भारत ने अपनी चिनाब नदी को लेकर एक ऐसा कदम उठाया है, जिसने एक बार फिर पाकिस्तान की नींद उड़ा दी है। हर बार की तरह संकट में फंसा इस्लामाबाद फिर से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर 'धोखा-धोखा' का राग अलापने लगा है। दरअसल, भारत सरकार ने चिनाब नदी के अतिरिक्त पानी का रुख मोड़ने के लिए एक विशाल परियोजना का पूरा खाका तैयार कर लिया है और इसके टेंडर जारी होते ही पड़ोसी मुल्क में हड़कंप मच गया है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने सिंधु जल समझौते का हवाला देते हुए आरोप लगाया है कि भारत 'वॉटर वेपन' का इस्तेमाल कर रहा है।
क्या है भारत का 'लिंक-3 प्रोजेक्ट'
भारत 1 अगस्त 2026 से हिमाचल प्रदेश के ऊंचे पहाड़ों में एक ऐसी परियोजना शुरू करने जा रहा है, जो सीधे तौर पर नदियों के भूगोल को बदलने की ताकत रखती है। इस महत्वाकांक्षी और रणनीतिक रूप से अहम परियोजना को 'लिंक-3 प्रोजेक्ट' (Chenab-Beas Link Tunnel) का नाम दिया गया है। हिमाचल प्रदेश के लाहुल-स्पीति में चंद्रा और भागा नदियों के संगम से बनने वाली चिनाब नदी का जो पानी अब तक बिना किसी रुकावट के सीधे पाकिस्तान की ओर बह जाता था, भारत अब उसकी हर एक बूंद का हिसाब रखने की तैयारी में है।
परियोजना के आंकड़ों ने उड़ाए होश
इस परियोजना का दायरा इतना बड़ा है कि इसके आंकड़े देखकर ही पाकिस्तानी रक्षा विशेषज्ञ बेचैन हैं।
- भारी-भरकम बजट: इस परियोजना को धरातल पर उतारने के लिए भारत करीब 26.2 अरब भारतीय रुपये खर्च करने जा रहा है। सरकारी एजेंसियों ने इसके लिए विधिवत बोली लगाए जाने का इंतजाम भी कर लिया है।
- सुरंगों का जाल: इस रकम से पहाड़ों को चीरते हुए एक लंबी और गहरी अंडरग्राउंड टनल बनाई जाएगी। इसका काम चिनाब नदी के अतिरिक्त पानी को रोककर उसका रुख व्यास नदी के बेसिन की तरफ मोड़ना होगा।
- 1.9 मिलियन एकड़ फीट का खेल: इस टनल के जरिए भारत हर साल चिनाब नदी से लगभग 1.9 मिलियन एकड़ फीट पानी का रुख मोड़ेगा। यह पानी पाकिस्तान जाने के बजाय सीधे भारत के अपने व्यास नदी सिस्टम में आ मिलेगा, जिससे देश के कृषि और बिजली क्षेत्रों को भारी फायदा होगा।
पाकिस्तान का वही पुराना रोना
जैसे ही भारत के इस सार्वजनिक टेंडर की प्रति इस्लामाबाद पहुंची, वहां के विदेश मंत्रालय में आपातकालीन बैठकों का दौर शुरू हो गया। विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मुमताज जहरा बलोच और कार्यवाहक प्रवक्ता अंद्राबी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर भारत पर जमकर भड़ास निकाली और पूरी दुनिया के सामने पीड़ित होने का कार्ड खेलना शुरू कर दिया।
पाकिस्तान का कहना है कि 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुए सिंधु जल समझौते के तहत तीन पश्चिमी नदियों- सिंधु, झेलम और चिनाब- के पानी पर उसका मालिकाना हक है। उसका तर्क है कि भारत इस तरह एक बेसिन से दूसरे बेसिन में पानी ट्रांसफर नहीं कर सकता। पाकिस्तानी प्रवक्ताओं ने आरोप लगाया कि भारत इस परियोजना को लेकर कोई आधिकारिक जानकारी या नोटिस साझा नहीं कर रहा है। उन्होंने सीधे तौर पर कहा कि भारत पानी को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है, ताकि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था, खेती और उसके 25 करोड़ लोगों की जिंदगी को पूरी तरह तबाह किया जा सके।
अंतरराष्ट्रीय अदालत जाने की धमकी
बात सिर्फ चिनाब-व्यास लिंक टनल तक सीमित नहीं है। पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर के रियासी जिले में स्थित भारत के 'सलाल बांध' को लेकर भी नया मोर्चा खोल दिया है। दरअसल, भारत इस बांध के नीचे जमा हो चुके कीचड़ और मलबे को साफ करने के लिए 'सिल्ट फ्लशिंग' की योजना बना रहा है। पाकिस्तान को डर है कि इस सफाई के बहाने भारत पानी के बहाव को रोकने और उसे अपनी मर्जी से छोड़ने की वैसी तकनीकी क्षमता हासिल कर लेगा, जो सिंधु जल समझौते या 1978 के सलाल समझौते के तहत जायज नहीं है।
हम हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठेंगे। हमारे पानी, भोजन और आर्थिक सुरक्षा को खतरे में डालने वाला कोई भी अवैध कदम हमें बर्दाश्त नहीं है। अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए हमारे पास अंतरराष्ट्रीय अदालतों में जाने समेत सभी विकल्प खुले हैं।
आखिर भारत का रुख क्या है
पाकिस्तान जिस सिंधु जल समझौते की दुहाई दे रहा है, क्या भारत वाकई उसे तोड़ रहा है? इसका जवाब इतना सीधा नहीं है।
- समझौते की बारीकियां: 1960 की संधि के तहत पूर्वी नदियां यानी रावी, व्यास और सतलुज भारत को, जबकि पश्चिमी नदियां यानी सिंधु, झेलम और चिनाब पाकिस्तान को मिलीं। लेकिन इसी संधि में भारत को पश्चिमी नदियों पर 'नॉन-कंजम्प्टिव', यानी पानी को खत्म किए बिना बिजली बनाने और बाढ़ नियंत्रण के लिए सीमित इस्तेमाल की छूट दी गई है।
- सरप्लस पानी का गणित: भारत का तर्क है कि वह चिनाब के केवल 'सरप्लस', यानी उस अतिरिक्त पानी को मोड़ रहा है जो मानसून या बाढ़ के दौरान यूं ही बह जाता है। भारत इस पानी का इस्तेमाल अपने हिस्से की व्यास नदी को रीचार्ज करने के लिए कर रहा है।
- रणनीतिक दबाव: उरी और पुलवामा हमलों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ कहा था कि 'खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते'। भारत अब उसी कूटनीति पर आगे बढ़ रहा है और संधि को तोड़े बिना उसके भीतर मौजूद कानूनी रास्तों के सहारे पाकिस्तान पर रणनीतिक दबाव बना रहा है।
दक्षिण एशिया में मजबूत स्थिति में भारत
पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र (UN) और वियना कन्वेंशन से गुहार लगाई है कि वे भारत की इस 'पानी की दादागिरी' को रोकें, वरना दक्षिण एशिया में इसके गंभीर और विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं। पाकिस्तान बखूबी जानता है कि अगर भारत ने चिनाब और झेलम के पानी पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली, तो उसके पंजाब और सिंध प्रांत पूरी तरह सूख जाएंगे, जो उसकी रीढ़ की हड्डी माने जाते हैं।
भारत इस मुद्दे पर बेहद मजबूत स्थिति में है। नई दिल्ली ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी सीमाओं के भीतर विकास परियोजनाएं आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। भारत इस परियोजना पर बिना रुके आगे बढ़ रहा है और पाकिस्तान के पास दुनिया के सामने रोने के अलावा कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा। यह लिंक-3 प्रोजेक्ट आने वाले समय में दोनों देशों के रिश्तों की दिशा तय करने वाला सबसे बड़ा कारक बनने जा रहा है।
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