बीएचयू का हैदराबाद गेट और निजाम की जूती वाली कहानी, क्या है इसके पीछे का सच?

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के हैदराबाद गेट से जुड़ी एक मशहूर कहानी इंटरनेट पर प्रचलित है, लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेज इसे महज एक मिथक बताते हैं। जानिए क्या था बीएचयू और निजाम के बीच का वास्तविक संबंध।

क्या बीएचयू गेट की कहानी महज एक किंवदंती है

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी यानी बीएचयू का हैदराबाद गेट दशकों से एक बेहद चर्चित और विवादास्पद कहानी के कारण चर्चा में रहा है। आम लोगों और सोशल मीडिया पर अक्सर यह दावा किया जाता है कि जब पंडित मदन मोहन मालवीय विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए चंदा इकट्ठा करने हैदराबाद पहुंचे थे, तो वहां के सातवें निजाम मीर उस्मान अली खान ने उनके साथ अपमानजनक व्यवहार करते हुए उन पर जूती फेंकी थी। लोककथाओं के अनुसार, मालवीय जी ने उस जूती को भी विश्वविद्यालय के हित में नीलाम कर दिया और उससे जो राशि मिली, उसका उपयोग संस्थान के विकास में किया गया।

ऐतिहासिक तथ्यों में क्या दर्ज है

हालांकि, इतिहासकार और शोधकर्ता इस पूरी घटना को गलत मानते हैं। तेलंगाना राज्य अभिलेखागार में मौजूद आधिकारिक दस्तावेजों की मानें तो निजाम और पंडित मदन मोहन मालवीय के संबंध कहीं अधिक सम्मानजनक थे। वर्ष 1920 में निजाम मीर उस्मान अली खान ने एक शाही फरमान जारी किया था, जिसके माध्यम से उन्होंने बीएचयू को एक लाख रुपये की भारी आर्थिक सहायता प्रदान की थी। यह दान पूरी तरह से बिना किसी शर्त के दिया गया था।

सम्मान के तौर पर नामकरण

निजाम द्वारा दिए गए इसी महत्वपूर्ण वित्तीय योगदान के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए विश्वविद्यालय के मुख्य प्रवेश द्वार का नाम हैदराबाद गेट रखा गया था। यह तथ्य साबित करता है कि जो किस्से वर्षों से सुनाए जा रहे हैं, वे वास्तविकता से कोसों दूर हैं। इतिहास की सच्चाई अक्सर उन लोककथाओं से कहीं ज्यादा गरिमापूर्ण और प्रेरणादायक होती है जो केवल मनोरंजन के लिए गढ़ी जाती हैं।

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