भारत में मानसून का आगमन कृषि क्षेत्र के लिए नए अवसर लेकर आता है। इस मौसम में अधिकांश किसान धान, सोयाबीन और मक्का जैसी पारंपरिक खरीफ फसलों की बुवाई में व्यस्त हो जाते हैं। हालांकि, इन मुख्य फसलों के साथ एक समस्या यह है कि इनकी फसल तैयार होने में लंबा समय लगता है और किसानों को मुनाफे के लिए महीनों इंतजार करना पड़ता है। ऐसे में अगर आप कम समय में अधिक और लगातार कमाई करने वाली किसी फसल की तलाश में हैं, तो जुलाई का महीना आपके लिए एक बेहतरीन मौका साबित हो सकता है। इस महीने में हरी धनिया की खेती शुरू करके आप बहुत ही कम समय में बेहतरीन मुनाफा कमा सकते हैं।
बरसात के दिनों में बाजार में हरी धनिया की मांग तो वैसी ही बनी रहती है, लेकिन खेतों में पानी भरने और फसल खराब होने के कारण इसकी आपूर्ति बेहद कम हो जाती है। यही कारण है कि इस दौरान धनिया के दाम आसमान छूने लगते हैं। कम लागत, त्वरित पैदावार और बार-बार कटाई की अनूठी खूबी के कारण इस मौसम में धनिया उगाना किसानों के लिए एक सोने का अंडा देने वाली मुर्गी की तरह साबित हो सकता है।
बरसात के मौसम में क्यों बढ़ जाते हैं हरी धनिया के दाम?
उद्यान विभाग के विशेषज्ञों का मानना है कि जो किसान अपनी पारंपरिक फसलों से मनमुताबिक मुनाफा नहीं कमा पा रहे हैं, वे हरी धनिया की खेती को एक सहायक या मुख्य व्यवसाय के रूप में अपनाकर अपनी किस्मत बदल सकते हैं। सोहावल विकासखंड की उद्यान विकास अधिकारी सुधा पटेल ने इस संबंध में महत्वपूर्ण जानकारियां साझा की हैं। उनका कहना है कि जुलाई से लेकर अक्टूबर तक के महीनों में बाजार में हरी धनिया का भाव अपने उच्चतम स्तर पर होता है।
बरसात के मौसम में जलभराव के कारण धनिया की सामान्य फसलें नष्ट हो जाती हैं, जिससे मंडियों में इसकी भारी कमी हो जाती है। इस कमी के कारण थोक और खुदरा बाजारों में धनिया की कीमत कई बार 150 रुपये से लेकर 250 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है। ऐसे में यदि किसान वैज्ञानिक और आधुनिक तकनीकों का सहारा लेकर इस समय धनिया की सफल पैदावार कर लें, तो वे बहुत ही कम समय में अपनी आमदनी को कई गुना बढ़ा सकते हैं।
खेत का चुनाव और मिट्टी की तैयारी है सबसे महत्वपूर्ण
मानसून में धनिया उगाने के लिए सबसे बड़ी चुनौती अत्यधिक बारिश और जलभराव होती है। इसलिए, खेत का चयन और उसकी तैयारी करते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
- ऊंचे स्थानों का चयन: धनिया की बुवाई के लिए हमेशा ऐसे खेत का चुनाव करें जो थोड़े ऊंचे हों या जिनमें हल्की ढलान हो। इससे बारिश का पानी खेत में जमा नहीं हो पाता। धनिया के पौधों की जड़ें बहुत संवेदनशील होती हैं, और अगर खेत में पानी जमा रहेगा तो जड़ें सड़ जाएंगी और पूरी फसल बर्बाद हो सकती है।
- खेत की जुताई और खाद: बुवाई से पहले खेत की अच्छी तरह से गहरी जुताई कर लेनी चाहिए ताकि मिट्टी भुरभुरी हो जाए। मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए प्रति एकड़ लगभग 100 क्विंटल अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद को मिट्टी में मिलाना चाहिए।
- रेज़्ड बेड (उठे हुए बेड) का निर्माण: परंपरागत समतल खेत में बुवाई करने के बजाय उठे हुए बेड यानी मेड़ों का निर्माण करना चाहिए। इन ऊंचे बेड पर धनिया लगाने से अतिरिक्त पानी नालियों के जरिए आसानी से बाहर निकल जाता है और पौधों की जड़ों को पर्याप्त हवा और पोषण मिलता रहता है।
उन्नत किस्मों का चयन और बीजों का वैज्ञानिक उपचार
धनिया की खेती में सफलता पाने के लिए सही और उन्नत बीजों का चुनाव करना बेहद जरूरी है। मानसून के मौसम के लिए कुछ खास हाइब्रिड और देसी किस्में बहुत लोकप्रिय हैं:
- नामधारी
- पंत हरितमा
- सुरुचि
- देसी धनिया
इन किस्मों की बाजार में काफी मांग रहती है क्योंकि इनकी खुशबू और पत्तियों का स्वाद बहुत ही शानदार होता है। बुवाई से पहले बीजों को तैयार करने की एक विशेष वैज्ञानिक प्रक्रिया होती है जिसका पालन करना आवश्यक है:
एक एकड़ खेत के लिए लगभग 10 से 12 किलो बीजों की आवश्यकता होती है। बुवाई करने से पहले इन बीजों को हल्के हाथों से रगड़कर दो भागों में तोड़ लेना चाहिए। इसके बाद, टूटे हुए बीजों को लगभग 12 घंटे के लिए साफ पानी में भिगोकर रखना चाहिए। बीजों को फफूंद जनित रोगों से बचाने के लिए कार्बोहाइड्रेट युक्त कवकनाशी या विशेष रूप से कार्बेंडाजिम फफूंदनाशी से उपचारित करना अनिवार्य है। इस उपचार से बीजों का अंकुरण तेजी से और बेहतर तरीके से होता है और शुरुआती दौर में लगने वाले रोगों का खतरा न के बराबर हो जाता है।
जलभराव से बचाव और मेड़ों पर बुवाई की तकनीक
धनिया की फसल को बरसात में सुरक्षित रखने के लिए जल निकासी की व्यवस्था सबसे अचूक उपाय है। इसके लिए खेत के चारों तरफ गहरी और चौड़ी नालियां बनानी चाहिए ताकि मूसलाधार बारिश होने पर भी अतिरिक्त पानी तुरंत खेत से बाहर बह जाए। इसके अलावा, समय-समय पर खेत की निराई-गुड़ाई करते रहना चाहिए जिससे खरपतवारों पर नियंत्रण पाया जा सके।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, धनिया को समतल जमीन के बजाय मेड़ों पर बोने से कई फायदे होते हैं। मेड़ों पर होने के कारण पौधों को भरपूर धूप मिलती है, जिससे पत्तियों का फैलाव बहुत अच्छा होता है। इसके साथ ही, पानी सीधे पौधों के तने को नहीं छूता, जिससे पौधों के गलने की समस्या से पूरी तरह छुटकारा मिल जाता है और कुल उत्पादन में काफी बढ़ोतरी दर्ज की जाती है।
'मल्टी-कट' तकनीक: लगातार कमाई का जरिया
अगर किसान भाई जुलाई के महीने में मल्टी-कट हाइब्रिड धनिया की बुवाई करते हैं, तो उन्हें पहली कटाई बुवाई के महज 35 से 40 दिनों के भीतर ही मिल जाती है। इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि कटाई के समय धनिया को जड़ समेत नहीं उखाड़ा जाता।
कटाई के दौरान केवल ऊपर की हरी पत्तियों को काटा जाता है और उसकी जड़ों को मिट्टी में ही सुरक्षित छोड़ दिया जाता है। प्रत्येक कटाई के बाद खेत में हल्की मात्रा में यूरिया का छिड़काव करके हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। ऐसा करने से पौधों में दोबारा बहुत तेजी से फुटाव होता है। इस तरह, लगभग 15-15 दिन के अंतराल पर किसान आसानी से 3 से 4 बार तक धनिया की कटाई ले सकते हैं। इस वैज्ञानिक पद्धति को अपनाकर किसान सितंबर के अंत या अक्टूबर के शुरुआती दिनों तक बाजार में ऊंचे दामों पर धनिया बेचकर लगातार मुनाफा कमा सकते हैं।
बघेलखंड के किसानों ने पेश की मिसाल: क्रमिक बुवाई का सफल फार्मूला
मध्य प्रदेश के बघेलखंड क्षेत्र के किसानों ने धनिया की खेती का एक अनूठा और बेहद व्यावहारिक बिजनेस मॉडल विकसित किया है। यहां के किसान सुरुचि और देसी धनिया जैसी उत्कृष्ट किस्मों का चयन करके बड़े पैमाने पर मुनाफा कमा रहे हैं। बघेलखंड के सफल किसानों का मानना है कि यदि आप पूरे सीजन में लगातार बिना रुके मोटी कमाई करना चाहते हैं, तो आपको क्रमिक बुवाई की नीति अपनानी चाहिए।
इस फार्मूले के तहत किसान अपने पूरे खेत को तीन से चार हिस्सों में विभाजित कर लेते हैं। वे पूरे खेत में एक साथ बुवाई करने के बजाय, प्रत्येक हिस्से में 15 से 20 दिन के अंतराल पर धनिया बोते हैं। इस योजनाबद्ध तरीके से काम करने का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि जब खेत के पहले हिस्से की फसल की आखिरी कटाई हो रही होती है, तब दूसरे हिस्से की फसल पहली कटाई के लिए पूरी तरह तैयार हो जाती है।
इस प्रकार, खेत के सभी हिस्सों से बारी-बारी से उपज मिलती रहती है और बाजार में धनिया की निरंतर आपूर्ति बनी रहती है। इस क्रमिक बुवाई चक्र के माध्यम से किसान लगातार चार से पांच महीने तक बाजार में अपनी पकड़ बनाए रखते हैं और भारी मुनाफा कमाते हैं। संक्षेप में कहें तो, पारंपरिक खेती की तुलना में यह तरीका कम लागत और कम समय में किसानों को अमीर बनाने की पूरी क्षमता रखता है।
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