह कर सकती है। हालांकि, विद्वानों का एक वर्ग इस बात पर जोर देता है कि केवल पहले पति से दोबारा निकाह के मकसद से पूर्व-नियोजित हलाला इस्लाम की मूल भावना के खिलाफ है और इसे किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता।

सामाजिक और कानूनी बहस

भारत में विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे पारिवारिक मुद्दे लंबे समय से मुस्लिम पर्सनल लॉ के अधीन संचालित होते रहे हैं। लेकिन, जब इन प्रथाओं के नाम पर बलात्कार, यौन शोषण, डराना-धमकाना या धोखाधड़ी जैसे मामले सामने आते हैं, तो उन पर भारतीय दंड कानून लागू करना अनिवार्य हो जाता है। लंबे समय से देश भर में निकाह हलाला और बहुविवाह जैसी प्रथाओं के दुरुपयोग को लेकर बहस जारी है। कई महिला अधिकार संगठनों ने इसके गंभीर सामाजिक दुष्परिणामों को लेकर चिंता व्यक्त की है, जबकि दूसरी ओर कुछ धार्मिक संगठन इसे अपनी धार्मिक स्वतंत्रता का हिस्सा मानते हैं।

आगे की प्रक्रिया

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस कड़े रुख के बाद अब सभी की निगाहें पुलिस जांच पर टिकी हैं। अदालत ने हालांकि आरोपों की सच्चाई पर कोई टिप्पणी नहीं की है, लेकिन पुलिस को निर्देश दिया है कि मामले की जांच निष्पक्ष रूप से जारी रखी जाए। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से उन पीड़ितों को उम्मीद बंधी है जो धार्मिक प्रथाओं के नाम पर होने वाले उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाना चाहती हैं। अब जांच में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर ही ट्रायल कोर्ट यह तय करेगा कि आरोपी दोषी हैं या नहीं।

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