मिथिला की सदियों पुरानी वंशावली परंपरा को सहेज रहे पूर्णिया के विद्यानंद झा, जिनमें दर्ज है पूरा इतिहास

पूर्णिया के विद्वान विद्यानंद झा उर्फ मोहन झा करीब 500 वर्ष पुरानी ताड़पत्र पांडुलिपियों का संरक्षण और डिजिटलीकरण कर रहे हैं। इस अहम कार्य के लिए जिला प्रशासन ने उन्हें सम्मानित भी किया है।

रामायण काल से चली आ रही वंशावली की परंपरा को आज भी जीवित रखने का बीड़ा पूर्णिया के विद्वान पंडित विद्यानंद झा उर्फ मोहन झा ने उठाया है। वे मिथिला की सांस्कृतिक और पारिवारिक विरासत को न सिर्फ संजो रहे हैं, बल्कि आधुनिक तकनीक की मदद से उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भी कर रहे हैं।

लाल-पीले कपड़ों में सहेजा गया मिथिला का इतिहास

मान्यता है कि भगवान राम और माता सीता के विवाह के अवसर पर वर और वधू दोनों पक्षों ने अपने-अपने पूर्वजों का परिचय दिया था और दोनों परिवारों के वंश तथा आपसी संबंधों का उल्लेख किया गया था। तभी से वंशावली साझा करने की यह परंपरा चली आ रही है।

मिथिलांचल में इस परंपरा को लिखित रूप देने का श्रेय राजा हरसिंह देव को जाता है, जिन्होंने 1316 ईस्वी में पंजी प्रथा की शुरुआत की। इसके लिए पंजीकार नियुक्त किए गए, जिन्होंने लोगों की वंशावली का लिखित अभिलेख तैयार किया। आज यही पंजी पांडुलिपियों के रूप में इतिहास की अमूल्य धरोहर बन चुकी है।

दुर्लभ ताड़पत्र पांडुलिपियों का संरक्षण

पंडित विद्यानंद झा ने इतिहास को केवल किताबों तक सीमित न रखकर उसे सदियों पुराने ताड़पत्रों में सुरक्षित किया है। वे करीब 500 वर्ष पुरानी ताड़पत्र पांडुलिपियों का संरक्षण और डिजिटलीकरण कर रहे हैं, ताकि भावी पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक और पारिवारिक विरासत से परिचित हो सकें। इस उल्लेखनीय कार्य के लिए जिला प्रशासन ने उन्हें सम्मानित भी किया है।

पूर्णिया के मैथिल टोला स्थित उनके घर में लाल, पीले और सफेद कपड़ों में लिपटी ताड़पत्र पांडुलिपियों में मिथिला का इतिहास, पारिवारिक वंशावली और सामाजिक परंपराओं का विस्तृत ब्योरा दर्ज है। कई वर्षों से वे इन दुर्लभ दस्तावेजों को सहेजने में जुटे हैं और समय के साथ यह धरोहर नष्ट न हो, इसके लिए इनका डिजिटलीकरण भी कर रहे हैं।

परिवार की 19 पीढ़ियां रहीं पंजीकार

विद्यानंद झा बताते हैं कि उनके परिवार की 19 पीढ़ियां पंजीकार का कार्य करती आई हैं। उनके पूर्वज गांव-गांव जाकर लोगों की वंशावली एकत्र करते और उसे ताड़पत्र तथा बांस के पत्रों पर लिखते थे। आज भी उनके पास करीब 500 वर्ष पुरानी कई पीढ़ियों की वंशावलियां सुरक्षित हैं।

कुछ लोगों के सहयोग से उन्होंने तिरहुता लिपि में लिखी पांडुलिपियों का हिंदी में रूपांतरण कराया और उनका डिजिटलीकरण किया। इसी आधार पर अब तक दो पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं।

आर्यभट्ट समेत कई प्रतिष्ठित परिवारों की वंशावलियां

उनका कहना है कि यदि सरकार सहयोग दे तो वे इस ऐतिहासिक धरोहर का व्यापक स्तर पर अनुवाद और डिजिटलीकरण कराना चाहते हैं, ताकि यह विरासत आने वाली पीढ़ियों तक पहुंच सके। उनके अनुसार उनके पास महान गणितज्ञ आर्यभट्ट समेत कई राजाओं और प्रतिष्ठित परिवारों की वंशावलियां भी सुरक्षित हैं।

ग्रंथों में भी पंजीकरण परंपरा का उल्लेख

विद्यानंद झा बताते हैं कि शंकराचार्य के गुरु कुमारिल भट्ट के ग्रंथों में भी पंजीकरण परंपरा का जिक्र मिलता है। वहीं वाल्मीकि रामायण में भी विवाह के समय वंशावली साझा करने की परंपरा का उल्लेख है। उन्होंने बताया कि 1316 ईस्वी में राजा हरसिंह देव ने मिथिलांचल में पंजी प्रथा को लिखित स्वरूप दिया था और तभी से उनका परिवार इस परंपरा को आगे बढ़ाता आ रहा है।

सामाजिक कार्यों में रही अहम भूमिका

मिथिला की पंजी प्रथा पर पीएचडी शोध कर चुके समाजशास्त्र के सेवानिवृत्त प्रोफेसर अभयनाथ मिश्र का कहना है कि यह अत्यंत प्राचीन और महत्वपूर्ण परंपरा है, जिसका संरक्षण जरूरी है। उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी इस परंपरा से दूर होती जा रही है, जबकि कभी विवाह जैसे सामाजिक कार्यों में इसकी अहम भूमिका हुआ करती थी।

सैकड़ों वर्ष पुरानी पांडुलिपियां

प्रोफेसर अभयनाथ मिश्र के पुत्र अजय नाथ मिश्रा ने बताया कि पूर्णिया में पंडित विद्यानंद झा और दरभंगा में पंडित हरिनंदन झा के पुत्र सतीनंदन झा के पास सैकड़ों वर्ष पुरानी पांडुलिपियां सुरक्षित हैं। उनका मानना है कि इन पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण की दिशा में सरकार द्वारा उठाया गया कदम सराहनीय है, जिससे आने वाली पीढ़ियों को मिथिला के प्राचीन इतिहास, संस्कृति और सामाजिक परंपराओं की महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकेगी।

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