भारत और जापान के बीच ऐतिहासिक रक्षा समझौता
भारत और जापान ने एक बेहद महत्वपूर्ण रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जो आने वाले समय में हिंद महासागर और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा समीकरणों को पूरी तरह से बदल सकता है। इस डील के तहत जापान अपनी बेहद गोपनीय और आधुनिक रक्षा तकनीक भारत को सौंपने जा रहा है, जिसे रक्षा विशेषज्ञों के बीच 'निंजा टेक्नोलॉजी' के नाम से जाना जाता है। इस तकनीक का आधिकारिक नाम यूनिकॉर्न यानी यूनिफाइड कॉम्प्लेक्स रेडियो एंटीना है। नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापानी प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची के बीच हुई विस्तृत चर्चा के बाद इस साझेदारी की घोषणा की गई। पीएम मोदी ने इसे रक्षा प्रौद्योगिकी के इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत बताया है, जो समुद्री सुरक्षा के लिए मील का पत्थर साबित होगा। यह तकनीक मुख्य रूप से भारतीय नौसेना की क्षमताओं को कई गुना बढ़ाने का काम करेगी और चीन की समुद्री दादागिरी के खिलाफ एक कड़ा संदेश देगी।
क्या है यूनिकॉर्न तकनीक और यह कैसे काम करती है?
यूनिकॉर्न का पूरा नाम यूनिफाइड कॉम्प्लेक्स रेडियो एंटीना है, जो वास्तव में एक अत्यंत उन्नत एंटीना सिस्टम है। सामान्य तौर पर, युद्धपोतों पर दर्जनों अलग-अलग एंटीना खुले में लगे होते हैं, जो रडार की तरंगों को आसानी से प्रतिबिंबित (रिफ्लेक्ट) करते हैं। इन्हीं संकेतों के आधार पर दुश्मन देश के रडार जहाज की सटीक स्थिति का पता लगा लेते हैं। यूनिकॉर्न तकनीक इस पूरी समस्या का समाधान करती है। यह इन सभी बिखरे हुए एंटीना को एक ही रडार डोम के भीतर समेट देती है, जिसे रेडोम कहा जाता है। इस डोम के अंदर ही टैक्टिकल डेटा लिंक, संचार प्रणाली और दुश्मन के रडार को इंटरसेप्ट करने वाले इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स को फिट किया जाता है। सभी उपकरणों को एक ही स्थान पर एकीकृत करने से युद्धपोत का रडार क्रॉस सेक्शन काफी कम हो जाता है, जिससे दुश्मन के लिए उसे डिटेक्ट करना लगभग नामुमकिन हो जाता है।
भारत में होगा तकनीक का निर्माण
इस महाडील की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल तकनीक का हस्तांतरण नहीं है, बल्कि भारत में ही इसका निर्माण भी किया जाएगा। भारत की सरकारी कंपनी भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड यानी बीईएल इस तकनीक का निर्माण करेगी। जापान इस प्रोजेक्ट के लिए अपनी उन्नत डिजाइन विशेषज्ञता और तकनीकी ज्ञान भारत को प्रदान करेगा। यह पूरा उपक्रम प्रधानमंत्री के मेक इन इंडिया मिशन का एक हिस्सा है। इस महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट की आधारशिला नवंबर 2024 में टोक्यो में हुए एक समझौते के जरिए रखी गई थी, जिसके बाद दोनों देशों की सरकारों ने इसे तेजी से आगे बढ़ाया है। भारत दुनिया का दूसरा ऐसा देश बन गया है जिसे जापान अपनी रक्षा तकनीक साझा कर रहा है। इससे पहले जापान ने फिलीपींस को एयर-सर्विलांस रडार सिस्टम की आपूर्ति की थी। उल्लेखनीय है कि जापान ने 2014 में अपने हथियार निर्यात नियमों में बड़े बदलाव किए थे, जिसके बाद ही भारत के साथ ऐसी ऐतिहासिक डील संभव हो सकी है।
चीन के जासूसी नेटवर्क के लिए बड़ा झटका
दक्षिण चीन सागर और हिंद महासागर में चीन का जासूसी नेटवर्क बहुत सक्रिय है। चीनी नौसेना और तटरक्षक बल रडार फिंगरप्रिंटिंग के माध्यम से अन्य देशों के युद्धपोतों पर लगातार निगरानी रखते हैं। वे हर जहाज के सिग्नल पैटर्न का डेटाबेस तैयार करते हैं। यूनिकॉर्न मास्ट चीन के इस पूरे जासूसी तंत्र को ध्वस्त करने की क्षमता रखता है। जापान अपनी मोगामी-क्लास स्टील्थ फ्रिगेट्स में पहले से ही इस तकनीक का उपयोग कर रहा है, जो युद्धपोत के रडार सिग्नल को 100 गुना तक कम कर देती है। जब जहाज के एंटीना बाहर नहीं दिखेंगे, तो चीन को युद्धपोत का सटीक सिग्नल पैटर्न प्राप्त नहीं हो पाएगा, जिससे उनका पूरा ट्रैकिंग सिस्टम विफल हो जाएगा। इसके बाद भारतीय नौसेना पूरी निडरता के साथ किसी भी चुनौतीपूर्ण इलाके में अपने ऑपरेशन को अंजाम देने में सक्षम होगी।
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बदलेगा पावर बैलेंस
यह रक्षा साझेदारी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए एक गेम चेंजर साबित हो सकती है। अपनी भारत यात्रा के दौरान जापानी प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि एक स्वतंत्र और खुला इंडो-पैसिफिक क्षेत्र दोनों देशों की सर्वोच्च प्राथमिकता है। दोनों लोकतांत्रिक राष्ट्र मिलकर इस क्षेत्र में प्रगति और सुरक्षा का मार्ग प्रशस्त करेंगे। जानकारों का यह मानना है कि यह सुरक्षा समझौता बीजिंग के लिए एक सख्त और स्पष्ट संदेश है। अमेरिका और जापान पहले से ही चीन की आक्रामक नीतियों के खिलाफ एकजुट होकर रणनीति तैयार कर रहे हैं, और भारत को इस जापानी तकनीक का मिलना उस रणनीति का पहला ठोस और निर्णायक कदम है। इससे एशिया में शक्ति संतुलन मजबूत होगा और चीन की मनमानी तथा विस्तारवादी नीतियों पर प्रभावी रूप से लगाम लगेगी।
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