जम्मू-कश्मीर में इन दिनों शादियों का सीजन अपने पूरे शबाब पर है, लेकिन कश्मीर घाटी के घरों में इस समय खुशी के माहौल के बीच एक अजीब सी चिंता पसरी हुई है। इस चिंता की वजह कोई घरेलू समस्या नहीं, बल्कि पंजाब सरकार का एक फैसला है जिसने कश्मीरियों की नींद उड़ा दी है। पंजाब में पशु मंडी शुल्क में की गई बढ़ोतरी के कारण कश्मीर में मटन यानी भेड़ के मांस की भारी किल्लत हो गई है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि कई परिवारों ने अपनी शादियों को आगे बढ़ा दिया है, तो कुछ लोगों ने शादी के कार्ड बांटने का काम भी बीच में ही रोक दिया है। कश्मीर के लोगों को अब उम्मीद है कि आने वाले दिनों में यह संकट सुलझेगा और मटन की आपूर्ति फिर से सामान्य हो सकेगी।
शादी के कार्ड बांटने रुके, टलने लगीं शादियां
कश्मीर घाटी में अप्रैल से लेकर अक्टूबर तक का समय शादियों का मुख्य सीजन माना जाता है। इस दौरान यहां के पारंपरिक व्यंजनों और दावतों का एक अलग ही महत्व होता है। एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र की रिपोर्ट के अनुसार, श्रीनगर और कश्मीर के अन्य हिस्सों में ऐसे कई परिवार हैं, जिनके घरों में आने वाले हफ्तों में शादियां तय थीं। लेकिन मटन की भारी कमी और बढ़ती कीमतों के कारण उनके सामने एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है। मेहमानों को परोसे जाने वाले भोजन की चिंता में लोगों ने फिलहाल शादी के निमंत्रण पत्र बांटना बंद कर दिया है। कुछ परिवारों ने तो शादियों की तारीखों को ही आगे बढ़ाने का फैसला किया है ताकि जब बाजार में मटन की आपूर्ति सुधरे, तब वे बिना किसी परेशानी के दावत का आयोजन कर सकें।
वाजवान के स्वाद पर लगा ब्रेक, आसमान छू रहे दाम
कश्मीर की पारंपरिक दावत को वाजवान कहा जाता है, जिसके बिना कश्मीरी शादियां अधूरी मानी जाती हैं। वाजवान में मटन के एक या दो नहीं, बल्कि कई तरह के लजीज व्यंजन परोसे जाते हैं। लेकिन वर्तमान संकट के कारण अब इन व्यंजनों की संख्या में कटौती करनी पड़ रही है।
मटन डीलर्स का आरोप है कि पंजाब की सीमा पर भेड़ ले जाने वाले प्रत्येक ट्रक से 25,000 रुपये तक की वसूली की जा रही है। इस अतिरिक्त शुल्क का सीधा असर मटन की खुदरा कीमतों पर पड़ा है। कश्मीर में मटन की कीमत 700 रुपये प्रति किलो से बढ़कर अब 750 रुपये प्रति किलो तक पहुंच चुकी है। आम दिनों में एक या दो किलो मटन खरीदने वालों के लिए 50 रुपये का यह अंतर भले ही बड़ा न लगे, लेकिन शादियों के दौरान जहां एक साथ 200 से 400 किलो मटन की आवश्यकता होती है, वहां यह अंतर बजट को कई हजार रुपये बढ़ा रहा है। इसके साथ ही कई इलाकों में मटन की आपूर्ति पूरी तरह से ठप हो गई है।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने पंजाब के सीएम को लिखा पत्र
जम्मू-कश्मीर सरकार ने पंजाब सीमा पर वसूले जा रहे इस अतिरिक्त शुल्क को पूरी तरह से गैरकानूनी और मनमाना करार दिया है। इस समस्या के समाधान के लिए जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सीधे तौर पर हस्तक्षेप किया है। उन्होंने पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को एक आधिकारिक पत्र लिखकर इस मुद्दे को उठाया है और अपनी गहरी चिंता जताई है।
अपने पत्र में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने मांग की है कि पशुओं को ले जाने वाले वाहनों की आवाजाही को बिना किसी बाधा के जारी रहने दिया जाए। उन्होंने तर्क दिया कि ये मालवाहक वाहन केवल पंजाब के राष्ट्रीय राजमार्ग का उपयोग कश्मीर तक पहुंचने के लिए करते हैं, इसलिए उन पर इस तरह का टैक्स या शुल्क लगाने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता है।
मंडी बंदी से व्यापारी बेहाल
इस संकट के जमीनी असर के बारे में बात करते हुए कश्मीर मटन डीलर्स एसोसिएशन के महासचिव मेहराज-उद-दीन गनी ने गहरी चिंता व्यक्त की है। उनके अनुसार, पंजाब के इस फैसले के विरोध और असमर्थता के चलते भेड़ मंडियां लगातार नौ दिनों से बंद पड़ी हैं। उन्होंने बताया कि यह कश्मीरी व्यापारियों और परिवारों के लिए बेहद कठिन समय है। एक तरफ शादियों का सीजन चल रहा है जहां मटन की मांग चरम पर होती है, वहीं दूसरी तरफ व्यापारी बेबस हैं क्योंकि वे इतना भारी शुल्क चुकाकर व्यापार करने की स्थिति में नहीं हैं।
आंकड़ों की जुबानी: कश्मीर में मटन की भारी खपत
कश्मीर में मटन की कमी राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा मुद्दा इसलिए बन जाती है क्योंकि यहां की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा मांसाहारी है। कश्मीर की खाद्य संस्कृति और मटन की खपत से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण आंकड़े इस प्रकार हैं:
- कश्मीर की लगभग 90 फीसदी आबादी मांसाहारी है और यहां देश में सबसे ज्यादा मटन खाया जाता है।
- कश्मीर घाटी में हर साल 600 लाख किलो से भी अधिक मटन की खपत होती है।
- कश्मीर अपनी मटन की कुल जरूरत का आधे से अधिक हिस्सा बाहरी राज्यों जैसे हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान से आने वाली भेड़ों से पूरा करता है।
- सामान्य दिनों में हर रोज करीब 40 से 50 ट्रक यानी लगभग 8,000 भेड़ें कश्मीर की सीमा में प्रवेश करती हैं।
- शादियों के सीजन के दौरान मांग बढ़ने पर ट्रकों की संख्या बढ़कर रोजाना 60 से 70 ट्रक यानी लगभग 11,000 भेड़ें तक पहुंच जाती है।
पंजाब सरकार का पक्ष और विवाद की स्थिति
दूसरी तरफ, पंजाब सरकार ने इस पूरे मामले पर अपना रुख स्पष्ट किया है। पंजाब सरकार के अधिकारियों का कहना है कि यह कोई नया टैक्स या अतिरिक्त कर नहीं है, बल्कि यह केवल पशु मंडी शुल्क है। उनके मुताबिक, कुछ व्यापारी तय नियमों और प्रक्रियाओं का पालन किए बिना राज्य से बाहर पशुओं का परिवहन कर रहे हैं, जिससे राज्य के राजस्व को भारी नुकसान हो रहा है। इसी नुकसान को रोकने के लिए नियमों को सख्ती से लागू किया जा रहा है।
इसके विपरीत, जम्मू-कश्मीर के व्यापारियों का कहना है कि पंजाब उनके लिए केवल एक मार्ग यानी ट्रांजिट स्टेट है। उनके ट्रक केवल वहां के रास्तों से होकर गुजरते हैं, इसलिए उन पर पंजाब के भीतर का कोई टैक्स नहीं थोपा जाना चाहिए। व्यापारियों का कहना है कि पहले इस मद में केवल 5,000 रुपये लिए जाते थे, लेकिन अब कई स्थानों पर मनमाने ढंग से 25,000 रुपये तक की मांग की जा रही है, जो पूरी तरह से अनुचित है।
समाधान के लिए जल्द होगी बैठक
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला द्वारा उठाए गए कदमों के बाद अब उम्मीद जताई जा रही है कि इस गतिरोध को जल्द ही सुलझा लिया जाएगा। सूत्रों के अनुसार, इस कर विवाद को सुलझाने के लिए पंजाब और जम्मू-कश्मीर के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच बहुत जल्द एक उच्च स्तरीय बैठक आयोजित होने की संभावना है। इस बैठक में दोनों पक्षों के तर्कों को सुना जाएगा, जिसके बाद पंजाब सरकार इस मामले पर अपना औपचारिक और अंतिम जवाब दाखिल करेगी। घाटी के लोग और व्यापारी वर्ग इस बैठक के सकारात्मक नतीजों की उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे हैं ताकि शादियों की रौनक और वाजवान का स्वाद फिर से लौट सके।
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