खेती में बदलाव का नया सफर
खरीफ सीजन की आहट के साथ ही किसान अब अपनी फसलों की बुवाई के लिए कमर कस चुके हैं। अरहर की खेती में एक नया और सफल उदाहरण रायपुर के मिलाराबाद निवासी युवा किसान लक्ष्मीकांत प्रधान ने पेश किया है। लक्ष्मीकांत अपने परिवार की पांचवीं पीढ़ी हैं जो अरहर की खेती कर रहे हैं। इस साल उन्होंने 14 एकड़ भूमि पर अरहर की फसल लगाई है। उनकी सफलता का राज वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पारंपरिक ज्ञान का सही तालमेल है, जो आज अन्य किसानों के लिए भी एक बेहतरीन मिसाल बन गया है।
सही बीज का चुनाव है सफलता की पहली सीढ़ी
लक्ष्मीकांत का मानना है कि फसल की सफलता का सबसे बड़ा आधार बीजों का चयन है। वे बताते हैं कि मिट्टी की गुणवत्ता और भौगोलिक स्थिति के अनुसार ही किस्म का चयन करना चाहिए। छत्तीसगढ़ की प्रमुख किस्म राजीव लोचन अपने बेहतरीन स्वाद के लिए न केवल राज्य में बल्कि पूरे देश में जानी जाती है। इसके अलावा, यदि किसान अधिक उत्पादन की तलाश में हैं, तो वे CG-01 किस्म या फिर महाराष्ट्र की प्रसिद्ध दफ्तरी-48 किस्म का विकल्प भी चुन सकते हैं।
बुवाई से पहले की महत्वपूर्ण तैयारियां
फसल की सेहत सुनिश्चित करने के लिए लक्ष्मीकांत बीजोपचार पर खासा जोर देते हैं। बीजों का सही उपचार करने से मिट्टी से होने वाली बीमारियों का खतरा पूरी तरह टल जाता है और अंकुरण की क्षमता भी बढ़ जाती है। इसके बाद, खेत की गहरी जुताई करना बहुत जरूरी है। इससे मिट्टी भुरभुरी और उपजाऊ बनती है, जिससे पौधों की जड़ें गहराई तक जा सकती हैं और वे मजबूती से अपना विकास कर पाते हैं।
बेड टू बेड तकनीक के फायदे
लक्ष्मीकांत ने अरहर की खेती के लिए बेड टू बेड तकनीक को सबसे कारगर बताया है। यह विधि पौधों की देखभाल को काफी आसान बना देती है। इस तकनीक के उपयोग से कीटनाशकों का छिड़काव करने में कम समय और मेहनत लगती है। साथ ही, पौधों की ग्रोथ भी सामान्य तरीके से अधिक बेहतर होती है, जिससे खेती की कुल लागत में बड़ी कमी आती है।
बीज की बचत और पैदावार की गणित
तकनीक के अंतर को स्पष्ट करते हुए वे बताते हैं कि यदि किसान बेड टू बेड पद्धति अपनाते हैं, तो एक एकड़ जमीन के लिए केवल 6 से 8 किलो बीज की आवश्यकता होती है। इसकी तुलना में पारंपरिक लाइन टू लाइन पद्धति में प्रति एकड़ 10 से 11 किलो बीज का इस्तेमाल करना पड़ता है। कम बीज लगाने से किसान न केवल अपना खर्च बचा सकते हैं, बल्कि अधिक जमीन पर खेती करने में भी सक्षम होते हैं।
उत्पादन और रख-रखाव की बारीकियां
अरहर की फसल को आमतौर पर बहुत अधिक रख-रखाव की जरूरत नहीं होती है। हालांकि, फसल की शुरुआत में पत्तियों को खाने वाले कीटों से बचाव करना बहुत जरूरी होता है। लक्ष्मीकांत के अनुसार, यदि किसान सही तकनीक और सावधानी बरतें, तो वे प्रति एकड़ 7 से 10 क्विंटल तक का बंपर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। उनका यह अनुभव न केवल व्यक्तिगत सफलता की कहानी है, बल्कि प्रदेश के उन किसानों के लिए भी प्रेरणा है जो आधुनिक और मुनाफे वाली खेती की ओर कदम बढ़ाना चाहते हैं।
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