खरगोन में कपास की खेती और खरपतवार की चुनौती
मध्य प्रदेश का खरगोन जिला पूरे प्रदेश में कपास उत्पादन का बड़ा केंद्र माना जाता है। खरीफ सीजन के दौरान यहाँ करीब दो लाख हेक्टेयर से ज्यादा रकबे में बीटी कॉटन की खेती की जाती है। कपास को सफेद सोना कहा जाता है, जिसकी मांग देश और विदेशों के बाजारों में बनी रहती है। वर्तमान में कपास की फसल शुरुआती चरणों में विकसित हो रही है, लेकिन मानसून की पहली बारिश के साथ ही खेतों में खरपतवार का प्रकोप भी बढ़ गया है। यदि समय रहते इसे नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह फसल की विकास दर को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है और अंततः पैदावार में भारी गिरावट आ सकती है।
खरपतवार फसल को कैसे नुकसान पहुँचाती है
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि कपास की फसल में खरपतवार सबसे शुरुआती और घातक समस्याओं में से एक है। ये अनचाहे पौधे मिट्टी में मौजूद नमी, उर्वरक और अन्य जरूरी पोषक तत्वों को तेजी से सोख लेते हैं। इससे कपास के मुख्य पौधों को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता और उनकी बढ़त रुक जाती है। कई बार खरपतवार इतनी घनी हो जाती है कि किसानों को इसे हटाने के लिए मजदूरों पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है, जिससे खेती की लागत बढ़ जाती है।
खरपतवार नियंत्रण के पारंपरिक और असरदार उपाय
खरगोन के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ राजीव सिंह का कहना है कि खरपतवार पर नियंत्रण पाने का सबसे प्रभावी, सस्ता और टिकाऊ तरीका खेत में नियमित रूप से कुल्पा चलाना या निराई-गुड़ाई करना है। कुल्पा चलाने से न केवल अनावश्यक घास और पौधे खत्म होते हैं, बल्कि मिट्टी में हवा का संचार भी बेहतर होता है और वह भुरभुरी बनी रहती है। मिट्टी के भुरभुरे रहने से कपास के पौधों की जड़ों का विस्तार अच्छा होता है। जो किसान इन संसाधनों का उपयोग कर सकते हैं, उन्हें रासायनिक दवाओं के बजाय इन्हीं तरीकों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
रासायनिक दवाओं का सही और सुरक्षित उपयोग
कई बार श्रम की कमी या बड़े रकबे के कारण हाथों से निराई करना चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसी स्थिति में किसान खरपतवार नाशक रसायनों का सहारा ले सकते हैं। डॉ राजीव सिंह के अनुसार, कपास की फसल में चौड़ी पत्ती वाली और संकरी पत्ती वाली दोनों तरह की खरपतवार को खत्म करने के लिए पाइरीथियोबैक सोडियम 4% + क्विजालोफॉप एथिल 6% का मिश्रण काफी प्रभावी रहता है। यह दवा बाजार में सरलता से उपलब्ध है और इसका असर खरपतवार पर बहुत अच्छा होता है। हालांकि, इसे खरीदने और उपयोग करने से पहले हमेशा किसी कृषि विशेषज्ञ की राय अवश्य लेनी चाहिए।
दवा छिड़काव की सही विधि और समय
दवाइयों का पूरा लाभ उठाने के लिए सही समय और सही मात्रा का ध्यान रखना अनिवार्य है:
- मात्रा: प्रति एकड़ के लिए 500 मिली दवा की मात्रा पर्याप्त मानी जाती है।
- मिश्रण: इस दवा को 200 लीटर साफ पानी में अच्छी तरह मिलाकर घोल तैयार करें और पूरे खेत में समान रूप से छिड़काव करें।
- समय: दवा का असर तब सबसे अधिक होता है जब कपास की फसल 20 से 25 दिन की अवस्था में हो या खरपतवार की पत्तियां केवल 2 से 4 की संख्या में हों।
- नमी का महत्व: खेत में पर्याप्त नमी होने पर ही छिड़काव करना चाहिए, जिससे दवा का प्रभाव पौधों पर बेहतर तरीके से हो सके।
यदि खरपतवार काफी बड़ी हो चुकी हो, तो इन दवाओं का असर कम हो जाता है, इसलिए सही समय पर नियंत्रण करना ही एकमात्र विकल्प है।
किसानों के लिए जरूरी सावधानियां
रसायनों का उपयोग करते समय सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है। डॉ राजीव सिंह ने किसानों को सलाह दी है कि तेज हवा, बारिश के दौरान या बारिश की आशंका वाले दिनों में दवा का स्प्रे बिल्कुल न करें। स्प्रे करते समय हाथों में दस्ताने, चेहरे पर मास्क और अन्य आवश्यक सुरक्षा उपकरणों का इस्तेमाल करना चाहिए। अपनी मर्जी से दवा की मात्रा न बढ़ाएं और न ही इसे अन्य रसायनों के साथ मिलाएं। किसी भी प्रकार के रसायन का प्रयोग करने से पूर्व अपने नजदीकी कृषि विभाग या कृषि वैज्ञानिक से सलाह लेना सबसे सुरक्षित रहता है, ताकि फसल को किसी अनचाहे नुकसान से बचाया जा सके।
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