चीन की नई साजिश: तिब्बत की पहचान मिटाकर हिमालय के पीछे बिछाया खतरनाक जाल

चीन तिब्बत में अपनी सांस्कृतिक पहचान को मिटाने के लिए बच्चों को उनके परिवारों से दूर कर रहा है, जो दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक संतुलन के लिए एक बड़ा खतरा बनता जा रहा है।

तिब्बत की संस्कृति पर चीन का सीधा हमला

चीन अपनी विस्तारवादी नीतियों के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है, लेकिन अब वह हिमालय के पीछे एक ऐसी गहरी साजिश रच रहा है, जिसकी कल्पना 67 साल पहले भारत आने वाले दलाईलामा ने भी शायद नहीं की होगी। चीन सिर्फ अपनी सीमाओं का विस्तार ही नहीं कर रहा, बल्कि तिब्बत की मिट्टी से वहां की भाषा, धर्म और संस्कृति को ही मिटाने की कोशिश कर रहा है। वह भविष्य की पीढ़ियों को चीनी पहचान में ढालने के लिए मासूम बच्चों को निशाना बना रहा है।

दस लाख बच्चों को बनाया जा रहा निशाना

कूटनीतिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने द हिल में प्रकाशित अपने लेख में इस भयावह सच्चाई का खुलासा किया है। पिछले दस वर्षों में चीन ने दस लाख से अधिक तिब्बती बच्चों को उनके परिवारों से जबरन अलग कर सरकारी बोर्डिंग स्कूलों में डाल दिया है। इन स्कूलों में बच्चों को उनके माता-पिता से दूर रखा जाता है और वहां केवल मंदारिन भाषा में शिक्षा दी जाती है। इन बच्चों में से ज्यादातर की उम्र चार या पांच साल से भी कम है। चीन इसे शिक्षा और विकास का एक मॉडल करार देता है, लेकिन हकीकत में यह तिब्बती संस्कृति को खत्म करने और उन पर चीनी पहचान थोपने का एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।

मानसिक नियंत्रण और नई पीढ़ी का भविष्य

बच्चों के दिमाग पर नियंत्रण कर चीन भविष्य की राह को अपने अनुकूल बनाना चाहता है। इन स्कूलों में तिब्बती बच्चों को यह पढ़ाया जा रहा है कि उनकी सांस्कृतिक विरासत अब पुरानी हो चुकी है। उन्हें उनके धर्म और जड़ों से काटकर पूरी तरह चीन के रंग में रंगने की कोशिश की जा रही है। इतिहास गवाह है कि इसी तरह की तकनीक का इस्तेमाल अंग्रेजों ने भी अपने उपनिवेशों में लोगों को अपनी संस्कृति से दूर करने के लिए किया था। आज कनाडा, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भी स्वीकार करते हैं कि किस तरह औपनिवेशिक शासन ने लोगों से उनकी परंपराएं छीन ली थीं। चीन भी ठीक उसी राह पर है।

भू-राजनीति और दक्षिण एशिया के लिए खतरा

तिब्बत का यह मुद्दा केवल एक संस्कृति के मिटने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दक्षिण एशिया की राजनीति पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं। तिब्बत को अक्सर दुनिया की छत कहा जाता है। इस क्षेत्र पर पूर्ण नियंत्रण हासिल करने के बाद चीन हिमालय पर अपनी सैन्य ताकत को और अधिक तेजी से बढ़ा सकता है। इसके अलावा, एशिया की अधिकांश प्रमुख नदियां तिब्बत से ही निकलती हैं। उन नदियों के जल प्रवाह पर नियंत्रण का मतलब है कि चीन भविष्य में किसी भी देश को पानी के मुद्दे पर दबाव में ले सकता है। चीन तिब्बत में दुनिया के सबसे बड़े बांधों का निर्माण कर रहा है और वहां के प्राकृतिक खनिजों का दोहन भी तेजी से किया जा रहा है। यह सब कुछ चीन की उसी रणनीति का हिस्सा है ताकि भविष्य में उसे कोई चुनौती देने वाला न रहे।

तिब्बत का नामोनिशान मिटाने की कवायद

चीन केवल लोगों की संस्कृति ही नहीं बदल रहा, बल्कि वह तिब्बत के भौगोलिक नाम को भी इतिहास के पन्नों से मिटाने की कोशिश कर रहा है। अब वह आधिकारिक तौर पर Xizang शब्द का इस्तेमाल कर रहा है, जो चिंग राजवंश के समय का शब्द है और इसका अर्थ होता है खजाने से भरी हुई धरती। हैरानी की बात यह है कि दुनिया भर के कई संग्रहालय भी अब चीन के इस दबाव में आकर तिब्बत की जगह Xizang शब्द का प्रयोग करने लगे हैं, विशेषकर पश्चिमी देशों में यह चलन तेजी से बढ़ रहा है। यह भारत के लिए भी एक गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए क्योंकि हिमालय के उस पार बदल रही यह डेमोग्राफी और पहचान न केवल भारत की सुरक्षा के लिए, बल्कि समूचे क्षेत्र के संतुलन के लिए भी एक बड़ा खतरा है।

https://hindi.news18.com/world/china-china-dirty-game-behind-himalayas-hidden-strategy-ibet-xizang-explained-10620059.html