छत्तीसगढ़ की महिलाओं का देसी स्टार्टअप: सिर्फ 20 हजार रुपये से की शुरुआत, घरेलू स्वाद के दम पर कमाया कई गुना मुनाफा

छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में महिलाओं के एक स्वयं सहायता समूह ने पारंपरिक खाद्य उत्पादों के दम पर सफलता की नई कहानी लिखी है। करीब आठ महीने पहले शुरू हुए इस लघु व्यवसाय ने अब तक हजारों रुपये का शुद्ध मुनाफा कमाया है।

ग्रामीण भारत की महिलाएं अब सिर्फ घर-परिवार की जिम्मेदारी तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि वे स्वरोजगार के नए रास्ते भी तलाश रही हैं। छत्तीसगढ़ के बालोद जिले से आत्मनिर्भरता की एक बेहद खूबसूरत तस्वीर सामने आई है। यहाँ की महिलाओं ने अपने हुनर और पारंपरिक घरेलू स्वाद को एक बेहतरीन बिजनेस मॉडल में तब्दील कर दिया है। जिले के चाहत स्व सहायता समूह की महिलाओं ने मिलकर एक देसी स्टार्टअप की नींव रखी, जो आज उनके लिए आर्थिक स्वावलंबन का एक बहुत बड़ा जरिया बन चुका है।

इस समूह की सक्रिय सदस्य लवीना साहू ने बताया कि उनकी इस मुहिम का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण संस्कृति के स्वाद को लोगों की थाली तक पहुँचाना और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना है। स्थानीय स्तर पर बने इन उत्पादों की मांग अब शहरों तक पहुँचने लगी है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी एक नई दिशा मिल रही है।

पारंपरिक स्वाद की बाजार में भारी मांग

आजकल बाजार में मिलावटी और केमिकल वाले खाद्य पदार्थों की भरमार है। ऐसे में लोग अब एक बार फिर से पारंपरिक, शुद्ध और घरेलू स्वाद की तरफ रुख कर रहे हैं। चाहत स्व सहायता समूह की महिलाओं ने इसी बात को समझा और घरेलू स्तर पर तैयार होने वाले खाद्य उत्पादों का निर्माण शुरू किया।

लवीना साहू के अनुसार, उनके समूह द्वारा तैयार किए जाने वाले मुख्य उत्पादों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • छत्तीसगढ़िया बड़ी: स्थानीय मसालों और दालों से बनी बेहद स्वादिष्ट बड़ी।
  • देसी चावल के पापड़: घर में तैयार किए गए कुरकुरे चावल के पापड़।
  • चावल के आटे का मुरकु: छत्तीसगढ़ का एक बेहद लोकप्रिय और पारंपरिक नमकीन व्यंजन।
  • विभिन्न प्रकार के अचार: पूरी तरह से पारंपरिक विधि से तैयार किए गए तीखे और चटपटे अचार।

इन सभी चीजों को बनाने में किसी भी तरह के कृत्रिम रंगों या प्रिजर्वेटिव्स का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। महिलाएं इन्हें पूरी तरह से घरेलू और पारंपरिक तरीके से हाथ से तैयार करती हैं, जिसके कारण इनकी गुणवत्ता और असली स्वाद बरकरार रहता है। यही वजह है कि बाजार में इनके उत्पादों को हाथों-हाथ लिया जा रहा है।

अचार की कई किस्में, आम और मशरूम की सबसे ज्यादा चाहत

चाहत स्व सहायता समूह की पहचान आज उनके बेहतरीन अचारों की वजह से भी बन चुकी है। समूह द्वारा मौसम और लोगों की पसंद के हिसाब से कई तरह के अचार तैयार किए जाते हैं। इनके पास अचार की एक लंबी फेहरिस्त है:

  • आम का अचार: हर घर की पहली पसंद, जिसे खास मसालों के साथ तैयार किया जाता है।
  • मशरूम का अचार: एक बेहद अनोखा और सेहतमंद विकल्प, जिसकी मांग तेजी से बढ़ रही है।
  • नींबू का अचार: पाचन के लिए बेहतरीन और पारंपरिक स्वाद से भरपूर।
  • जिमीकंद का अचार: खास क्षेत्रीय स्वाद वाला अनोखा अचार।
  • बेर का अचार: खट्टा-मीठा स्वाद देने वाला पारंपरिक अचार।

लवीना साहू ने साझा किया कि इन सभी श्रेणियों में से आम के अचार और मशरूम के अचार को ग्राहक सबसे ज्यादा पसंद कर रहे हैं। स्थानीय बाजारों के साथ-साथ विभिन्न प्रदर्शनियों और मेलों में भी इन उत्पादों को बहुत अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है, जिससे महिलाओं का हौसला लगातार बढ़ रहा है।

महज 20 हजार की पूंजी से शुरू हुआ सफर

किसी भी व्यवसाय को शुरू करने के लिए बहुत बड़े निवेश की जरूरत नहीं होती, बल्कि सही सोच और मेहनत की आवश्यकता होती है। चाहत स्व सहायता समूह ने इस बात को सच साबित कर दिखाया है। इस उद्यम की शुरुआत करीब 8 महीने पहले हुई थी। शुरुआती तौर पर महिलाओं ने केवल 20,000 रुपये की एक बेहद सीमित पूंजी लगाकर कच्चे माल और आवश्यक बर्तनों की खरीदारी की थी।

शुरुआत में उत्पादन छोटे स्तर पर था, लेकिन जैसे-जैसे लोगों को इनके हाथ के स्वाद का पता चला, मांग बढ़ती गई। धीरे-धीरे इस छोटे से घरेलू प्रयास ने एक ब्रांड का रूप ले लिया। आज आलम यह है कि महज आठ महीनों के भीतर ही इस समूह को अपनी लागत निकालने के बाद 60,000 रुपये से अधिक का मुनाफा हो चुका है। यह आंकड़ा इस बात का सबूत है कि पारंपरिक और शुद्ध चीजों की मांग बाजार में कभी कम नहीं हो सकती।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था और महिला सशक्तिकरण की नई मिसाल

इस देसी स्टार्टअप की सफलता केवल मुनाफे तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने ग्रामीण समाज की सोच को भी बदलने का काम किया है। समूह के इस सफर ने क्षेत्र की अन्य महिलाओं को भी प्रेरित किया है कि वे भी अपने घरों से बाहर निकलकर अपनी प्रतिभा को पहचानें और आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनें।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में इस तरह के जमीनी प्रयास बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। महिलाओं का कहना है कि वे इस काम को यहीं तक सीमित नहीं रखना चाहती हैं। आने वाले समय में वे न केवल अपने उत्पादों की सूची में कुछ और पारंपरिक व्यंजनों को शामिल करने वाली हैं, बल्कि वे अपने कारोबार का दायरा बढ़ाकर इसे बड़े शहरों के बड़े बाजारों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स तक ले जाने की भी योजना बना रही हैं।

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