सुप्रीम कोर्ट में एथेनॉल का मुद्दा और हकीकत
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में एथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर एक चर्चा ने देश भर में भ्रम और चिंता की स्थिति पैदा कर दी है। खबर यह फैली कि सरकार ने कोर्ट में इसे एक प्रयोग करार दिया है, जिसके नतीजे 2027 तक सामने आएंगे। सोशल मीडिया पर लोग यह सवाल उठाने लगे कि क्या आम जनता की गाड़ियों पर बिना किसी तैयारी के प्रयोग किया जा रहा है। असल में यह पूरा मामला एथेनॉल टेंडर की मात्रा से जुड़ा था, न कि पेट्रोल की गुणवत्ता या इंजन की सुरक्षा से। कर्नाटक हाईकोर्ट के एक आदेश के बाद भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (BPCL) का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा था। सरकार ने स्पष्ट किया कि एथेनॉल सप्लाई का पूरा सिस्टम 2025 तक तय हो चुका है और किसी एक डिस्टलरी का कोटा अचानक बढ़ाने से पूरी आपूर्ति श्रृंखला बिगड़ जाएगी। अटॉर्नी जनरल ने स्पष्ट किया कि नीतिगत तौर पर E-20 पर सरकार पूरी तरह प्रतिबद्ध है और इसे बदलने का कोई विचार नहीं है।
एथेनॉल पॉलिसी की नींव और शोध
एथेनॉल ब्लेंडिंग का निर्णय रातों-रात नहीं लिया गया है। भारत की तीन प्रमुख संस्थाओं—ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI), इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम और इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (R&D) ने वर्ष 2014-2015 के दौरान इस पर व्यापक शोध किया था। भारी उद्योग विभाग द्वारा वित्तपोषित इस शोध में यह पाया गया कि E-20 पेट्रोल का इस्तेमाल करने से गाड़ी की स्थिरता और ड्राइविंग अनुभव पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता। शोध के अनुसार, इंजन और इंजन ऑयल की कार्यप्रणाली भी सुरक्षित रहती है। भारत की यह नीति वैश्विक मानकों से प्रेरित है। उदाहरण के तौर पर, अमेरिका 1970 के दशक से 10% से 15% एथेनॉल ब्लेंड का उपयोग कर रहा है। ब्राजील 1930 के दशक से ही एथेनॉल के साथ जुड़ा हुआ है और आज वहां E-27 पेट्रोल मानक बन चुका है। थाईलैंड और यूरोपीय संघ में भी लंबे समय से पेट्रोल में एथेनॉल मिलाया जा रहा है।
पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर असर
सुप्रीम कोर्ट ने भी पिछले वर्ष एथेनॉल नीति को चुनौती देने वाली जनहित याचिका को खारिज करते हुए इसे ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम बताया था। इस नीति के पीछे तीन बड़े लक्ष्य थे, जिन्हें काफी हद तक हासिल किया गया है:
- कच्चे तेल का आयात: अब तक इस नीति के चलते 1.84 लाख करोड़ रुपये के विदेशी मुद्रा भंडार की बचत हुई है।
- पर्यावरण संरक्षण: कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन में 909 लाख मीट्रिक टन की भारी कमी दर्ज की गई है। यह आंकड़ा लगभग 2 करोड़ सामान्य पैसेंजर कारों द्वारा उत्सर्जित होने वाले धुएं के बराबर है।
- किसानों की आय: इस नीति के माध्यम से किसानों की आय में 1.58 लाख करोड़ रुपये की वृद्धि हुई है। इसके अलावा 302 लाख मीट्रिक टन कच्चा तेल कम आयात करना पड़ा है।
माइलेज का गणित और वैज्ञानिक कारण
नीति आयोग की जून 2021 की रिपोर्ट में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि E-20 पेट्रोल के उपयोग से माइलेज में 6 से 7% तक की कमी आ सकती है। इसके पीछे का वैज्ञानिक कारण कैलोरीफिक वैल्यू (Calorific Value) है। पेट्रोल की तुलना में एथेनॉल की ऊर्जा उत्पादन क्षमता थोड़ी कम होती है। इस कारण एक लीटर एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल जलने पर पेट्रोल के मुकाबले 6-7% कम ऊर्जा उत्पन्न करता है। यही कारण है कि माइलेज में गिरावट आती है। हालांकि, तकनीक विकसित हो रही है और मारुति सुजुकी ने 'Wagon R Bioflex' मॉडल पेश किया है, जो 4 जून को लॉन्च हुआ और इसकी डिलीवरी 17 जून से शुरू हो चुकी है। यह गाड़ी E-20 और E-85 दोनों पर चलने में सक्षम है।
दावों और भ्रामक वीडियो का सच
सोशल मीडिया पर अक्सर ऐसे वीडियो वायरल होते हैं जिनमें दावा किया जाता है कि एथेनॉल पेट्रोल के कारण इंजन खराब हो गया है या तेल परतों में अलग हो गया है। हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (HPCL) ने इन दावों को पूरी तरह खारिज किया है। कंपनी के अनुसार, एथेनॉल और पेट्रोल का मिश्रण अलग-अलग परतों में बंटने की घटना का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है और ऐसे वीडियो ईंधन की गुणवत्ता को गलत तरीके से पेश करते हैं।
बीमा दावों को लेकर स्थिति
एक और डर यह फैलाया गया था कि यदि गाड़ी में E-20 फ्यूल का उपयोग किया गया, तो बीमा कंपनियां क्लेम रिजेक्ट कर देंगी। इस पर ICICI Lombard ने स्थिति स्पष्ट की थी कि E-20 फ्यूल का उपयोग करने से मोटर इंश्योरेंस पॉलिसी अमान्य नहीं होती है। पुरानी गाड़ियों में भी इसका उपयोग करने पर कंपनी कोई आपत्ति नहीं करती है। फ्यूल के प्रकार के आधार पर क्लेम को कभी रिजेक्ट नहीं किया जाता है; क्लेम का निर्णय हमेशा दुर्घटना, चोरी या अन्य नुकसान की परिस्थितियों के आधार पर लिया जाता है। अतः वाहन मालिकों को इस बारे में किसी भी तरह की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।
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