सागर में बच्चे की आंखों की रोशनी जाने का मामला, CMHO ने दावों को नकारा तो पिता ने बयां किया अपना दुख

मध्य प्रदेश के सागर जिले में एक डेढ़ साल के बच्चे की आंखों की रोशनी जाने के मामले ने तूल पकड़ लिया है, जहां सीएमएचओ ने लापरवाही के आरोपों को खारिज करते हुए जांच जारी रखने की बात कही है।

सागर अस्पताल में लापरवाही का गंभीर मामला

मध्य प्रदेश के सागर जिले के बंडा सिविल अस्पताल से एक दिल दहला देने वाला मामला प्रकाश में आया है। यहाँ एक डेढ़ साल के बच्चे के इलाज के दौरान हुई कथित लापरवाही ने पूरे इलाके में हड़कंप मचा दिया है। परिजनों का आरोप है कि आंखों में जलन की शिकायत लेकर जब वे अपने मासूम बच्चे को अस्पताल लेकर पहुंचे, तो वहां तैनात स्वास्थ्य कर्मियों ने आंखों की दवा के स्थान पर नाक में डाली जाने वाली दवा बच्चे की आंखों में डाल दी। इस घटना के बाद से ही बच्चे की आंखों की रोशनी पूरी तरह से चली गई है। मामले के तूल पकड़ने के बाद अब मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी यानी CMHO का आधिकारिक बयान सामने आया है, जिसके बाद विवाद और गहरा गया है।

CMHO का सफाई भरा बयान

इस पूरे घटनाक्रम पर सागर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. देवेश पटेरिया ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। प्राथमिक जांच का हवाला देते हुए उन्होंने परिजनों के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। डॉ. पटेरिया का कहना है कि जिस ड्रॉप को लेकर हंगामा बरपा है, वह असल में नाक में डालने वाली सामान्य सलाइन यानी नमक के पानी की ड्रॉप है। उन्होंने दावा किया है कि इस प्रकार की ड्रॉप से आंखों की रोशनी जाने जैसी गंभीर स्थिति पैदा होना संभव ही नहीं है।

अपनी सफाई में डॉ. पटेरिया ने यह भी कहा कि जांच के दौरान यह तथ्य सामने आया है कि पीड़ित बच्चा जन्म से ही गंभीर कुपोषण का शिकार था। इसके अलावा, उन्होंने एक और चौंकाने वाला दावा किया कि परिजनों के पास जो दवा की शीशी मौजूद है, वह बंडा सिविल अस्पताल से जारी ही नहीं की गई थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि पूरे मामले की हर पहलू से गहन जांच की जा रही है और फिलहाल रिपोर्ट आना बाकी है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि यदि भविष्य में किसी भी डॉक्टर या अस्पताल के कर्मचारी की लापरवाही सिद्ध होती है, तो उनके विरुद्ध नियमों के तहत कठोरतम कार्रवाई की जाएगी।

पिता ने लगाए गंभीर आरोप और बयां किया दर्द

दूसरी ओर, बच्चे के पिता इंद्राज विश्वकर्मा ने स्वास्थ्य विभाग के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। उनका आरोप है कि उन पर लगातार जांच टीम के माध्यम से दबाव बनाया जा रहा है कि वे अपनी शिकायत वापस ले लें। पिता का दावा है कि उन्हें बार-बार धमकी दी जा रही है कि वे मीडिया के सामने आकर इस मामले की चर्चा न करें।

इंद्राज विश्वकर्मा ने भावुक होते हुए पूछा कि यदि उनका बच्चा जन्म से ही कुपोषित था, तो अस्पताल में ड्रॉप डाले जाने के तुरंत बाद ही उसकी आंखों की रोशनी कैसे चली गई? यह सवाल स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। उन्होंने 28 जून को ही बंडा पुलिस थाने में मामले की औपचारिक शिकायत दर्ज कराई थी और दोषियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कानूनी कार्रवाई की मांग की थी। पीड़ित पिता का कहना है कि वे न्याय के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं, क्योंकि अस्पताल की एक छोटी सी चूक ने उनके मासूम बेटे के भविष्य को अंधेरे में धकेल दिया है। फिलहाल यह मामला जांच के दायरे में है और पूरे जिले में चर्चा का केंद्र बना हुआ है।

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