इतिहास के पन्नों में दर्ज 30 जून
विमानन जगत के इतिहास में 30 जून एक ऐसी तारीख है जिसे अक्सर एक काला अध्याय माना जाता है। वर्ष 1951 से लेकर 2009 के बीच इसी विशेष दिन पर दुनिया भर में 6 बड़े विमान हादसे हुए थे, जिनमें सैकड़ों यात्रियों और क्रू मेंबर्स की जान चली गई थी। इन दुखद घटनाओं ने न केवल लोगों को प्रभावित किया, बल्कि विमानन क्षेत्र के तकनीकी और सुरक्षा मानकों में आमूलचूल बदलाव की नींव भी रखी।
हादसों के मुख्य कारण
इन 6 बड़ी दुर्घटनाओं की जांच के बाद कई गंभीर कमियां सामने आई थीं। इनमें प्रमुख रूप से निम्नलिखित कारण जिम्मेदार पाए गए:
- पायलट की मानवीय भूल यानी पायलट एरर।
- विमानों की तकनीकी खराबी या मैकेनिकल फेल्योर।
- बेहद खराब मौसम की स्थिति।
- मिलिट्री और सिविल एविएशन के बीच तालमेल की कमी।
बदलाव जिसने सुरक्षा को बनाया पुख्ता
इन हादसों के बाद पूरी दुनिया की एयरलाइंस और एविएशन रेगुलेटर्स ने मिलकर कई बड़े सुधार किए। इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य आसमान में उड़ने वाली हर फ्लाइट को पहले से अधिक सुरक्षित बनाना था। प्रमुख सुधारों में निम्नलिखित शामिल हैं:
- नेविगेशन सिस्टम को आधुनिक और बेहतर बनाया गया।
- एयर ट्रैफिक कंट्रोल यानी एटीसी की कार्यप्रणाली में सुधार किया गया।
- एफएए और अन्य संस्थाओं द्वारा वेदर ट्रेनिंग को अनिवार्य किया गया।
- फ्लाइट क्रू के लिए फटीग मैनेजमेंट यानी थकान प्रबंधन के सख्त नियम लागू किए गए।
- फ्लाइट सेफ्टी से जुड़े नियमों को वैश्विक स्तर पर और अधिक कठोर बनाया गया।
आज जो विमानन सुरक्षा तकनीक हम देखते हैं, उसका एक बड़ा हिस्सा उन सीखों का नतीजा है जो 30 जून की उन दुखद घटनाओं के बाद ली गई थीं। इन हादसों ने दुनिया को यह सिखाया कि आसमान में सुरक्षा के प्रति बरती गई जरा सी लापरवाही भी कितने बड़े संकट को जन्म दे सकती है।
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