हिंदू धर्म में गणेश पूजा का विशेष महत्व है और प्रत्येक मास में आने वाली चतुर्थी तिथि पूरी तरह से विघ्नहर्ता भगवान गणेश को समर्पित होती है। पंचांग के अनुसार, एक महीने में दो बार चतुर्थी तिथि आती है, जिसमें से एक कृष्ण पक्ष और दूसरी शुक्ल पक्ष में पड़ती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्रत रखकर और विधि-विधान से बप्पा की आराधना करने से जीवन के सभी संकट दूर हो जाते हैं और घर में सुख-शांति का वास होता है। आषाढ़ मास की शुरुआत के साथ ही अब कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि आने वाली है, जिसे कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। इस दिन बप्पा के कृष्णपिङ्गल स्वरूप की विशेष पूजा की जाती है। आइए जानते हैं इस साल यह व्रत किस दिन रखा जाएगा, पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है और इसकी संपूर्ण विधि क्या है।
कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी की तिथि और शुभ मुहूर्त
साल 2026 में आषाढ़ मास की कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी का व्रत 3 जुलाई 2026 को रखा जाएगा। ऐसी मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से इस दिन व्रत रखते हैं, उनके कार्यों में आने वाली सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं और उन्हें समृद्धि की प्राप्ति होती है।
वैदिक पंचांग की गणना के अनुसार, आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का प्रारंभ 3 जुलाई 2026 को सुबह 11 बजकर 20 मिनट पर होने जा रहा है। वहीं, इस तिथि का समापन अगले दिन यानी 4 जुलाई 2026 को दोपहर 12 बजकर 39 मिनट पर होगा। शास्त्रों के अनुसार, संकष्टी चतुर्थी के व्रत में भगवान श्री गणेश की पूजा के साथ-साथ रात के समय चंद्रदेव की पूजा और दर्शन का भी अत्यंत महत्व है। चंद्र दर्शन के बिना यह व्रत अधूरा माना जाता है। चूंकि 3 जुलाई को चतुर्थी तिथि के दौरान ही शाम को चंद्रोदय होगा, इसलिए व्रत 3 जुलाई को ही रखा जाएगा। अगले दिन यानी 4 जुलाई को दोपहर में ही चतुर्थी समाप्त हो जाएगी और रात में चतुर्थी तिथि नहीं रहेगी।
इस विशेष दिन पर चंद्रोदय और भद्रा का समय इस प्रकार रहेगा:
- चंद्रोदय का समय: 3 जुलाई को रात 09 बजकर 53 मिनट पर चंद्रमा उदय होंगे, जिसके बाद उन्हें अर्घ्य दिया जा सकेगा।
- भद्रा काल का समय: इस दिन सुबह 05 बजकर 28 मिनट से सुबह 11 बजकर 20 मिनट तक भद्रा रहेगी। हालांकि, यह पाताल लोक की भद्रा है, इसलिए इसमें पूजा-पाठ और शुभ कार्य किए जा सकते हैं।
सुबह की पूजा विधि: इस तरह करें बप्पा का स्वागत
कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की कृपा पाने के लिए सुबह के समय इस विधि से पूजा आरंभ करनी चाहिए:
- इस पावन दिन पर सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठें और दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होकर स्नान करें। इस दिन लाल या पीले रंग के साफ-सुथरे वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
- इसके बाद घर के मंदिर या पूजा स्थल की अच्छी तरह से साफ-सफाई करें और भगवान के सामने हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
- अब पूजा के लिए एक लकड़ी की साफ चौकी स्थापित करें और उस पर लाल रंग का कपड़ा बिछाएं। ध्यान रखें कि पूजा करते समय आपका मुख हमेशा उत्तर या पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए।
- इस चौकी पर भगवान गणेश जी की प्रतिमा या तस्वीर को श्रद्धापूर्वक स्थापित करें।
- इसके बाद दीपक और धूप जलाएं। बप्पा को रोली और सिंदूर का तिलक लगाएं, क्योंकि गणेश जी को सिंदूर अत्यंत प्रिय है।
- इसके बाद भगवान को 21 दूर्वा की घास अर्पित करें और मोदक या बेसन के लड्डुओं का भोग लगाएं।
- पूजा के दौरान श्रद्धापूर्वक बप्पा के मंत्र 'ॐ गं गणपतये नमः' का जाप करें।
शाम की पूजा और चंद्रदेव को अर्घ्य देने की विधि
संकष्टी चतुर्थी के व्रत में शाम की पूजा का बहुत अधिक महत्व होता है। शाम को चंद्रोदय से पहले नीचे दी गई विधि के अनुसार पूजा संपन्न करें:
- शाम के समय एक बार फिर स्नान करें या हाथ-पैर धोकर पूरी तरह से पवित्र हो जाएं।
- इसके बाद सुबह की तरह ही दोबारा भगवान गणेश की धूप, दीप और पुष्पों से पूजा करें।
- पूजा के स्थान पर बैठकर कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी व्रत की पौराणिक कथा को पढ़ें या सुनें।
- कथा पूर्ण होने के बाद कपूर जलाकर भगवान गणेश जी की आरती उतारें।
- जब रात में चंद्रोदय हो जाए, तब एक चांदी या तांबे के लोटे में शुद्ध जल लें। उसमें थोड़ा सा दूध, चंदन और अक्षत (साबुत चावल) मिलाएं।
- इस मिश्रण से चंद्रदेव को अर्घ्य दें और मन ही मन अपनी मनोकामनाएं कहें।
- अर्घ्य देने के बाद हाथ जोड़कर चंद्र देव को प्रणाम करें और अपने पूरे परिवार की सुख, समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना करें।
- अंत में भगवान गणेश का ध्यान करते हुए प्रसाद ग्रहण करें और अपने व्रत का पारण करें।
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