जुलाई में शुरू करें खस की खेती, आवारा पशुओं का डर नहीं और डेढ़ साल में हो जाएंगे मालामाल

अगर आपके पास बंजर या पथरीली जमीन है और आप आवारा पशुओं की समस्या से परेशान हैं, तो खस की खेती आपके लिए कमाई का बेहतरीन जरिया बन सकती है। जुलाई का महीना इसकी रोपाई के लिए सबसे उपयुक्त है और डेढ़ साल की मेहनत के बाद किसान लाखों का मुनाफा कमा सकते हैं।

खेती में नई उम्मीद: खस की खेती से बदलें अपनी तकदीर

खेती-किसानी के बदलते दौर में किसान अब ऐसी फसलों की तलाश में हैं, जिनमें लागत कम हो और मुनाफा ज्यादा। सतना सहित पूरे बघेलखंड क्षेत्र में किसान अब पारंपरिक फसलों के बजाय खस की खेती की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आपके पास ऐसी जमीन है जहाँ अन्य फसलें सफल नहीं हो पा रही हैं, या फिर आवारा पशुओं की समस्या से आप जूझ रहे हैं, तो खस की खेती एक वरदान साबित हो सकती है। यह न केवल कम पानी में उग जाती है, बल्कि इसे पशु भी नहीं खाते, जिससे सुरक्षा की चिंता खत्म हो जाती है।

जुलाई का महीना रोपाई के लिए सबसे सटीक

सतना के किसान अंशुमान सिंह ने साझा किया कि खस की खेती के लिए बीज का उपयोग नहीं किया जाता है। इसके बजाय पुराने पौधों की जड़ों से निकाले गए कल्लों को मिट्टी में रोपा जाता है। जुलाई का महीना इसके लिए सर्वोत्तम है, क्योंकि मानसून की पहली बारिश पौधों को मिट्टी में मजबूती से जमने और विकसित होने में मदद करती है। रोपाई के दौरान खेत में 2 गुणा 1 फीट की दूरी पर कतारें बनाना आवश्यक है। हालांकि शुरुआत में पौधों की देखभाल और खरपतवार की सफाई पर ध्यान देना पड़ता है, लेकिन एक बार पौधा स्थापित हो जाने के बाद यह फसल बहुत कम देखभाल मांगती है।

मिट्टी की तैयारी और उर्वरता

खस की खेती में सबसे बड़ी सावधानी यह बरतनी चाहिए कि खेत में पानी का जमाव बिल्कुल न हो। रोपाई के पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि जल निकासी की व्यवस्था उत्तम हो। मिट्टी की पोषण क्षमता बढ़ाने के लिए प्रति एकड़ 4 से 5 ट्रॉली अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद डालना अत्यंत लाभकारी होता है। इससे जड़ों का विकास बहुत तेजी से होता है और अंत में तेल की गुणवत्ता और मात्रा भी बेहतर प्राप्त होती है। बघेलखंड की रेतीली और पथरीली जमीन में भी यह फसल बहुत अच्छी तरह पनपती है। किसानों को बस शुरुआती एक से दो महीने तक खेत में उगने वाली खरपतवार पर नियंत्रण रखना चाहिए ताकि मुख्य पौधे को पर्याप्त पोषण मिल सके।

डेढ़ साल की मेहनत और बंपर कमाई

खस की फसल पूरी तरह तैयार होने में लगभग डेढ़ साल का समय लेती है। फसल की कटाई के समय सबसे पहले ऊपरी घास वाले हिस्से को अलग किया जाता है और उसके बाद बहुत सावधानी से जमीन के अंदर से जड़ों को निकाला जाता है। इन जड़ों को पानी से अच्छी तरह धोकर छाया में सुखाया जाता है। इसी सूखी जड़ से आसवन विधि के जरिए सुगंधित तेल निकाला जाता है, जिसकी अंतरराष्ट्रीय और घरेलू बाजार में भारी मांग है। यही तेल इस फसल की असली कमाई का आधार है।

लागत और मुनाफे का गणित

आर्थिक दृष्टि से देखें तो एक एकड़ जमीन में खस की खेती करने के लिए लगभग 20 हजार से 30 हजार रुपये की कुल लागत आती है। इसके मुकाबले, इसकी जड़ों से निकलने वाला तेल बाजार में 15 हजार से 25 हजार रुपये प्रति लीटर तक बिकता है। यदि फसल का प्रबंधन सही हो और पैदावार अच्छी मिले, तो एक एकड़ से किसान आराम से 1.5 लाख से 2 लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा कमा सकते हैं। यह कम लागत में बेहतर रिटर्न देने वाली फसलों की श्रेणी में आती है।

खस से कमाई के कई अतिरिक्त अवसर

खस की खेती की सबसे अच्छी बात यह है कि इससे सिर्फ तेल ही नहीं मिलता, बल्कि पूरा पौधा किसी न किसी रूप में बिकता है। तेल निकालने के बाद जो जड़ें बच जाती हैं, उनसे चटाई, कूलर के पैड और तमाम तरह की हस्तशिल्प वस्तुएं बनाई जाती हैं। इतना ही नहीं, पौधे का ऊपरी हिस्सा या सूखी घास जैविक खाद बनाने में या औषधीय उत्पादों के निर्माण में काम आती है। इस प्रकार, एक ही फसल से किसान को कई तरह की आमदनी के रास्ते मिल जाते हैं। कम पानी और कम देखभाल के साथ बंजर जमीन का सदुपयोग करने के लिए यह एक बेहतरीन विकल्प है।

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