मींडा गांव के मूर्तिकार का कमाल: ब्राजील-अफ्रीका के रत्न पत्थरों से गढ़ी जा रहीं मूर्तियां, यूरोप तक छाया हुनर

नागौर के मींडा गांव के मूर्तिकार हनुमान प्रसाद कुमावत कीमती जेम्स स्टोन पर बारीक नक्काशी कर सालाना करीब 10 लाख रुपए का कारोबार कर रहे हैं। उनकी कलाकृतियां इटली, जर्मनी, अमेरिका, जापान और चीन तक निर्यात हो रही हैं।

राजस्थान के नागौर जिले के मींडा गांव के एक मूर्तिकार ने अपनी कला के बूते देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी अलग पहचान कायम की है। मूर्तिकार हनुमान प्रसाद कुमावत बीते कई वर्षों से कीमती जेम्स स्टोन यानी रत्न पत्थरों पर बारीक नक्काशी का काम कर रहे हैं। उनके हाथों से तैयार होने वाली मूर्तियां और कलाकृतियां इटली, जर्मनी, अमेरिका, जापान और चीन जैसे देशों तक पहुंच रही हैं। इस हुनर के दम पर वे सालाना करीब 10 लाख रुपए का कारोबार कर रहे हैं।

48 वर्षीय हनुमान प्रसाद कुमावत पिछले करीब 25 वर्षों से मूर्तिकला से जुड़े हुए हैं। सीमित साधनों और आर्थिक कठिनाइयों के बीच भी उन्होंने अपने हुनर को निरंतर तराशा। मूर्तिकला की बारीकियां सीखने के लिए उन्होंने जयपुर में प्रशिक्षण लिया और कई वर्षों तक अलग-अलग हैंडीक्राफ्ट संस्थानों में काम किया। पर्याप्त अनुभव जुटाने के बाद उन्होंने अपने गांव मींडा में घर से ही यह काम शुरू किया, जो आज एक कामयाब व्यवसाय बन चुका है।

बारीक नक्काशी ने दिलाई खास पहचान

हनुमान प्रसाद की बनाई कलाकृतियों में भगवान गणेश, राधा-कृष्ण, शिवलिंग, हाथी, घोड़े, तरह-तरह के जीव-जंतु, फूल-पत्तियों की आकृतियां, सजावटी ग्लास और ज्वेलरी आइटम प्रमुख रूप से शामिल हैं। उनकी कलाकृतियों की सबसे बड़ी खूबी पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी और जीवंत डिजाइन हैं, जो देखने वालों को पहली ही नजर में अपनी ओर खींच लेते हैं। यही कारण है कि उनकी बनाई वस्तुओं की मांग देश के साथ-साथ विदेशों में भी लगातार बढ़ रही है।

कीमती रत्न पत्थरों से तैयार होती हैं कलाकृतियां

हनुमान प्रसाद ने बताया कि मूर्तियों और सजावटी वस्तुओं को बनाने में पन्ना, माणक, मूंगा और क्रिस्टल समेत कई तरह के कीमती रत्न पत्थरों का इस्तेमाल किया जाता है। ये पत्थर राजस्थान के केकड़ी और राजसमंद के अलावा ब्राजील, अफ्रीका और म्यांमार जैसे देशों से जयपुर पहुंचते हैं। पत्थरों की गुणवत्ता और किस्म के अनुसार उनकी कीमत 100 रुपए प्रति किलो से लेकर 20 हजार रुपए प्रति किलो तक होती है।

मींडा गांव में तैयार होने वाली इन कलाकृतियों को जयपुर के हैंडीक्राफ्ट शोरूमों के जरिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाया जाता है।

युवाओं के लिए रोजगार का जरिया भी बनी कला

हनुमान प्रसाद का कहना है कि यदि ग्रामीण प्रतिभाओं को सही मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और बाजार उपलब्ध कराया जाए तो वे भी वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना सकते हैं। उनकी इस पहल का एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि गांव के करीब 10 युवाओं को इससे रोजगार मिला हुआ है। ये युवा इस कला से जुड़कर अपनी आमदनी बढ़ा रहे हैं और साथ ही पारंपरिक हस्तशिल्प को नई पहचान दिलाने में भी योगदान दे रहे हैं।

हनुमान प्रसाद मानते हैं कि गांवों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, जरूरत सिर्फ सही अवसर और प्रोत्साहन की है।

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