पनामा नहर पर मंडराया नए महायुद्ध का खतरा: डोनाल्ड ट्रंप ने चीन को दी खुली चेतावनी, बोले- कब्जा करने की सोचना भी मत

पनामा नहर को लेकर अमेरिका और चीन के बीच कूटनीतिक और रणनीतिक खींचतान तेज हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस महत्वपूर्ण वैश्विक जलमार्ग पर चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए सीधे सैन्य हस्तक्षेप तक की चेतावनी दे डाली है।

अमेरिका और चीन के बीच वैश्विक वर्चस्व की जंग अब एक नए मुकाम पर पहुंचती दिख रही है। हाल के दिनों में अमेरिका ने वेनेजुएला और ईरान के खिलाफ कड़े कदम उठाए हैं। हालांकि इन कार्रवाइयों के पीछे आधिकारिक तौर पर नशीली दवाओं की तस्करी और परमाणु हथियारों के प्रसार को वजह बताया गया, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार मानते हैं कि इस पूरे विवाद की असली जड़ तेल और वैश्विक व्यापार पर नियंत्रण स्थापित करना ही है। अब इस भू-राजनीतिक बिसात पर अमेरिका की नजरें दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक जलमार्गों में से एक, पनामा नहर पर टिक गई हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस संबंध में चीन को बेहद सख्त लहजे में चेतावनी दी है और साफ कर दिया है कि वह पनामा नहर पर चीन के बढ़ते प्रभाव को मूकदर्शक बनकर नहीं देखेंगे।

डोनाल्ड ट्रंप का कड़ा रुख और चीन को खुली चेतावनी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही यह स्पष्ट कर दिया है कि उनकी प्राथमिकता हमेशा अमेरिका को पहले स्थान पर रखने की होगी। इसी कड़ी में उन्होंने वैश्विक व्यापार के सबसे व्यस्त रास्तों में से एक पनामा नहर को लेकर चीन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। ट्रंप ने चीन को चेतावनी देते हुए कहा है कि वह इस महत्वपूर्ण नहर पर अपना नियंत्रण स्थापित करने की कोशिशें तुरंत बंद कर दे।

हाल ही में नॉर्थ डकोटा में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने सीधे तौर पर चीन को आड़े हाथों लिया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा, "चीन किसी भी तरह पनामा नहर पर अपना दबदबा बनाने की फिराक में है। लेकिन हम ऐसा कभी नहीं होने देंगे। यह नहर हमारी मेहनत का परिणाम है, इसे हमने बनाया है और अगर जरूरत पड़ी तो हम इसे वापस अपने नियंत्रण में लेने से भी पीछे नहीं हटेंगे।"

राष्ट्रपति ट्रंप ने पनामा नहर को दुनिया की सबसे मूल्यवान और अत्यधिक मुनाफा कमाने वाली संपत्तियों में से एक करार दिया। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस रणनीतिक जलमार्ग की सुरक्षा और इस पर अमेरिकी हितों का संरक्षण उनकी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है।

आखिर क्यों इतनी महत्वपूर्ण है पनामा नहर?

भौगोलिक और व्यापारिक दृष्टिकोण से पनामा नहर की अहमियत को कम करके नहीं आंका जा सकता। यह नहर प्रशांत महासागर और अटलांटिक महासागर को जोड़ने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण 82 किलोमीटर लंबा कृत्रिम जलमार्ग है। हर साल दुनिया भर के हजारों विशालकाय व्यापारिक जहाज इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरते हैं। यह मार्ग न केवल जहाजों के सफर को आसान बनाता है, बल्कि उन्हें हजारों मील की अतिरिक्त दूरी तय करने से भी बचाता है, जिससे ईंधन और समय दोनों की भारी बचत होती है।

वैश्विक व्यापार की रीढ़ मानी जाने वाली इस नहर का सबसे अधिक उपयोग अमेरिका करता है, जबकि इस सूची में चीन दूसरे स्थान पर आता है। यदि चीन इस नहर पर किसी भी तरह का रणनीतिक या प्रशासनिक नियंत्रण हासिल करने में सफल हो जाता है, तो पूरी दुनिया की आपूर्ति श्रृंखला पर उसका सीधा प्रभाव स्थापित हो जाएगा। वर्तमान में स्थिति यह है कि कई चीनी कंपनियां पनामा नहर के दोनों छोरों पर स्थित महत्वपूर्ण बंदरगाहों के संचालन में शामिल हैं। अमेरिका इस चीनी पैठ को अपने प्रभाव क्षेत्र में एक गंभीर रणनीतिक चुनौती के रूप में देख रहा है।

क्या पनामा नहर बन सकती है दूसरा होर्मुज?

दुनिया भर के अर्थशास्त्री और भू-राजनीतिक विश्लेषक इस बात को लेकर चिंतित हैं कि यदि अमेरिका और चीन के बीच यह तनातनी और अधिक बढ़ती है, तो पनामा नहर भी होर्मुज की खाड़ी की तरह एक बड़े सैन्य और कूटनीतिक संघर्ष का केंद्र बन सकती है। ज्ञात हो कि होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल का परिवहन होता है, और वहां ईरान, अमेरिका तथा इजराइल के बीच हमेशा तनाव की स्थिति बनी रहती है।

यदि पनामा नहर के आसपास भी इसी तरह की सैन्य तैनाती या गतिरोध की स्थिति उत्पन्न होती है, तो इसका सीधा असर वैश्विक व्यापार पर पड़ेगा। मालवाहक जहाजों की आवाजाही बाधित होने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवश्यक वस्तुओं और कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका साबित होगा। ट्रंप का यह आक्रामक बयान साफ तौर पर यह दर्शाता है कि अमेरिका अपने पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र में किसी भी अन्य महाशक्ति की उपस्थिति को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।

वेनेजुएला और ईरान पर अमेरिकी रणनीति

डोनाल्ड ट्रंप अपनी आक्रामक विदेश नीति के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने वेनेजुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप को पूरी तरह से सफल बताया है, जहां उन्होंने निकोलस मादुरो की सरकार पर कड़ा दबाव बनाया था। अब यही रणनीति वे ईरान पर भी लागू कर रहे हैं। नॉर्थ डकोटा के कार्यक्रम में ट्रंप ने ईरान का जिक्र करते हुए कहा, "ईरान की स्थिति भी अब काफी हद तक वेनेजुएला जैसी ही हो रही है, जो पहले बेहद समृद्ध देश हुआ करता था। हमने वेनेजुएला पर शिकंजा कसा और अब ईरान के साथ भी हम वैसा ही रुख अपना रहे हैं।" चीन को दी गई यह चेतावनी भी इसी व्यापक अमेरिकी रणनीति का एक हिस्सा मानी जा रही है।

इंजीनियरिंग का एक अद्भुत और बेजोड़ नमूना

पनामा नहर को आधुनिक दुनिया के सबसे महान इंजीनियरिंग चमत्कारों में गिना जाता है। इस नहर का समुद्र के जलस्तर से सीधा जुड़ाव नहीं है। इसके बजाय, इसमें एक बेहद जटिल लॉक सिस्टम का उपयोग किया जाता है। मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:

  • इस नहर के जरिए जहाजों को पार कराने के लिए मुख्य रूप से गाटुन लॉक का उपयोग किया जाता है, जहां पानी भरकर जहाजों को लगभग 26 मीटर ऊपर उठाया जाता है।
  • ऊपर उठाने के बाद जहाजों को नहर के दूसरे छोर तक ले जाया जाता है और फिर सावधानीपूर्वक वापस समुद्र के स्तर पर उतारा जाता है।
  • इस पूरी प्रक्रिया को तीन अलग-अलग चरणों में पूरा किया जाता है।
  • नहर के भीतर बनाए गए ये तीन विशालकाय लॉक ही जहाजों को प्रशांत महासागर से अटलांटिक महासागर की ओर सुरक्षित रूप से भेजने का काम करते हैं।

इतिहास के पन्नों में दर्ज अमेरिकी आधिपत्य की कहानी

पनामा नहर के निर्माण और इस पर अमेरिकी नियंत्रण का इतिहास बीसवीं सदी की शुरुआत से जुड़ा हुआ है। वर्ष 1901 से 1909 के दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति रहे थियोडोर रूजवेल्ट ने इस नहर के निर्माण को अमेरिका के राष्ट्रीय गौरव और वैश्विक आधिपत्य का मुख्य जरिया बनाया था। इससे पहले फ्रांस ने इस नहर को बनाने का प्रयास किया था, लेकिन वे इसमें बुरी तरह विफल रहे थे।

वर्ष 1903 में राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने कोलंबिया सरकार के साथ एक समझौता करने का प्रयास किया, क्योंकि उस समय पनामा कोलंबिया का ही एक हिस्सा हुआ करता था। लेकिन जब कोलंबिया ने इस समझौते को खारिज कर दिया, तो रूजवेल्ट ने कूटनीतिक चाल चलते हुए पनामा के स्वतंत्रता आंदोलन को अपना खुला समर्थन दे दिया। अमेरिकी नौसेना के युद्धपोतों की उपस्थिति के बीच पनामा आखिरकार कोलंबिया से अलग होकर एक स्वतंत्र राष्ट्र बन गया।

इसके तुरंत बाद, पनामा की नई सरकार और अमेरिका के बीच ऐतिहासिक 'हाय बुनाउ वरीला संधि' पर हस्ताक्षर किए गए। इस संधि के तहत अमेरिका को नहर के दोनों ओर 10 मील चौड़ी भूमि की पट्टी पर पूर्ण प्रशासनिक और सैन्य अधिकार मिल गए। इसके बदले में अमेरिका ने पनामा को 10 मिलियन डॉलर की एकमुश्त राशि और एक निश्चित वार्षिक किराया देने का भुगतान किया।

वर्ष 1904 से 1914 के बीच इस नहर का निर्माण कार्य युद्ध स्तर पर चलाया गया। इस दौरान, वर्ष 1906 में स्वयं राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट ने निर्माण स्थल का दौरा किया था और एक विशाल खुदाई मशीन पर खड़े होकर अपनी ऐतिहासिक तस्वीर खिंचवाई थी। जब वर्ष 1914 में अंततः पनामा नहर को यातायात के लिए खोला गया, तब रूजवेल्ट ने बड़े गर्व से घोषणा की थी कि उन्होंने ही इस नहर का निर्माण कराया है।

नियंत्रण का हस्तांतरण और पानी की नई जंग

अमेरिका ने वर्ष 1999 के अंत तक पनामा नहर पर अपना पूर्ण और एकतरफा नियंत्रण बनाए रखा। इसके बाद, जिम्मी कार्टर के राष्ट्रपति काल के दौरान हुई ऐतिहासिक 'टॉरिजोस कार्टर ट्रीटी' के तहत इस नहर का नियंत्रण आधिकारिक रूप से पनामा को सौंप दिया गया। हालांकि, इस समझौते में यह शर्त स्पष्ट रूप से जोड़ी गई थी कि यह नहर हमेशा पूरी दुनिया के जहाजों के लिए निष्पक्ष और तटस्थ रहेगी।

वर्तमान समय में, पर्यावरण परिवर्तन और पानी की कमी के कारण इस नहर का रणनीतिक महत्व और अधिक बढ़ गया है। अब यह लड़ाई केवल भौगोलिक नियंत्रण तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह पानी के संकट से भी जुड़ गई है। पानी का स्तर कम होने की वजह से नहर से गुजरने वाले जहाजों की संख्या सीमित हो रही है, जिससे इस पर नियंत्रण रखने की वैश्विक होड़ और तेज हो गई है। पनामा नहर आज भी वैश्विक अर्थव्यवस्था की धड़कन बनी हुई है, और इसकी सुरक्षा सीधे तौर पर पूरी दुनिया की आर्थिक स्थिरता से जुड़ी हुई है। डोनाल्ड ट्रंप का यह आक्रामक बयान लैटिन अमेरिका में अमेरिकी प्रभाव को दोबारा स्थापित करने की उनकी बड़ी कूटनीतिक योजना का एक स्पष्ट संकेत है।

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