राजनयिक संबंधों से परे एक आत्मीय रिश्ता
भारत और जापान के बीच कूटनीतिक संबंधों के इतिहास में कई ऐतिहासिक मोड़ आए हैं, लेकिन वर्तमान समय में दोनों देशों के बीच जो प्रगाढ़ता और भरोसा दिखाई देता है, उसकी नींव केवल सरकारी फाइलों या औपचारिक समझौतों पर नहीं टिकी है। वर्तमान में जापान की नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची की भारत यात्रा के साथ द्विपक्षीय संबंधों को एक नया आयाम मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। लेकिन इस कूटनीतिक गर्मजोशी के पीछे भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जापान के साथ करीब चार दशक पुराना एक गहरा और बेहद व्यक्तिगत रिश्ता है। यह कहानी आज के समय की नहीं है, बल्कि उस दौर की है जब नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय राजनीति के पटल पर भी नहीं आए थे और एक साधारण स्वयंसेवक के रूप में काम कर रहे थे। एक युवा स्वयंसेवक से लेकर देश के प्रधानमंत्री बनने तक के इस सफर में जापान उनके दिल के बेहद करीब रहा है, और यही आत्मीयता आज दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी का सबसे मजबूत स्तंभ बनकर उभरी है।
नेपाल की वादियों में हुई दोस्ती और चिट्ठियों का वो दौर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के बीच पहला सीधा और व्यक्तिगत जुड़ाव वर्ष 1980 के दशक की शुरुआत में हुआ था। उस समय वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, यानी RSS के एक युवा प्रचारक के रूप में काम कर रहे थे। इसी दौरान उन्हें नेपाल की यात्रा पर जाने का अवसर मिला। नेपाल के शांत और खूबसूरत वातावरण में उनकी मुलाकात जापान के नागोया शहर से आए एक जापानी युवक से हुई। दोनों अलग-अलग संस्कृतियों और भाषाओं से ताल्लुक रखते थे, लेकिन वैचारिक स्तर पर उनके बीच ऐसी गहरी दोस्ती हुई जो समय की सीमाओं को लांघ गई। नेपाल से लौटने के बाद भी दोनों के बीच संपर्क बना रहा। उस दौर में आज की तरह ईमेल या सोशल मीडिया जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं, इसलिए दोनों मित्रों ने चिट्ठियों के जरिए अपनी दोस्ती को जिंदा रखा। जापानी मित्र नरेंद्र मोदी को जापान के मशहूर और उच्च गुणवत्ता वाले ब्रांड के जूते, टी-शर्ट और अन्य उपयोगी उपहार भेजा करता था। इसके बदले में नरेंद्र मोदी ने अपने जापानी मित्र को भारतीय संस्कृति और दर्शन के प्रतीक के रूप में पवित्र ग्रंथ भगवद्गीता की एक प्रति भेंट की थी। यह घटना दर्शाती है कि नरेंद्र मोदी बहुत कम उम्र में ही अंतरराष्ट्रीय संबंधों को केवल राजनीतिक नजरिए से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और मानवीय दृष्टिकोण से देखते थे।
गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में पहला कदम और शिंजो आबे से मुलाकात
जैसे-जैसे समय बीतता गया, जापान की कार्यप्रणाली, वहां की तकनीक और अनुशासन के प्रति नरेंद्र मोदी का आकर्षण और अधिक गहरा होता गया। जब वह गुजरात के मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने इस जुड़ाव को एक नए स्तर पर ले जाने का फैसला किया। वर्ष 2007 में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने जापान का अपना पहला आधिकारिक दौरा किया। यह दौरा केवल गुजरात में निवेश लाने के उद्देश्य से किया गया कोई सामान्य कार्यक्रम नहीं था, बल्कि नरेंद्र मोदी जापान की प्रगति के मॉडल को गहराई से समझने और उसे गुजरात में लागू करने के मिशन पर गए थे। उनके साथ एक विशाल 40 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल भी जापान पहुंचा था। इस ऐतिहासिक यात्रा के दौरान उन्होंने जापान के प्रमुख औद्योगिक केंद्रों जैसे टोक्यो, ओसाका, हिरोशिमा और कोबे का दौरा किया।
इस यात्रा के दौरान उन्होंने जापान की दुनिया प्रसिद्ध कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों और नीति निर्माताओं के साथ लंबी बैठकें कीं। इनमें प्रमुख रूप से निम्नलिखित उद्योग समूह शामिल थे:
- मित्सुबिशी
- मित्सुई
- सुमितोमो
- मारुबेनी
- सुजुकी
- तोशिबा
- निप्पॉन स्टील
- निसान स्टील
इन्हीं बैठकों के परिणामस्वरूप जापान एक्सटर्नल ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन, यानी JETRO और गुजरात सरकार के बीच कई महत्वपूर्ण निवेश समझौतों पर हस्ताक्षर हुए, जिसने आगे चलकर गुजरात को एक वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने में मदद की। इसी ऐतिहासिक यात्रा के दौरान नरेंद्र मोदी की मुलाकात जापान के तत्कालीन और भावी प्रधानमंत्री शिंजो आबे से हुई थी। पहली ही मुलाकात में दोनों नेताओं के बीच एक अनूठा और मजबूत वैचारिक तालमेल स्थापित हो गया। दोनों के बीच यह विश्वास इतना गहरा था कि शिंजो आबे की बीमारी के दिनों में भी नरेंद्र मोदी लगातार उनका हालचाल लेते रहते थे और उनके स्वास्थ्य के लिए चिंतित रहते थे। यह राजनीतिक मित्रता बाद में वैश्विक राजनीति की सबसे चर्चित और मजबूत साझेदारियों में से एक बन गई।
बुलेट ट्रेन का सपना और सेंसोजी मंदिर का वो अनुभव
वर्ष 2007 की इस जापानी यात्रा के दौरान ही भारत में बुलेट ट्रेन चलाने के सपने की नींव पड़ी थी। नरेंद्र मोदी ने जब जापान की प्रसिद्ध शिंकानसेन बुलेट ट्रेन में यात्रा की, तो वह उसकी गति, सुरक्षा और समय की पाबंदी से बेहद प्रभावित हुए। उन्हें इस यात्रा के दौरान बुलेट ट्रेन के ड्राइवर के कॉकपिट में बैठने का एक दुर्लभ और अनूठा अवसर मिला। वहां बैठकर उन्होंने जापानी इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों से भूकंप सुरक्षा प्रणालियों, संचालन पद्धतियों और ट्रेन की तकनीकी बारीकियों पर बेहद विस्तृत और सूक्ष्म सवाल पूछे। यही प्रत्यक्ष अनुभव आगे चलकर भारत की पहली हाई-स्पीड रेल परियोजना, यानी मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन की रूपरेखा तैयार करने का मुख्य आधार बना।
इस सफर के दौरान एक और दिलचस्प पहलू सामने आया। भाषा की कठिनाई के बावजूद नरेंद्र मोदी ने जापानी बच्चों के साथ बड़ी आसानी से संवाद स्थापित कर लिया। उन्होंने अपनी यात्रा का एक बड़ा हिस्सा ट्रेन में जापानी बच्चों के साथ खेलते और मुस्कुराते हुए बिताया। इसके अलावा, टोक्यो के ऐतिहासिक और पवित्र सेंसोजी मंदिर के दौरे के समय भी उनका दृष्टिकोण केवल एक पर्यटक का नहीं था। उन्होंने वहां की भीड़ प्रबंधन प्रणाली, कर्मचारियों को दी जाने वाली ट्रेनिंग और मंदिर परिसर की साफ-सफाई व शहरी व्यवस्था का बहुत बारीकी से निरीक्षण किया। उनका मानना था कि भारत के प्राचीन तीर्थस्थलों में भी इसी तरह की आधुनिक और व्यवस्थित प्रबंधन प्रणालियों को लागू किया जाना चाहिए ताकि श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं मिल सकें।
दीपक का उदाहरण और गुजरात के विकास में जापानी दर्शन
जापान की एक प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी में व्याख्यान के दौरान जब वहां के छात्रों और विश्लेषकों ने नरेंद्र मोदी से एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव और उसके आर्थिक-सैन्य प्रभुत्व को लेकर एक तीखा सवाल पूछा, तो उन्होंने अपनी कूटनीतिक सूझबूझ का परिचय देते हुए एक बेहद सुंदर उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि अंधेरे को कभी भी तलवार के प्रहार से नहीं मिटाया जा सकता, बल्कि उसे दूर करने के लिए एक छोटा सा दीपक ही पर्याप्त होता है। उनका स्पष्ट इशारा था कि भारत और जापान अपने साझा लोकतांत्रिक मूल्यों, स्वतंत्रता और शांतिप्रिय दृष्टिकोण के बल पर दुनिया के लिए उसी दीपक की तरह प्रकाश का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।
नरेंद्र मोदी का जापान के प्रति लगाव केवल औद्योगिक निवेश तक ही सीमित नहीं था, बल्कि वह जापानी संस्कृति के जन-भागीदारी और सामाजिक अनुशासन के मॉडल को भारत में भी देखना चाहते थे। गुजरात के स्वर्ण जयंती समारोह के दौरान उन्होंने जापान में रह रहे गुजराती समुदाय के लोगों से एक भावुक अपील की थी। उन्होंने कहा था कि वे गांधीनगर में बन रहे महात्मा मंदिर के निर्माण के लिए जापान की पवित्र मिट्टी और पानी भेजें। साथ ही उन्होंने प्रवासी भारतीयों से यह भी आग्रह किया कि वे अपने जापानी मित्रों को कम से कम एक बार भारत घूमने के लिए प्रेरित करें ताकि दोनों देशों के आम लोगों के बीच सांस्कृतिक संबंधों को और मजबूत किया जा सके।
जब गुजरात का कच्छ क्षेत्र भीषण भूकंप की तबाही से उबर रहा था, तब नरेंद्र मोदी ने पुनर्निर्माण कार्यों के लिए जापान के कोबे शहर के भूकंप-रोधी मॉडल को अपनाने पर विशेष बल दिया था। इसके अलावा, गुजरात में बच्चों के बीच कुपोषण की समस्या से निपटने के लिए उन्होंने अपने अधिकारियों की एक विशेष टीम को जापान की सरकारी स्कूलों की मिड-डे मील व्यवस्था का गहराई से अध्ययन करने के लिए भेजा था, ताकि जापानी पोषण और स्वच्छता तकनीकों को स्थानीय स्तर पर लागू किया जा सके।
2012 का ऐतिहासिक दौरा: नवरात्रि का व्रत और औद्योगिक महाशक्ति का साथ
वर्ष 2012 में नरेंद्र मोदी एक बार फिर जापान के दौरे पर गए। इस बार उनका स्वागत एक ऐसे असाधारण सम्मान और प्रोटोकॉल के साथ किया गया जो सामान्यतः किसी राज्य के मुख्यमंत्री को नहीं मिलता है। यह यात्रा भारत और जापान के बीच राजनयिक संबंधों की 60वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित की गई थी। इस अत्यंत व्यस्त और महत्वपूर्ण दौरे में नरेंद्र मोदी ने केवल पांच दिनों के भीतर जापान के पांच प्रमुख शहरों की यात्रा की और 40 से अधिक उच्च स्तरीय कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। जापान के सबसे प्रतिष्ठित और प्रभावशाली आर्थिक समाचार पत्र निक्केई ने अपनी एक रिपोर्ट में नरेंद्र मोदी को भारत का सबसे अधिक उद्योग-अनुकूल नेता घोषित किया था।
इस यात्रा की एक और अनूठी बात यह थी कि उस समय हिंदू कैलेंडर के अनुसार नवरात्रि के पावन दिन चल रहे थे। नरेंद्र मोदी अपने कड़े नियमों के तहत पूर्ण उपवास यानी व्रत पर थे और केवल गुनगुना पानी पी रहे थे। इसके बावजूद, उनकी ऊर्जा और कार्यक्षमता में कोई कमी नहीं आई। उन्होंने बिना थके जापानी निवेशकों और उद्योगपतियों के साथ घंटों तक लंबी बैठकें कीं। जापान के सुप्रसिद्ध ऑटोमोबाइल ब्रांड सुजुकी के तत्कालीन प्रमुख ओसामु सुजुकी के व्यक्तिगत निमंत्रण पर नरेंद्र मोदी उनके घर गए और पारंपरिक जापानी आतिथ्य का अनुभव किया। इस मुलाकात के बाद उन्होंने अचानक सुजुकी के विशाल ऑटोमोबाइल प्लांट का दौरा करने की इच्छा जताई। उन्होंने वहां लगभग तीन घंटे से अधिक का समय बिताया, निर्माण प्रक्रिया की हर छोटी-बड़ी तकनीक को समझा और वहां कार्यरत भारतीय इंजीनियरों से विस्तार से चर्चा की। उनका एकमात्र उद्देश्य गुजरात को जापानी निवेश का सबसे बड़ा और आधुनिक केंद्र बनाना था।
इसी दौरे के दौरान JETRO के बिजनेस फोरम में बोलते हुए नरेंद्र मोदी ने एक बेहद प्रभावी वक्तव्य दिया था जो आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने कहा था, 'जापान के पास समृद्ध अनुभव की अटूट ताकत है और गुजरात के पास असीम उद्यम की शक्ति है। जापान के पास दुनिया की सर्वश्रेष्ठ तकनीक है और गुजरात के पास उस तकनीक को अपनाने की क्षमता है।' यह सोच दोनों देशों के आर्थिक संबंधों के लिए मील का पत्थर साबित हुई। जब वह कोबे बंदरगाह के निरीक्षण पर थे, तो उन्होंने केवल घाट पर खड़े रहकर देखने के बजाय एक छोटी नाव में सवार होकर पूरे ऑपरेशनल क्षेत्र का चक्कर लगाया और बंदरगाह की कार्यप्रणाली का अध्ययन किया। वहां के विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर को देखकर उन्होंने दृढ़ संकल्प के साथ कहा था कि 'एक दिन मैं भारत के धोलेरा को भी ऐसा ही बनाऊंगा।' बाद में विकसित किया गया धोलेरा स्पेशल इन्वेस्टमेंट रीजन, यानी SIR इसी दूरदर्शी सोच का परिणाम है।
मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री तक: सपनों को धरातल पर उतारने का सफर
वर्ष 2014 में देश के प्रधानमंत्री का कार्यभार संभालने के बाद नरेंद्र मोदी ने जापान के साथ अपने इन सभी पुराने अनुभवों, सीख और व्यक्तिगत संबंधों को भारत की विदेश नीति का एक मुख्य हिस्सा बना दिया। आज भारत में जो बड़े और युगांतरकारी प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं, वे अचानक हवा में तैयार नहीं हुए हैं, बल्कि उनकी जड़ें नरेंद्र मोदी की उन्हीं पुरानी यात्राओं और आत्मीय अनुभवों में छिपी हैं।
आज भारत और जापान के बीच रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी के तहत कई ऐतिहासिक परियोजनाओं पर काम चल रहा है, जिनमें मुख्य रूप से निम्नलिखित शामिल हैं:
- मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड बुलेट ट्रेन परियोजना
- दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, यानी DMIC
- दोनों देशों के बीच उन्नत रक्षा और सुरक्षा सहयोग
- वैश्विक स्तर पर सप्लाई चेन रेजिलिएंस पहल
- अत्याधुनिक तकनीक और हाई-टेक साझेदारी
ये सभी परियोजनाएं इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि कैसे एक युवा स्वयंसेवक के रूप में नागोया के युवक के साथ शुरू हुई दोस्ती और चिट्ठियों का वो सफर आज दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों के बीच की सबसे अटूट और मजबूत रणनीतिक साझेदारी की आधारशिला बन चुका है। सानाए ताकाइची की वर्तमान भारत यात्रा इसी पुरानी और समय की कसौटी पर खरी उतरी दोस्ती को और अधिक ऊंचाई पर ले जाने का काम करेगी।
https://hindi.news18.com/news/nation/untold-story-of-pm-narendra-modi-and-his-decades-old-japan-connection-ws-l-10622263.html