हार्ट अटैक का साइलेंट ट्रिगर है बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, जानिए शरीर में कितना होना चाहिए इसका सामान्य स्तर

कोलेस्ट्रॉल का असंतुलित स्तर दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ा देता है। इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल की सीनियर कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. वनीता अरोरा से जानिए कि शरीर में गुड, बैड और टोटल कोलेस्ट्रॉल की सही मात्रा कितनी होनी चाहिए।

दिल की सेहत और कोलेस्ट्रॉल का कनेक्शन

हमारे शरीर को बेहतर ढंग से काम करने के लिए कई तरह के तत्वों की आवश्यकता होती है, जिनमें से एक कोलेस्ट्रॉल भी है। कोलेस्ट्रॉल शरीर के लिए एक बेहद आवश्यक वसा यानी फैट है, जो कोशिकाओं के निर्माण, महत्वपूर्ण हार्मोनों के स्राव और विटामिन D के उत्पादन में एक बड़ी भूमिका निभाता है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब शरीर में इसकी मात्रा जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती है। बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल सीधे तौर पर हमारे दिल की सेहत के लिए एक बड़ा खतरा बन जाता है।

जब रक्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा अधिक हो जाती है, तो यह धीरे-धीरे धमनियों की दीवारों पर जमने लगता है। इस जमाव के कारण धमनियों के अंदर का रास्ता संकरा हो जाता है, जिससे शरीर में रक्त का प्रवाह पूरी तरह से प्रभावित होता है। रक्त प्रवाह बाधित होने की वजह से दिल को काम करने के लिए ज्यादा मशक्कत करनी पड़ती है, जिससे आगे चलकर हार्ट अटैक और ब्रेन स्ट्रोक जैसी गंभीर और जानलेवा बीमारियों की स्थिति पैदा हो जाती है। यही वजह है कि हृदय रोग विशेषज्ञ समय-समय पर लिपिड प्रोफाइल टेस्ट कराने की सलाह देते हैं ताकि किसी भी अनहोनी से बचा जा सके।

कोलेस्ट्रॉल के प्रकार और उनकी भूमिका

दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल की सीनियर कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. वनीता अरोरा के मुताबिक, जब भी हम कोलेस्ट्रॉल की बात करते हैं, तो केवल कुल कोलेस्ट्रॉल यानी टोटल कोलेस्ट्रॉल के स्तर को देखना ही काफी नहीं होता। दिल की सेहत को गहराई से समझने के लिए हमें शरीर में मौजूद अलग-अलग तरह के कोलेस्ट्रॉल के बारे में जानना होगा। शरीर में मुख्य रूप से तीन चीजें देखी जाती हैं:

  • बैड कोलेस्ट्रॉल (LDL): इसे लो-डेंसिटी लिपोप्रोटीन भी कहा जाता है। इसका मुख्य काम धमनियों में जाकर फैट यानी वसा को जमा करना होता है। यदि इसकी मात्रा बढ़ जाए, तो यह दिल की बीमारियों का सबसे बड़ा कारण बनता है।
  • गुड कोलेस्ट्रॉल (HDL): इसे हाई-डेंसिटी लिपोप्रोटीन कहते हैं। यह दिल के लिए सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। यह धमनियों में जमा अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल को हटाकर उसे वापस लिवर तक पहुंचाता है, जहां से इसे शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।
  • ट्राइग्लिसराइड्स: यह भी एक प्रकार का फैट है जो खून में पाया जाता है। जब हम जरूरत से ज्यादा कैलोरी लेते हैं, तो शरीर उसे ट्राइग्लिसराइड्स में बदल देता है। इसका बढ़ा हुआ स्तर भी दिल के लिए बहुत नुकसानदेह होता है।

कितना होना चाहिए कोलेस्ट्रॉल का सही स्तर?

डॉ. वनीता अरोरा ने इस बात पर विशेष जोर दिया है कि स्वस्थ रहने के लिए कोलेस्ट्रॉल के अलग-अलग मानकों का सामान्य स्तर पर रहना बेहद जरूरी है। उन्होंने इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण आंकड़े साझा किए हैं, जो इस प्रकार हैं:

  • टोटल कोलेस्ट्रॉल: रक्त में कुल कोलेस्ट्रॉल का स्तर हमेशा 200 mg/dL से कम होना चाहिए। यदि यह इससे अधिक होता है, तो सावधानी बरतने की जरूरत है।
  • बैड कोलेस्ट्रॉल (LDL): एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल का स्तर 100 mg/dL से कम होना सबसे बेहतर माना जाता है। हालांकि, जिन लोगों को पहले से ही दिल की बीमारी, डायबिटीज या स्ट्रोक का खतरा है, उनके लिए डॉक्टरों द्वारा LDL का लक्ष्य इससे भी काफी कम रखा जाता है।
  • गुड कोलेस्ट्रॉल (HDL): चूंकि यह हमारे दिल की सुरक्षा करता है, इसलिए इसका स्तर शरीर में पर्याप्त होना चाहिए। पुरुषों के शरीर में इसका स्तर कम से कम 40 mg/dL और महिलाओं में कम से कम 50 mg/dL या उससे अधिक होना जरूरी है।
  • ट्राइग्लिसराइड्स: खून में ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर 150 mg/dL से कम होना अच्छा और सुरक्षित माना जाता है।

यदि आपकी जांच रिपोर्ट में इनमें से कोई भी स्तर सामान्य से ऊपर या नीचे आता है, तो दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा काफी हद तक बढ़ जाता है। इसलिए इन आंकड़ों पर कड़ी नजर रखना हर व्यक्ति के लिए जरूरी है।

हार्ट डिजीज का खतरा कब बनता है गंभीर?

डॉ. अरोरा के अनुसार, जब शरीर में LDL यानी बैड कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर लंबे समय तक कंक्रीट की तरह बढ़ा रहता है, तो धमनियों के भीतर प्लाक (एक तरह की कठोर परत) का निर्माण होने लगता है। इस प्लाक के कारण धमनियां न केवल संकरी हो जाती हैं बल्कि उनका लचीलापन भी खत्म होने लगता है। इसके परिणामस्वरूप, दिल की मांसपेशियों तक पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन और पोषक तत्वों से भरपूर खून नहीं पहुंच पाता है।

धीरे-धीरे यह स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि धमनियां पूरी तरह से ब्लॉक हो सकती हैं, जिससे अचानक हार्ट अटैक आ सकता है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या के शुरुआती दौर में शरीर में कोई भी स्पष्ट लक्षण या दर्द महसूस नहीं होता है। यही कारण है कि चिकित्सा जगत में इसे एक साइलेंट रिस्क फैक्टर यानी चुपचाप नुकसान पहुंचाने वाला कारक माना जाता है। व्यक्ति को तब तक अपनी इस स्थिति का अंदाजा नहीं होता जब तक कि वह कोई नियमित ब्लड टेस्ट नहीं कराता या फिर उसे दिल से जुड़ी कोई तकलीफ नहीं शुरू हो जाती।

किन लोगों को रहता है इसका सबसे ज्यादा खतरा?

विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ खास तरह की स्वास्थ्य स्थितियों और जीवनशैली वाले लोगों में हाई कोलेस्ट्रॉल होने की संभावना बहुत अधिक होती है। इन श्रेणियों में निम्नलिखित लोग शामिल हैं:

  • डायबिटीज के मरीज: जिन लोगों को मधुमेह की बीमारी है, उनके शरीर में कोलेस्ट्रॉल असंतुलित होने का खतरा बहुत ज्यादा रहता है।
  • हाई ब्लड प्रेशर: उच्च रक्तचाप के मरीजों की धमनियों पर पहले से ही दबाव रहता है, ऐसे में कोलेस्ट्रॉल का बढ़ना उनके लिए दोहरा खतरा पैदा करता है।
  • मोटापे से ग्रसित लोग: शरीर का अत्यधिक वजन और अनियंत्रित बॉडी मास इंडेक्स कोलेस्ट्रॉल के स्तर को बिगाड़ देता है।
  • पारिवारिक इतिहास (फैमिली हिस्ट्री): जिन लोगों के परिवार में पहले से ही माता-पिता या किसी करीबी को दिल की बीमारी रही हो, उन्हें आनुवंशिक कारणों से इसका खतरा ज्यादा होता है।
  • अस्वास्थ्यकर जीवनशैली: धूम्रपान करने वाले, शारीरिक रूप से पूरी तरह निष्क्रिय रहने वाले यानी व्यायाम न करने वाले लोग और अत्यधिक मात्रा में तली-भुनी, मसालेदार या प्रोसेस्ड फूड खाने वाले लोगों में हाई कोलेस्ट्रॉल का खतरा बहुत तेजी से बढ़ता है।

डॉक्टर से कब संपर्क करें और बचाव के उपाय

यदि आपकी लिपिड प्रोफाइल टेस्ट की रिपोर्ट में LDL या ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर लगातार बढ़ा हुआ आ रहा है, तो इसे बिल्कुल भी नजरअंदाज न करें। इसके अलावा, यदि आपको दैनिक जीवन में नीचे दिए गए लक्षण महसूस होते हैं, तो तुरंत किसी योग्य कार्डियोलॉजिस्ट से मिलकर सलाह लेनी चाहिए:

  • सीने में किसी भी प्रकार का दर्द, भारीपन या बेचैनी महसूस होना।
  • हल्का सा काम करने या पैदल चलने पर ही सांस फूलने लगना।
  • बिना किसी भारी शारीरिक श्रम के बहुत जल्दी थकान महसूस होना।
  • चक्कर आना या दिल की धड़कन का अचानक बहुत तेज हो जाना।

डॉक्टरों के मुताबिक, सही समय पर की गई जांच और उचित चिकित्सकीय उपचार से दिल की बीमारियों के खतरे को बहुत बड़े पैमाने पर टाला जा सकता है। दिल को हमेशा तंदुरुस्त और सेहतमंद बनाए रखने के लिए एक संतुलित और पोषक तत्वों से भरपूर डाइट बेहद जरूरी है। आपको अपने दैनिक आहार में ताजे फल, हरी पत्तेदार सब्जियां, साबुत अनाज, विभिन्न प्रकार की दालें, ओट्स और गुड फैट्स को प्राथमिकता देनी चाहिए। इसके विपरीत, बाहर की तली-भुनी चीजें, ट्रांस फैट वाली वस्तुएं, पैकेज्ड या प्रोसेस्ड फूड और अत्यधिक चीनी वाले मीठे खाद्यों से पूरी तरह दूरी बना लेनी चाहिए। एक स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर ही हम अपने दिल को लंबी उम्र दे सकते हैं।

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