संघर्ष से सफलता तक का सफर
डॉक्टर्स डे के विशेष अवसर पर आज एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो हर किसी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। बाड़मेर के एक किसान परिवार में जन्मे डॉ. मनोहर बालाच ने साबित कर दिया है कि यदि इरादे मजबूत हों, तो सीमित संसाधन भी सफलता की राह में रोड़ा नहीं बन सकते। ग्रामीण परिवेश की चुनौतियों और तमाम मुश्किलों के बीच अपनी कड़ी मेहनत के दम पर उन्होंने चिकित्सा के क्षेत्र में एक अलग मुकाम हासिल किया है।
नीट परीक्षा में हासिल की बड़ी कामयाबी
डॉ. मनोहर बालाच की सफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने नीट सुपर स्पेशलाइजेशन परीक्षा में 2400वीं रैंक प्राप्त की है। इस शानदार प्रदर्शन के बाद उन्हें एम.सी.एच. न्यूरोसर्जरी में प्रवेश मिला। यह उपलब्धि न केवल उनके परिवार के लिए गर्व की बात है, बल्कि बाड़मेर जैसे सुदूरवर्ती इलाके के युवाओं के लिए भी एक नई मिसाल है।
क्यों चुना न्यूरोसर्जरी का कठिन क्षेत्र?
डॉ. बालाच के डॉक्टर बनने के पीछे एक बहुत ही भावनात्मक और व्यावहारिक कारण है। उनका कहना है कि बाड़मेर में न्यूरोसर्जन की भारी कमी है, जिसके चलते सड़क हादसों और अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता। कई बार सही समय पर न्यूरोसर्जन उपलब्ध न होने के कारण लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है। अपनी आंखों के सामने ऐसी घटनाएं देखकर उन्होंने ठान लिया कि वे न्यूरोसर्जरी में विशेषज्ञता हासिल करेंगे और अपने जिले में आधुनिक चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराएंगे।
जिले की सेवा करने का लक्ष्य
अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद डॉ. मनोहर बालाच का एकमात्र उद्देश्य वापस बाड़मेर लौटना है। वे वहां के मरीजों को आधुनिक न्यूरोसर्जरी की सुविधाएं मुहैया कराना चाहते हैं ताकि किसी को भी इलाज के लिए दूसरे बड़े शहरों की ओर रुख न करना पड़े। गांव की बेबसी को ही अपनी प्रेरणा बनाने वाले डॉ. बालाच की यह कहानी भविष्य के कई अन्य डॉक्टरों के लिए एक मिसाल बनकर उभरी है।
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