अयोध्या के भव्य और ऐतिहासिक राम मंदिर में भक्तों द्वारा श्रद्धापूर्वक चढ़ाए गए दान की राशि में बड़े पैमाने पर लूटपाट और चोरी का सनसनीखेज मामला सामने आने के बाद अब कानून और प्रशासन का शिकंजा आरोपियों पर बेहद तेजी से कसता जा रहा है। इस महापाप के खुलासे के बाद पूरे देश के रामभक्तों में गहरा रोष है, जिसके मद्देनजर अब इस मामले में अत्यंत त्वरित गति से सख्त दंडात्मक कार्रवाइयां शुरू हो चुकी हैं। इसी कड़ी में अयोध्या विकास प्राधिकरण ने इस मामले के प्रमुख आरोपियों में से एक, लवकुश मिश्रा के गैर-कानूनी ढंग से निर्माणाधीन मकान पर बुलडोजर चलाने के उद्देश्य से एक आधिकारिक नोटिस जारी कर दिया है। इसके साथ ही, इस पूरे वित्तीय घोटाले की तह तक जाने के लिए गठित की गई विशेष जांच टीम यानी SIT ने भी आज धार्मिक नगरी अयोध्या में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए जांच के दूसरे चरण का आगाज कर दिया है। कानूनी मोर्चे पर भी सरगर्मी काफी बढ़ गई है क्योंकि फैजाबाद बार एसोसिएशन के वकीलों ने स्थानीय पुलिस थाने में लिखित तहरीर देकर मंदिर ट्रस्ट के प्रमुख पदाधिकारियों, चंपत राय और अनिल मिश्रा के विरुद्ध तत्काल प्रभाव से FIR दर्ज कर कानूनी कार्रवाई शुरू करने की पुरजोर मांग की है।
अयोध्या राम मंदिर में दान की लूट: गुनहगारों पर कसता शिकंजा और नैतिक जिम्मेदारी का सवाल
इस गंभीर चोरी के प्रकरण में अयोध्या पुलिस ने अब तक की गई जांच के दौरान बरामद हुई नकदी और संपत्तियों का जो विस्तृत लेखा-जोखा जनता के समक्ष प्रस्तुत किया है, वह बेहद चौंकाने वाला है। पुलिस के आधिकारिक ब्यौरे के अनुसार, इस पूरे घोटाले में अब तक कुल 79 लाख 85 हजार रुपये की भारी-भरकम राशि सफलतापूर्वक बरामद की जा चुकी है। इसमें सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि लूट की इस विशाल राशि में से सबसे बड़ा हिस्सा, जो कि कुल 20 लाख 39 हजार 220 रुपये है, अकेले अविनाश शुक्ला नाम के आरोपी के कब्जे से बरामद किया गया है। पुलिस द्वारा जब्त की गई इस बड़ी धनराशि में भारतीय मुद्रा के साथ-साथ विदेशी करेंसी के रूप में 1121 डॉलर भी शामिल हैं, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि विदेशी दानदाताओं द्वारा चढ़ाए गए धन पर भी इन चोरों की गिद्ध दृष्टि थी। अविनाश शुक्ला मूल रूप से उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले का रहने वाला है। महज तीन महीने पहले तक की उसकी पृष्ठभूमि देखें तो वह राम मंदिर के बाहरी परिसर के पास एक छोटा सा ठेला लगाकर पीने का पानी बेचने का मामूली काम करता था। उसका सगा भाई एक स्थानीय योग संस्थान में योग का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहा था, जिसने अविनाश को भी अपने साथ वहीं रख लिया। इसी योग संस्थान में रहने के दौरान अविनाश धीरे-धीरे राम मंदिर ट्रस्ट के प्रभाव रखने वाले लोगों और पदाधिकारियों के सीधे संपर्क में आ गया। इसके पश्चात, उस योग संस्थान के प्रभारी ने अपनी व्यक्तिगत सिफारिश का उपयोग करते हुए मंदिर ट्रस्ट के वरिष्ठ पदाधिकारियों से कहा और अविनाश शुक्ला को राम मंदिर में आने वाले भारी-भरकम चढ़ावे और दान पात्रों के नोटों की गिनती करने के बेहद संवेदनशील और भरोसेमंद काम में लगवा दिया। अब पुलिस अविनाश शुक्ला को रिमांड पर लेकर इस पूरी साजिश के अन्य पहलुओं और कड़ियों के बारे में सघन पूछताछ करने की तैयारी कर रही है।
इस महालूट कांड में अब तक कानून की गिरफ्त में आए कुल आठ लोगों में से सबसे संपन्न और अमीर आरोपी टिन्नू यादव है, जिसकी अय्याशी और अकूत संपत्ति का ब्यौरा देखकर हर कोई दंग है। अयोध्या नगरी में टिन्नू यादव के पास तीन आलीशान मकान हैं, छात्रों और किराएदारों के लिए एक बहुत बड़ा हॉस्टल है, और इसके साथ ही शहर के कुल छह होटलों और रेस्टोरेंट में उसकी व्यावसायिक हिस्सेदारी यानी पार्टनरशिप भी है। लेकिन सबसे रहस्यमयी बात यह है कि पुलिस की छापेमारी के दौरान इतने अमीर आरोपी टिन्नू यादव के पास से केवल 1 लाख रुपये की ही नकद राशि बरामद हो सकी है। इस परिस्थिति को देखकर यह साफ तौर पर प्रतीत होता है कि टिन्नू यादव को पुलिस की इस संभावित छापेमारी और कार्रवाई की भनक पहले ही मिल गई थी, जिसके कारण उसे अपनी अवैध और काली कमाई के बड़े हिस्से को कहीं सुरक्षित स्थान पर छुपाने का पूरा मौका मिल गया। हालांकि, पुलिस और जांच एजेंसियों का मानना है कि आगे की सघन तफ्तीश के दौरान टिन्नू यादव की काली कमाई के सारे गुप्त ठिकानों, उसकी बेनामी संपत्तियों और वास्तविक आय के स्रोतों का पूरा सच देश के सामने आ जाएगा। इन अपराधियों ने राम मंदिर में दान करने वाले करोड़ों रामभक्तों की अगाध आस्था और निष्ठा पर बहुत गहरा आघात किया है। इन पापियों के हाथ में मंदिर का जो भी चढ़ावा लगा, उन्होंने पूरी निर्लज्जता से उसे चुरा लिया। उन्होंने दान पात्रों में पड़े रहने वाले दस-दस रुपये के नोट और पांच-पांच रुपये के छोटे सिक्कों तक को भी नहीं छोड़ा और सब अपनी जेबों में भर लिया।
इस मामले का सबसे विडंबनापूर्ण पहलू यह है कि जो लोग कुछ समय पहले तक मामूली ठेला लगाते थे, साधारण डिलीवरी बॉय का काम करते थे या फिर ऑटो चलाकर अपना गुजारा करते थे, वे इस राम मंदिर की दान राशि को लूटकर रातों-रात करोड़पति बन बैठे। लेकिन अब कानून का शिकंजा कस चुका है और पुलिस इन अपराधियों से लूटी गई पाई-पाई का हिसाब चुकता करवाएगी। असल में, जनता के सामने आज जिस लगभग 80 लाख रुपये की बड़ी बरामदगी के ब्यौरे उजागर हुए हैं, वह राशि मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय द्वारा गत 6 जून को ही अपने स्तर पर बरामद यानी रिकवर कर ली गई थी। इसके काफी समय बाद पुलिस ने इस रिकवर की गई धनराशि को अपने आधिकारिक रिकॉर्ड पर लिया। इससे पहले तक यह बड़ी रकम चंपत राय के पास ही एक लॉकर में ताले के भीतर बंद पड़ी रही थी। इसके अलावा, मामले की जांच कर रही SIT ने भी अपनी सघन कार्रवाई के दौरान लगभग 20 लाख रुपये की अतिरिक्त राशि जब्त की है। जांच में यह सनसनीखेज सच भी सामने आया है कि कुछ आरोपियों ने इस चोरी और लूट के पैसे को अपने सगे-संबंधियों या अन्य लोगों के नाम पर बैंकों में जमा करवा दिया था, जबकि कुछ ने इस लूट के माल से रियल एस्टेट में संपत्तियां और जमीनें तक खरीद ली थीं। यह सारा सच अब पुलिस की जांच में एक-एक करके पूरी तरह उजागर होने जा रहा है।
जब से राम मंदिर के भीतर इतनी बड़ी चोरी और हेराफेरी का यह पूरा शर्मनाक मामला सार्वजनिक रूप से उजागर हुआ है, तब से मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने जनता के सामने आकर इस विषय पर कोई भी स्पष्टीकरण या सफाई नहीं दी है। हालांकि, पर्दे के पीछे उन्होंने SIT और जांच कर रही पुलिस के अधिकारियों से खुलकर बातचीत की है और अपना पक्ष रखा है। चंपत राय ने जांच अधिकारियों के सामने स्वीकार किया कि उन्होंने टिन्नू यादव पर आंख मूंदकर भरोसा किया था, लेकिन टिन्नू यादव ने उनके इस गहरे विश्वास का नाजायज फायदा उठाया और उन्हें बहुत बड़ा धोखा दिया। बातचीत के दौरान चंपत राय मानसिक रूप से बेहद दुखी, व्यथित और आहत दिखाई दे रहे थे। वे जांचकर्ताओं के हर सवाल का जवाब देने के लिए पूरी तरह तत्पर थे, परंतु टिन्नू यादव के मुंह से सच उगलवाना पुलिस के लिए बहुत टेढ़ी खीर साबित हो रहा था। जब पुलिस ने टिन्नू यादव से कड़ाई और सख्ती से पूछताछ शुरू की, तो वह अपनी चमड़ी बचाने के लिए चंपत राय के पास जाकर फूट-फूट कर रोने लगा और मदद की गुहार लगाने लगा, लेकिन इस बार चंपत राय ने उसकी किसी भी प्रकार की सहायता करने से साफ इनकार कर दिया।
इस पूरे घटनाक्रम में चंपत राय को इस बात का भी गहरा संदेह है कि टिन्नू यादव ने ही मंदिर के दान पात्र से बड़े पैमाने पर हो रही इस चोरी की संवेदनशील खबर को समाजवादी पार्टी के स्थानीय MLA पवन पांडे तक लीक किया था। चंपत राय का मानना है कि टिन्नू यादव ने ही पवन पांडे के माध्यम से मीडिया और जनता में यह बात फैलवाई कि मंदिर में करीब सात-आठ करोड़ रुपये की बहुत बड़ी चोरी हुई है। चंपत राय ने बेहद अफसोस जताते हुए कहा कि उन्होंने जीवन में गलत और बेईमान लोगों पर अत्यधिक विश्वास कर लिया। लेकिन यहां यह यक्ष प्रश्न खड़ा होता है कि यदि चंपत राय समय रहते उचित कदम उठाते, तो इस बड़ी चोरी को इसी साल जनवरी के महीने में ही रोका जा सकता था। राम मंदिर के पवित्र दानपात्र में हुई यह चोरी महज एक वित्तीय अपराध नहीं है, बल्कि यह चरम विश्वासघात, फरेब और गहरे धोखे का मामला है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS ने चंपत राय की प्रशासनिक क्षमता और ईमानदारी पर भरोसा करके उन्हें इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी थी, परंतु चंपत राय ने अपने स्तर पर गंभीर लापरवाही और ढिलाई बरती। चंपत राय ने टिन्नू यादव और अनिल मिश्रा जैसे लोगों पर अंधविश्वास किया, और बदले में उन लोगों ने चंपत राय की पीठ में छुरा घोंपकर उन्हें धोखा दे दिया।
चंपत राय सार्वजनिक या निजी तौर पर यह बात तो सहर्ष स्वीकार करते हैं कि उन्होंने गलत और अनैतिक चरित्र वाले लोगों पर भरोसा करने की भारी भूल की, लेकिन वे इस कड़वे सच को मानने के लिए कतई तैयार नहीं हैं कि उन्हें इस चोरी के संदर्भ में बार-बार चेतावनियां मिलने और विभिन्न विश्वसनीय स्रोतों द्वारा आगाह किए जाने के बावजूद उन्होंने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया। यहाँ तक कि जब मंदिर के काउंटिंग रूम में सुरक्षा के मद्देनजर गोपनीय ढंग से Spycam लगाया गया और उसकी फुटेज में साफ तौर पर लोग अपनी जेबों और कपड़ों में नोटों की गड्डियां ठूसते हुए दिखाई दिए, तब भी चंपत राय उन रंगे हाथों पकड़े गए पापियों को तुरंत पुलिस के हवाले करने के लिए तैयार नहीं थे। किसी भी जिम्मेदार और गरिमामय पद पर बैठे व्यक्ति को यदि यह भली-भांति पता चल जाए कि किसी पापी ने भगवान के पावन घर में इतनी बड़ी चोरी की है, और वह सब कुछ जानते हुए भी उस अपराधी को उचित कानूनी सजा दिलाने के बजाय उसे बचाने या मामले को दबाने का प्रयास करे, तो उसे भी वैचारिक और नैतिक रूप से इस महापाप में बराबर का भागीदार और दोषी माना जाएगा। ऐसी विषम परिस्थिति में न केवल धोखा देना, बल्कि आंखें मूंदकर धोखा खाना भी एक अक्षम्य अपराध बन जाता है। सिर्फ खुद गुनाह करना ही कानून की नजर में अपराध नहीं होता, बल्कि किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किए गए महापाप को जानबूझकर छिपाना भी उतना ही बड़ा और संगीन अपराध है।
उत्तराखंड में लागू हुआ ऐतिहासिक अल्पसंख्यक शिक्षा कानून: मदरसों के आधुनिकीकरण की ओर बढ़ते कदम
उत्तराखंड राज्य में अब एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक अल्पसंख्यक शिक्षा कानून पूरी तरह लागू हो गया है। इस नए कानून के प्रावधानों के अंतर्गत अब राज्य के भीतर संचालित होने वाले जितने भी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान हैं, उन सभी के लिए अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण में अपना अनिवार्य पंजीकरण कराना बेहद आवश्यक कर दिया गया है। इस कड़े नियम के लागू होने के बाद अब उत्तराखंड की सीमा में बिना वैध रजिस्ट्रेशन के न तो कोई मदरसा चलाया जा सकेगा, न कोई पारंपरिक गुरुकुल संचालित हो सकेगा और न ही कोई दूसरा धार्मिक शिक्षण संस्थान अपनी गतिविधियां चला पाएगा। इस ऐतिहासिक कानून का सबसे व्यापक और सीधा प्रभाव राज्य के मदरसों की कार्यप्रणाली पर पड़ने जा रहा है। विगत 1 जुलाई से उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है। अब राज्य के प्रत्येक मदरसे को विधिवत मान्यता प्राप्त करनी होगी और उन सभी में अनिवार्य रूप से सरकार द्वारा निर्धारित आधुनिक सिलेबस को लागू करना होगा। इस नए शैक्षणिक ढांचे के अंतर्गत अब मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों को पारंपरिक विषयों के साथ-साथ अंग्रेजी, हिंदी, गणित, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान जैसे बेहद महत्वपूर्ण विषय अनिवार्य रूप से पढ़ाए जाएंगे। हालांकि, सरकार ने मदरसों में दी जाने वाली पारंपरिक मजहबी तालीम पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध नहीं लगाया है, लेकिन जो बच्चे मजहबी तालीम हासिल करना चाहते हैं, उनके लिए मदरसों को नियमित स्कूल समय के बाद अलग से अतिरिक्त कक्षाओं का विशेष प्रबंध करना होगा। नए नियमों के अनुसार, सुबह के समय केवल सरकारी बोर्ड के आधुनिक पाठ्यक्रम की पढ़ाई कराई जाएगी, जबकि मजहबी तालीम से जुड़ी कक्षाएं शाम के वक्त पूरी तरह से अलग आयोजित की जाएंगी।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस दूरगामी कानून के संदर्भ में अपनी सरकार का दृष्टिकोण अत्यंत स्पष्ट करते हुए कहा है कि उनकी सरकार का मूल उद्देश्य किसी भी धर्म, संप्रदाय या मजहब की भावनाओं को ठेस पहुंचाना अथवा नुकसान पहुंचाना कतई नहीं है। वह पूरी ईमानदारी से यह चाहते हैं कि समाज के सभी धर्मों और वर्गों के बच्चों को समान रूप से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले और उन्हें जीवन में आगे बढ़ने का पूरा अवसर प्राप्त हो। लेकिन इसके बावजूद कुछ संकीर्ण सोच वाले तत्व इस सुधारवादी कदम को सीधे तौर पर केवल मदरसों से जोड़कर देख रहे हैं और अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय को भड़काने तथा गुमराह करने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं। अगर हम आंकड़ों की बात करें तो उत्तराखंड राज्य में कुल 952 मदरसे संचालित थे। इनमें से नियमों का उल्लंघन करने वाले लगभग 250 मदरसे पिछले वर्ष दिसंबर के महीने तक प्रशासन द्वारा सील किए जा चुके थे। वर्तमान में राज्य के कुल 452 मदरसों का इस नए कानून के तहत सफलतापूर्वक रजिस्ट्रेशन संपन्न हो चुका है, जिनमें वर्तमान में 40 हजार से ज्यादा बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। पूरे राज्य में केवल 52 मदरसे ही ऐसे बचे हैं जहां 12वीं कक्षा तक की पढ़ाई कराई जाती है। अब तक इन मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों को केवल और केवल पारंपरिक इस्लामिक शिक्षा ही प्राप्त हो पाती थी, जिसके कारण अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके पास मस्जिदों में मौलवी बनने या फिर इन्हीं मदरसों में शिक्षक के रूप में काम करने के अलावा आजीविका का कोई अन्य विकल्प शेष नहीं बचता था। उनके लिए समाज की मुख्यधारा में दूसरी अच्छी नौकरियां पाने की संभावनाएं लगभग शून्य थीं। लेकिन अब इस क्रांतिकारी सुधार के बाद जब ये बच्चे भी मुख्यधारा के विषयों जैसे गणित, विज्ञान, अंग्रेजी और कंप्यूटर आदि की पढ़ाई करेंगे, तो अन्य सामान्य बच्चों की तरह उनके लिए भी उच्च शिक्षा के तमाम बंद दरवाजे खुल जाएंगे और वे भी भविष्य में प्रतिष्ठित इंजीनियर, डॉक्टर, प्रशासनिक अधिकारी और वैज्ञानिक बनकर देश के विकास में अपना अमूल्य योगदान दे सकेंगे। इसलिए, इस समग्र परिप्रेक्ष्य को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का यह साहसिक निर्णय अत्यंत सराहनीय और स्वागत योग्य कदम प्रतीत होता है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में मर्यादाओं का पतन: नेताओं पर अंडा फेंकने की घटनाओं पर कलकत्ता हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी
पश्चिम बंगाल की राजनीतिक सरजमीं पर विपक्षी और सत्तारूढ़ दलों के नेताओं के प्रति बढ़ते हिंसक और अमर्यादित व्यवहार पर देश की न्यायपालिका ने अत्यंत गंभीर रुख अख्तियार किया है। कलकत्ता हाईकोर्ट ने हाल ही में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के ऊपर भीड़ द्वारा अंडे और सड़े हुए टमाटर फेंके जाने की अप्रिय घटनाओं पर अपनी बेहद सख्त नाराजगी व्यक्त की है। माननीय उच्च न्यायालय ने इस तरह की अमर्यादित और कानून को हाथ में लेने वाली हरकतों को पूरी तरह से अस्वीकार्य बताते हुए पुलिस प्रशासन को ऐसी गतिविधियों में संलिप्त हुड़दंगियों के खिलाफ तत्काल प्रभाव से कड़ी धाराओं में FIR दर्ज करने के कड़े आदेश दिए हैं। पश्चिम बंगाल में बीते समय में हुए राजनीतिक शक्ति संतुलन और सत्ता संघर्ष के बाद तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के प्रति आम जनता के एक वर्ग का हिंसक आक्रोश सड़कों पर साफ तौर पर दिखाई दे रहा है। वर्तमान में जिन नेताओं को विभिन्न मामलों में कानूनन गिरफ्तार किया जा रहा है, उन पर पुलिस कस्टडी के दौरान हिंसक भीड़ द्वारा अंडे और अन्य चीजें फेंकी जा रही हैं। सार्वजनिक जीवन में मर्यादाओं के इस तरह तार-तार होने और ऐसी हिंसक घटनाओं के विरुद्ध कलकत्ता हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका यानी PIL दाखिल की गई थी। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि भले ही कोई व्यक्ति कितना भी बड़ा आरोपी क्यों न हो, उसके व्यक्तिगत सम्मान और उसकी अनमोल जान की रक्षा करना पूरी तरह से राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। किसी भी सभ्य समाज में कानून को अपने हाथ में लेकर इस तरह के हमले करने की छूट किसी भी परिस्थिति में किसी को नहीं दी जा सकती।
पत्रकारिता और सार्वजनिक जीवन की स्थापित मर्यादाओं के आलोक में यह बात पूरी तरह सच है कि किसी भी आरोपी या नेता पर अंडे फेंकना, सड़े हुए टमाटर बरसाना, अथवा पुलिस की प्रत्यक्ष मौजूदगी में किसी भी बंदी के साथ मारपीट करना पूरी तरह से गैर-कानूनी और अमानवीय कृत्य है। इस तरह के उग्र व्यवहार को किसी भी सभ्य लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। ऐसी हिंसक हरकतें पूरी तरह से गलत हैं और समाज को अराजकता की ओर धकेलती हैं। कानून का उल्लंघन करने वाले ऐसे तत्वों के खिलाफ बिना किसी राजनीतिक पक्षपात के बेहद सख्त और त्वरित कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। इस संदर्भ में भारतीय जनता पार्टी के नेता शमिक भट्टाचार्य का यह तर्क भी पूरी तरह से तर्कहीन और गलत प्रतीत होता है कि पुलिस बल हर एक नागरिक की जेब की तलाशी नहीं ले सकता कि वह जेब में अंडा लेकर घूम रहा है या नहीं। पुलिस को ऐसा करने की आवश्यकता ही नहीं है, क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारें और कानून का शासन केवल लाठी के दम पर नहीं, बल्कि कानून के इकबाल और उसके डर से संचालित होते हैं। यदि समाज में लोगों को इस बात का स्पष्ट भय होगा कि कानून का उल्लंघन करने पर पुलिस तत्काल और निष्पक्ष एक्शन लेगी और उन्हें जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ेगा, तो किसी भी असामाजिक तत्व में इस तरह की अराजक हरकत करने का दुस्साहस पैदा ही नहीं होगा। इसलिए, राजनीतिक दलों को इस प्रकार की घटनाओं पर इधर-उधर के बेतुके बहाने बनाने और अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने के बजाय ऐसी अमर्यादित हरकतों को पूर्ण रूप से बंद कराने की दिशा में गंभीर प्रयास करने चाहिए।
इस प्रकार, चाहे वह अयोध्या के राम मंदिर में हुआ आस्था से खिलवाड़ का महापाप हो, या फिर उत्तराखंड में अल्पसंख्यक बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए लिया गया क्रांतिकारी शैक्षणिक फैसला हो, अथवा पश्चिम बंगाल में राजनीतिक मर्यादाओं को तार-तार करती हिंसक घटनाएं हों; इन सभी पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है। इन महत्वपूर्ण समसामयिक मुद्दों के विस्तृत विश्लेषण को समझने और इस पर विस्तृत चर्चा देखने के लिए आप 'आज की बात, रजत शर्मा के साथ' के 1 जुलाई, 2026 को प्रसारित हुए पूरे एपिसोड को अवश्य देख सकते हैं, जिसमें इन सभी ज्वलंत राष्ट्रीय मुद्दों की बारीक परतों को बेबाकी से उजागर किया गया है।
https://www.indiatv.in/india/national/rajat-sharma-blog-ram-mandir-donation-theft-concealing-a-sin-is-also-a-crime-2026-07-02-1228735