हिमाचल प्रदेश में मॉनसून ने एक बार फिर दस्तक दे दी है। रिमझिम बरसती बूंदें जहां मैदानी इलाकों के लोगों को गर्मी से राहत दे रही हैं, वहीं पहाड़ी राज्य हिमाचल के लोगों के दिलों में पिछले साल की भयावह यादें ताजा कर रही हैं। मंडी जिले की सराज घाटी के निवासी आज भी उस खौफनाक रात को नहीं भूले हैं, जब कुदरत ने ऐसा कहर बरपाया था जिसने पूरी घाटी का नक्शा ही बदल कर रख दिया। पिछले साल 30 जून की रात और 1 जुलाई की सुबह सराज घाटी के लिए किसी कयामत से कम नहीं थी। इस त्रासदी को गुजरे भले ही एक साल का वक्त बीत चुका है, लेकिन आज भी यहां के लोग उस दर्द से उबर नहीं पाए हैं।
कुदरत का ऐसा तांडव जिसने उजाड़ दी सराज घाटी
पिछले वर्ष जून के आखिरी दिन और जुलाई की पहली तारीख को सराज घाटी के विभिन्न क्षेत्रों में अचानक एक के बाद एक करीब 15 जगहों पर बादल फटे थे। गोहर, थुनाग, जंजैहली और बगस्याड जैसे खूबसूरत इलाके इस आसमानी आफत की चपेट में आ गए थे। इस भीषण आपदा के कारण पूरी घाटी में हाहाकार मच गया था। सरकारी आंकड़ों और स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार:
- इस तबाही में कुल मिलाकर लगभग 33 लोगों की जान चली गई थी, जबकि हादसे के शुरुआती दौर में ही 22 लोगों की मौत की पुष्टि हो गई थी।
- आपदा के दौरान लापता हुए लोगों में से 27 लोग अब भी लापता हैं, जिनका आज तक कोई सुराग नहीं मिल पाया है।
- घाटी के विभिन्न हिस्सों में कुल मिलाकर 500 घर पूरी तरह से जमींदोज हो गए थे।
- इसके अलावा, लगभग 1200 घरों को भारी नुकसान पहुंचा था।
- इस प्राकृतिक आपदा ने सराज घाटी के गोहर, थुनाग, जंजैहली और बगस्याड की करीब 80 हजार की आबादी को सीधे तौर पर प्रभावित किया था।
अरबों रुपये का नुकसान और ठप पड़ी योजनाएं
इस भयानक आपदा में केवल इंसानी जिंदगियां ही नहीं उजड़ीं, बल्कि लोगों की जीवनभर की कमाई, खेत, सड़कें और पानी की स्कीमें भी मलबे में तब्दील हो गईं। अकेले सराज क्षेत्र में ही इस आपदा से 1000 करोड़ रुपये से अधिक के नुकसान का आकलन किया गया था। खेत-खलिहान पूरी तरह बह गए और घाटी के लोगों का संपर्क बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट गया था।
हालात का जायजा लेने के लिए पिछले साल 21 जुलाई को केंद्र सरकार की एक विशेष टीम ने भी सराज घाटी का दौरा किया था। उस दौरान मंडी के तत्कालीन उपायुक्त (डीसी) अपूर्व देवगन ने केंद्रीय टीम को जिले में हुए भारी नुकसान की जानकारी दी थी। डीसी ने बताया था कि पूरे मंडी जिले में लगभग 708 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। इस आपदा की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केवल करसोग क्षेत्र में ही मात्र एक दिन के भीतर करीब 55 करोड़ रुपये की संपत्ति पूरी तरह नष्ट हो गई थी।
जयराम ठाकुर ने सरकार को घेरा, लगाया अनदेखी का आरोप
इस आपदा के एक साल बीत जाने के बाद भी सराज घाटी के लोग सामान्य जीवन पटरी पर लौटने का इंतजार कर रहे हैं। सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने इस मुद्दे पर प्रदेश की वर्तमान सरकार को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने सरकार पर राहत और पुनर्वास कार्यों में भारी लापरवाही और उदासीनता बरतने का गंभीर आरोप लगाया है।
जयराम ठाकुर का कहना है कि आज भी सराज के लोग बेहद दयनीय स्थिति में अस्थाई सुविधाओं के सहारे जीवन काटने को मजबूर हैं। उन्होंने कहा कि सड़क, बिजली और पानी जैसी अत्यंत आवश्यक मूलभूत सुविधाओं को केवल अस्थाई तौर पर ही बहाल किया गया है। आलम यह है कि थोड़ी सी भी बारिश होने पर ये सभी अस्थाई व्यवस्थाएं पूरी तरह से ठप हो जाती हैं, जिससे स्थानीय लोगों की मुश्किलें फिर से बढ़ जाती हैं।
नेता प्रतिपक्ष ने पानी की विकट समस्या का जिक्र करते हुए कहा कि क्षेत्र की करीब 150 करोड़ रुपये की पेयजल योजना आपदा के समय से ही बंद पड़ी है। इस बड़ी पेयजल योजना के ठप होने की वजह से इलाके की तीन दर्जन से अधिक पंचायतों के हजारों लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं। सरकार पिछले एक साल में लोगों के इन जख्मों को भरने में पूरी तरह नाकाम रही है।
सदन से लेकर सड़क तक उठाई आवाज, पर नहीं जागी सरकार
पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने रोष व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने सराज घाटी के बदतर हालातों को लेकर कई बार विधानसभा के भीतर और बाहर आवाज उठाई है। उन्होंने इस संबंध में मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री के समक्ष भी व्यक्तिगत रूप से मांग रखी, लेकिन सरकार की तरफ से कोई सकारात्मक पहल नहीं की गई।
"मैंने बार-बार सरकार का ध्यान इस त्रासदी की ओर खींचने का प्रयास किया, लेकिन किसी ने सराज के लोगों की सुध नहीं ली। मुख्यमंत्री को जनता की तकलीफों से कोई सरोकार नहीं है, वे केवल अपनी सरकार चलाने और राजनीतिक दांव-पेच में ही व्यस्त हैं। जनता से झूठे वादे करना ही इस सरकार की फितरत बन चुकी है।" - जयराम ठाकुर
उन्होंने मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री को नसीहत देते हुए कहा कि उन्हें इस समय खुद सराज घाटी का दौरा करना चाहिए और वहां धरातल पर जाकर हालातों का जायजा लेना चाहिए, ताकि उन्हें वहां रह रहे लोगों की वास्तविक और दर्दनाक स्थिति का अहसास हो सके। आज भी सराज घाटी के लोग उस भयावह रात के जख्मों और सरकारी बेरुखी के बीच अपनी जिंदगी को दोबारा संवारने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
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