अंतिम संस्कार के बाद पीछे मुड़कर क्यों नहीं देखा जाता? जानिए श्मशान से जुड़ी प्राचीन परंपराएं

अंतिम संस्कार के बाद श्मशान से लौटते समय पीछे न देखने और बच्चों को वहां ले जाने से बचने जैसी परंपराओं के पीछे गहरे धार्मिक और मनोवैज्ञानिक कारण छिपे हैं। आइए जानते हैं कि शास्त्रों के अनुसार इनके पीछे का वास्तविक महत्व क्या है।

अंतिम संस्कार से जुड़ी लोक मान्यताएं

जब भी श्मशान का नाम सामने आता है, तो मन में कई तरह के सवाल और संशय पैदा होने लगते हैं। समाज में सदियों से कई ऐसी परंपराएं चली आ रही हैं, जिनका पालन अंतिम संस्कार के बाद किया जाता है। अक्सर बड़ों से यह सुनने को मिलता है कि श्मशान से वापस आते समय पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए। इसके साथ ही छोटे बच्चों को अंतिम संस्कार में ले जाने से रोकने की भी हिदायत दी जाती है। आखिर इन मान्यताओं के पीछे का धार्मिक अर्थ क्या है और क्यों इन नियमों को इतना महत्वपूर्ण माना गया है, यह समझना जरूरी है।

लकड़ी का तिनका तोड़ने की परंपरा का अर्थ

महंत कामेश्वरानंद वेदांताचार्य के अनुसार, अंतिम संस्कार के बाद श्मशान से बाहर निकलते समय लकड़ी का एक छोटा तिनका तोड़कर पीछे फेंकने की एक विशिष्ट परंपरा है। इस क्रिया के दौरान तिनके के दो टुकड़े किए जाते हैं और उन्हें पीछे की तरफ फेंक दिया जाता है। इसके बाद पीछे मुड़कर न देखना ही उचित माना जाता है। इसके पीछे मुख्य उद्देश्य यह है कि उस जीवात्मा के साथ हमारा सांसारिक मोह पूरी तरह समाप्त हो जाए। जिस व्यक्ति के साथ जीवन के 60 से 70 साल का जुड़ाव और प्रेम रहा, वह शरीर के नष्ट होने के साथ ही समाप्त हो जाता है। यह परंपरा इस बात का प्रतीक है कि आत्मा अब अपनी आगे की यात्रा के लिए मुक्त है और हम उसे मोह के बंधन में नहीं बांधना चाहते। ऐसी कामना की जाती है कि आत्मा की सद्गति हो और वह भटकने के बजाय अपने गंतव्य की ओर अग्रसर हो जाए।

शांतिपूर्वक प्रस्थान और सुरक्षा के उपाय

धार्मिक मान्यताओं में यह भी स्पष्ट कहा गया है कि श्मशान से निकलते समय किसी को भी नाम पुकारकर साथ चलने के लिए नहीं कहना चाहिए। महंत कामेश्वरानंद वेदांताचार्य बताते हैं कि ऐसी धारणा है कि यदि आप किसी को आवाज देकर बुलाते हैं, तो संभव है कि कोई नकारात्मक शक्ति या बुरी आत्मा भी उस व्यक्ति के साथ घर तक चली आए। यही कारण है कि श्मशान परिसर से बाहर निकलते समय बिना किसी से कुछ कहे, पूर्ण शांति के साथ अपने घर की ओर प्रस्थान करना चाहिए। यह मौन यात्रा यह भी दर्शाती है कि भौतिक संबंधों की इतिश्री हो चुकी है और अब आत्मा सांसारिक सीमाओं से परे हो गई है।

बच्चों को श्मशान ले जाने पर मनाही क्यों?

अक्सर सवाल उठता है कि क्या बच्चों को अंतिम संस्कार में शामिल होना चाहिए? महंत कामेश्वरानंद वेदांताचार्य के मुताबिक, सामान्य परिस्थितियों में छोटे बच्चों को श्मशान ले जाने से बचना ही श्रेयस्कर होता है। बच्चों का मन और शरीर दोनों ही बहुत नाजुक होते हैं। श्मशान का वातावरण और वहां की शोकपूर्ण स्थितियां बच्चों की मानसिक स्थिति पर गहरा नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं। हालांकि, यदि कोई अनिवार्य परिस्थिति हो, जैसे कि 10 से 12 साल के बच्चे के पिता का निधन, तो वह किसी बड़े-बुजुर्ग के संरक्षण में रहकर मुखाग्नि जैसे संस्कार पूर्ण कर सकता है। लेकिन बिना किसी बड़ी आवश्यकता के, 18 से 20 साल से कम उम्र के बच्चों को वहां ले जाने से दूर ही रखा जाना चाहिए, क्योंकि इस उम्र के युवा ही जीवन और मृत्यु जैसी जटिल परिस्थितियों को समझने में सक्षम होते हैं।

घर लौटने के बाद शुद्धि के नियम

अंतिम संस्कार से लौटने के बाद घर में प्रवेश करने से पूर्व शुद्धि के नियमों का पालन करना अनिवार्य माना गया है। शास्त्रों में वर्णित निर्देशों के अनुसार, श्मशान से वापस आकर सबसे पहले अपने हाथ-पैर अच्छी तरह धोने चाहिए। इसके बाद स्नान करके खुद को शुद्ध करना आवश्यक है। संस्कार के दौरान पहने गए कपड़ों को भी धोना चाहिए, ताकि नकारात्मकता पूरी तरह समाप्त हो जाए।

देश के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग रीति-रिवाज भी प्रचलित हैं। कई स्थानों पर नीम की पत्ती चबाने या नीम की लकड़ी का तिनका तोड़कर तीन बार थूकने की परंपरा है। कुछ जगहों पर मिर्च को तोड़कर फेंकने का रिवाज भी है। इन सभी परंपराओं का मूल भाव एक ही है कि जीवन के दुख और कड़वे अनुभव घर की दहलीज के बाहर ही रह जाएं। यह उपाय घर में सुख-शांति बनाए रखने और किसी भी प्रकार की बुरी शक्ति के प्रवेश को रोकने के उद्देश्य से किए जाते हैं, ताकि घर का वातावरण सकारात्मक बना रहे।

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