रसोई में फिर से लौट रही है दादी-नानी की परंपरा
आज के दौर में हमारी रसोई के स्वरूप में एक दिलचस्प और सकारात्मक बदलाव देखा जा रहा है। एक समय था जब आधुनिकता की दौड़ में स्टील और नॉन-स्टिक बर्तनों ने लोहे की कढ़ाई की जगह ले ली थी, लेकिन अब लोग फिर से अपनी पुरानी और पारंपरिक जीवनशैली की ओर वापस लौट रहे हैं। रसोई में लोहे की कढ़ाई का इस्तेमाल करना अब केवल एक जरूरत नहीं, बल्कि एक ट्रेंड बन चुका है। लोग अब इस बात को गहराई से समझने लगे हैं कि लोहे की कढ़ाई में पका हुआ भोजन न केवल स्वाद में बेहतर होता है, बल्कि यह सेहत के लिए भी अत्यधिक गुणकारी है।
सेहत के लिए क्यों है फायदेमंद?
फरीदाबाद के सर्वोदय अस्पताल की चीफ डायटीशियन डॉ. मीना के अनुसार, लोहे की कढ़ाई में खाना पकाने की परंपरा सदियों पुरानी है। डॉ. मीना बताती हैं कि स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता का ही नतीजा है कि लोग फिर से पारंपरिक बर्तनों को प्राथमिकता दे रहे हैं। लोहे की कढ़ाई में खाना पकाने का सबसे बड़ा वैज्ञानिक लाभ यह है कि खाना पकाते समय बर्तन से आयरन की सूक्ष्म मात्रा भोजन में घुल जाती है। यह आयरन हमारे शरीर में हीमोग्लोबिन के स्तर को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
एनीमिया और आयरन की कमी का समाधान
डॉ. मीना ने विशेष रूप से उन लोगों के लिए इसे उपयोगी बताया है जो एनीमिया की समस्या से जूझ रहे हैं या जिनके शरीर में आयरन की कमी है। उन्होंने समझाया कि अक्सर लोगों को यह पता ही नहीं चलता कि उनके शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर गिर गया है। लोहे की कढ़ाई में बना भोजन शरीर को प्राकृतिक रूप से आयरन प्रदान करने का एक सरल जरिया है। हालाँकि, उन्होंने यह स्पष्ट किया कि इसे केवल एक पूरक आहार के तौर पर देखना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति में आयरन की गंभीर कमी है, तो उन्हें इसे इलाज का विकल्प नहीं मानना चाहिए और डॉक्टर द्वारा सुझाई गई दवाइयों या आयरन सप्लीमेंट को अनिवार्य रूप से लेना चाहिए।
किन लोगों को सावधानी बरतने की जरूरत है?
क्या लोहे की कढ़ाई का उपयोग हर किसी के लिए सुरक्षित है? इस पर डॉ. मीना का कहना है कि सामान्य तौर पर लोहे की कढ़ाई में खाना बनाना किसी के लिए भी नुकसानदायक नहीं होता है, लेकिन स्वास्थ्य के हर पहलू को समझना जरूरी है। जिन लोगों के शरीर में आयरन की मात्रा पहले से ही संतुलित है या अधिक है, उन्हें बिना डॉक्टर की सलाह के लगातार लोहे की कढ़ाई का उपयोग नहीं करना चाहिए। चूंकि हर इंसान की शारीरिक बनावट और स्वास्थ्य जरूरतें अलग-अलग होती हैं, इसलिए अपने स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर ही बर्तनों का चुनाव करना चाहिए।
बढ़ती जागरूकता और बाजार का चलन
डॉ. मीना के अनुसार, स्टील और एल्यूमीनियम के बर्तनों के बढ़ते चलन के बाद अब लोगों का रुझान वापस लोहे के बर्तनों की तरफ बढ़ा है। यह बदलाव दर्शाता है कि समाज अब अपनी जड़ों और स्वास्थ्यवर्धक आदतों को लेकर अधिक सजग हो गया है। आज के दौर में पारंपरिक तरीकों पर लोगों का भरोसा फिर से कायम हो रहा है, क्योंकि वे स्वास्थ्य के लंबे समय तक बने रहने वाले फायदों को महसूस कर पा रहे हैं।
लोहे की कैंडी का एक अनूठा उदाहरण
इस विषय पर बात करते हुए डॉ. मीना ने एक वैश्विक उदाहरण साझा किया। दुनिया के एक ऐसे देश में, जहाँ बड़ी आबादी आर्थिक तंगी के कारण आयरन की गोलियां या दवाइयां खरीदने में सक्षम नहीं थी, वहाँ स्वास्थ्य सुधार के लिए एक विशेष लोहे की कैंडी बनाई गई थी। सरकार ने इस पहल को बढ़ावा दिया और लोगों को जागरूक किया कि खाना बनाते समय उस लोहे की कैंडी को बर्तन में डालने से भोजन में आयरन की मात्रा बढ़ जाती है। इस प्रकार, परिवार के सदस्यों को रोजमर्रा के भोजन के साथ ही आवश्यक आयरन भी मिलता रहा। यह उदाहरण साबित करता है कि पारंपरिक तरीकों और छोटे बदलावों के जरिए भी आयरन की कमी को काफी हद तक दूर किया जा सकता है। निष्कर्ष यह है कि लोहे की कढ़ाई का इस्तेमाल करना एक बेहतरीन स्वास्थ्य आदत है, बशर्ते इसे संतुलित तरीके से उपयोग किया जाए।
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