Farming Tips: सिर्फ 75 हजार रुपये लगाकर कमाएं 2 लाख, बहराइच के किसान सियाराम ने देसी केले की खेती से बदली अपनी किस्मत

उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के किसान सियाराम ने पारंपरिक फसलों से हटकर देसी केले की जैविक खेती अपनाई और बेहद कम लागत में बंपर मुनाफा कमाकर दूसरों के लिए एक मिसाल पेश की है।

आज के समय में जब पारंपरिक खेती में लागत लगातार बढ़ रही है और मुनाफा कम होता जा रहा है, तब उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले से एक बेहद प्रेरणादायक कहानी सामने आई है। यहां के एक छोटे से गांव में रहने वाले किसान सियाराम ने अपनी सूझबूझ और कड़ी मेहनत से खेती को भारी मुनाफे का जरिया बना दिया है। सियाराम वर्ष 2018 से लगभग एक एकड़ कृषि भूमि पर केले की खेती कर रहे हैं। वे किसी आम केले की नहीं, बल्कि एक खास देसी किस्म के केले की जैविक खेती करते हैं। इस खेती की बदौलत वे हर साल बहुत ही आसानी से लाखों रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं। मात्र 75 हजार रुपये की शुरुआती लागत लगाकर वे लगभग 2 लाख रुपये तक की शानदार कमाई कर रहे हैं। आइए जानते हैं उनकी सफलता की कहानी और इस मुनाफेदार खेती का पूरा गणित।

बाजार में क्यों बनी रहती है देसी केले की सदाबहार मांग?

पिछले साल जब बाजार में केले के सही दाम न मिल पाने के कारण उत्तर प्रदेश के अधिकांश केला उत्पादक किसानों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा था, तब भी बहराइच के सियाराम मुनाफे में रहे। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि उन्होंने हाइब्रिड या विदेशी किस्मों के बजाय देसी केले की खेती को प्राथमिकता दी थी। देसी केले की मांग बाजार में साल के बारहों महीने एक समान बनी रहती है।

आमतौर पर जो अन्य उन्नत या हाइब्रिड किस्में बाजार में आती हैं, उनका उपयोग लोग मुख्य रूप से केवल पके हुए फल के रूप में खाने के लिए करते हैं। ऐसे में जब बाजार में इन केलों की आवक अचानक बढ़ जाती है, तो इनके दाम तेजी से नीचे गिर जाते हैं। इसके ठीक विपरीत, देसी केले की बहुमुखी उपयोगिता है। इस किस्म के केले का इस्तेमाल सब्जी बनाने, स्वादिष्ट चिप्स तैयार करने और कई अन्य तरह के खाद्य उत्पाद बनाने में बड़े पैमाने पर किया जाता है। यही कारण है कि बाजार में देसी केले के भाव में ज्यादा उतार-चढ़ाव देखने को नहीं मिलता और किसानों को हर सीजन में अपनी फसल का बेहतर और स्थिर दाम मिल जाता है।

देसी केले की जैविक खेती करने का सही और वैज्ञानिक तरीका

किसान सियाराम के अनुभव के अनुसार, देसी केले की फसल से बंपर पैदावार लेने के लिए वैज्ञानिक और जैविक तरीकों का तालमेल बेहद जरूरी है। उनके मुताबिक, इस फसल की रोपाई के लिए 15 जून से 15 जुलाई के बीच का समय सबसे ज्यादा उपयुक्त और उत्तम माना जाता है। इस अवधि में मौसम की परिस्थितियां पौधों के विकास के लिए बेहद अनुकूल होती हैं। केले की सफल खेती के लिए निम्नलिखित चरणों का पालन करना चाहिए:

  • खेत की गहरी जुताई: केले के पौधों की रोपाई करने से पहले खेत को अच्छी तरह से तैयार करना आवश्यक है। इसके लिए खेत की दो से तीन बार गहरी जुताई करनी चाहिए। गहरी जुताई करने से मिट्टी में मौजूद खरपतवार पूरी तरह से नियंत्रित हो जाते हैं और मिट्टी भुरभुरी हो जाती है, जिससे पौधों की जड़ों का फैलाव और विकास बहुत अच्छे से होता है।
  • जैविक खाद का सही उपयोग: जुताई का काम पूरा होने के बाद खेत में पर्याप्त मात्रा में अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद डालनी चाहिए। इसके साथ ही मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए लगभग 40 किलो देसी खाद में ट्राइकोडरमा नामक मित्र फंगस को अच्छी तरह मिलाकर आखिरी जुताई के समय पूरे खेत की मिट्टी में मिला देना चाहिए। यह मिट्टी जनित बीमारियों से पौधों की रक्षा करता है।
  • सिंचाई और कीट प्रबंधन: पौधों की रोपाई का काम पूरा होने के ठीक दूसरे या तीसरे दिन खेत की पहली सिंचाई अवश्य कर देनी चाहिए ताकि पौधों की जड़ें मिट्टी को पकड़ सकें। इसके बाद, रोपाई के लगभग एक सप्ताह बीत जाने पर कृषि वैज्ञानिकों के परामर्श के अनुसार उचित जैविक कीटनाशकों या प्राकृतिक अर्क का छिड़काव करना चाहिए ताकि शुरुआत में ही कीटों और बीमारियों के प्रकोप को रोका जा सके।

12 महीने की मेहनत और बंपर मुनाफा

अगर किसान भाई वैज्ञानिक सलाह और जैविक पद्धति को अपनाकर केले की इस देसी किस्म की खेती करते हैं, तो यह फसल मात्र 12 महीने के भीतर पूरी तरह से पककर तैयार हो जाती है। इस खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें जोखिम बेहद कम होता है और मुनाफे की गारंटी ज्यादा होती है। बहराइच के सियाराम ने यह साबित कर दिया है कि अगर सही रणनीति, सही समय और सही किस्म का चुनाव किया जाए, तो खेती से भी बेहद कम समय में सुरक्षित और बड़ा आर्थिक लाभ कमाया जा सकता है। आज वे अपने क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए भी एक बड़े प्रेरणास्रोत बन चुके हैं।

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