सिंधु जल का मुद्दा और पाकिस्तान की बढ़ती बेचैनी
भारत और पाकिस्तान के बीच तनावपूर्ण संबंधों के इतिहास में सिंधु जल का मुद्दा हमेशा से एक संवेदनशील विषय रहा है। अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद दोनों देशों के बीच आधिकारिक वार्ता पूरी तरह से ठप हो चुकी है। इस घटना के बाद भारत सरकार ने एक बड़ा और रणनीतिक कदम उठाते हुए सिंधु जल संधि को स्थगित करने का फैसला लिया। इस निर्णय का सीधा असर पाकिस्तान की जल सुरक्षा पर पड़ा है, जो सिंचाई और पेयजल के लिए इसी पानी पर निर्भर है। पाकिस्तान के लिए यह स्थिति केवल एक कूटनीतिक संकट नहीं, बल्कि अस्तित्व बचाने की चुनौती बन गई है क्योंकि देश की लगभग 90 प्रतिशत कृषि सिंधु बेसिन से जुड़ी हुई है।
खरीफ सीजन और पानी की कमी का डर
मई 2025 में सामने आई पाकिस्तानी रिपोर्ट्स में यह चिंता साफ तौर पर जाहिर की गई थी कि उस सीजन में पाकिस्तान को 21 प्रतिशत तक पानी की भारी किल्लत का सामना करना पड़ सकता है। पाकिस्तानी अधिकारियों को उस समय यह डर सता रहा था कि सिंचाई के लिए पानी न मिलने के कारण खरीफ की पूरी फसल बर्बाद हो जाएगी। पंजाब और सिंध प्रांत के क्षेत्रों में पानी की कमी के कारण अफरातफरी का माहौल था। हालांकि, पाकिस्तान सरकार लगातार भारत के खिलाफ बयानबाजी कर रही थी, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति गंभीर थी। चेनाब और झेलम नदियों में पानी का प्रवाह उम्मीद से काफी कम था, जिसने पाकिस्तानी प्रशासन की रातों की नींद उड़ा दी थी।
कुदरत की मेहरबानी और पाकिस्तान का बचाव
पाकिस्तान जिस जल संकट को लेकर सशंकित था, वह अप्रत्याशित प्राकृतिक घटनाओं के कारण फिलहाल टल गया। मई-जून 2025 के महीनों में ऊपरी हिमालयी इलाकों में सामान्य से अधिक बर्फ पिघली, जिससे नदियों में पानी का स्तर बढ़ गया। इसके बाद अगस्त 2025 में हुई भीषण बारिश और उसके बाद आई बाढ़ ने पाकिस्तान के जलाशयों में पानी की कमी को पूरा कर दिया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जहाँ पाकिस्तान ने खरीफ सीजन के लिए 104.03 मिलियन एकड़ फीट पानी का अनुमान लगाया था, वहीं वास्तविक उपलब्धता 122.36 मिलियन एकड़ फीट रही, जो अनुमान से 18 फीसदी अधिक थी। सितंबर 2025 तक पाकिस्तान के प्रमुख जलाशय 99 प्रतिशत तक भर चुके थे, जिससे एक बड़ा संकट फिलहाल के लिए टल गया।
तर्बेला बांध का घटता जलस्तर: एक स्थायी खतरा
पाकिस्तान के लिए असली समस्या केवल भारत का रुख नहीं, बल्कि उसके प्रमुख बांधों की गिरती कार्यक्षमता है। सिंधु बेसिन की सिंचाई व्यवस्था का मुख्य आधार तर्बेला बांध है। इस बांध की शुरुआत में जल भंडारण क्षमता 9.68 मिलियन एकड़ फीट थी, जो अब गाद (सिल्ट) जमा होने के कारण घटकर केवल 5.73 मिलियन एकड़ फीट रह गई है। यानी बांध की लगभग 48 प्रतिशत क्षमता खत्म हो चुकी है। मई 2022 में तर्बेला बांध की क्षमता 5.827 मिलियन एकड़ फीट थी, जो मार्च 2026 तक और सिमटकर 5.580 मिलियन एकड़ फीट पर आ गई है। पिछले 15 वर्षों में नदियों के जरिए इतनी अधिक गाद आई है कि बांधों का भरना और भविष्य में पानी का सुरक्षित भंडारण करना पाकिस्तान के लिए एक बड़ी आपदा का संकेत है।
भारत का अडिग रुख और भविष्य की चुनौतियां
भारत सरकार ने 23 अप्रैल 2025 को स्पष्ट कर दिया था कि 1960 की सिंधु जल संधि को तब तक स्थगित रखा जाएगा जब तक पाकिस्तान सीमा पार से होने वाले आतंकवाद को पूरी तरह और स्थायी रूप से बंद नहीं करता। भारत का यह कड़ा रुख संकेत देता है कि अब पानी और बातचीत का मामला अलग-अलग नहीं रह गया है। पाकिस्तान भले ही बाढ़ और बर्फ पिघलने की बदौलत इस साल बच गया हो, लेकिन आने वाले समय में जल भंडारण की घटती क्षमता और जलवायु परिवर्तन के कारण स्थितियां और विकट हो सकती हैं। यदि पाकिस्तान अपने बांधों की सफाई या रखरखाव में सुधार नहीं कर पाता है, तो आने वाले वर्षों में सिंधु के पानी का कोई भी थोड़ा सा बदलाव भी देश की कृषि और खाद्य सुरक्षा को पूरी तरह तबाह कर सकता है। भारत का यह कूटनीतिक वार पाकिस्तान को अपनी पुरानी नीतियों पर सोचने के लिए मजबूर कर रहा है, क्योंकि प्राकृतिक आपदाएं हर बार देश को सूखे से बचाने के लिए नहीं आएंगी।
https://hindi.news18.com/world/pakistan-how-pakistan-feared-major-water-shortage-after-india-stopped-indus-treaty-in-2025-flood-saved-but-damn-capacity-downs-10619285.html