सागर के प्रांजल तिवारी का फुटबॉल सफर: गली से नेशनल लेवल तक का रोमांचक सफर और गोल्डन बूट

सागर के रहने वाले प्रांजल तिवारी ने साधारण शुरुआत के बाद फुटबॉल की दुनिया में बड़ी सफलता हासिल की है, वे दो बार गोल्डन बूट जीत चुके हैं और अब दिल्ली के प्रतिष्ठित क्लबों में अपना दम दिखा रहे हैं।

फुटबॉल के मैदान पर चमकता सितारा प्रांजल

सागर के रहने वाले प्रांजल तिवारी आज फुटबॉल की दुनिया में एक बड़ा नाम बन चुके हैं। उनकी यह कहानी किसी प्रेरणा से कम नहीं है, जहां उन्होंने अपने घर की छोटी गलियों में दोस्तों के साथ फुटबॉल खेलना शुरू किया था। आज वही जुनून उन्हें राष्ट्रीय स्तर तक ले गया है और वे खेल की दुनिया में नित नए आयाम स्थापित कर रहे हैं। प्रांजल की मेहनत का ही परिणाम है कि वे अब दिल्ली के प्रतिष्ठित फुटबॉल क्लबों का हिस्सा हैं और खेल के दम पर उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के मशहूर हिंदू कॉलेज में स्पोर्ट्स कोटे के जरिए दाखिला लिया है।

गोल्डन बूट और नेशनल स्तर की पहचान

प्रांजल की उपलब्धियों की सूची काफी लंबी है। उन्होंने न केवल खेलो इंडिया जैसे बड़े मंच पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है, बल्कि नेशनल लेवल पर फुटबॉल के सबसे प्रतिष्ठित खिताब माने जाने वाले गोल्डन बूट को भी दो बार अपने नाम किया है। उनकी खेल यात्रा के बारे में बात करते हुए प्रांजल बताते हैं कि शुरुआत में यह केवल मनोरंजन का साधन था, लेकिन स्वीडिश मिशन स्कूल में प्रवेश के बाद खेल के प्रति उनका नजरिया बदल गया।

प्रशिक्षण और संघर्ष का सफर

स्कूल की टीम में शामिल होने के बाद प्रांजल को बेहतरीन कोचिंग और ट्रेनिंग मिली। उनकी कड़ी मेहनत रंग लाई और पहले ही साल उन्हें अंडर 14 नेशनल खेलने का मौका मिल गया। इसके बाद, मात्र 15 साल की आयु में उनका चयन अंडर 17 नेशनल टीम के लिए हो गया। इसी दौरान उन्होंने क्रिश्चियन क्लब में अपनी जगह बनाई, जो उनके फुटबॉल करियर के लिए एक बड़ा मोड़ साबित हुआ।

कोरोना काल और चंडीगढ़ का अनुभव

जब प्रांजल का करियर सही दिशा में आगे बढ़ रहा था, तभी कोरोना महामारी ने दस्तक दी। वैश्विक संकट के कारण खेल गतिविधियां ठप हो गईं और उनकी प्रैक्टिस पर भी असर पड़ा। हालांकि, प्रांजल ने हार नहीं मानी और खुद को तैयार रखने के लिए चंडीगढ़ का रुख किया। प्रांजल का मानना है कि सागर में उन्हें ग्रास रूट लेवल यानी जमीनी स्तर पर वे सुविधाएं नहीं मिल पाईं जो एक पेशेवर खिलाड़ी को चाहिए होती हैं, लेकिन चंडीगढ़ में मिली ट्रेनिंग ने उनके खेल में और अधिक निखार ला दिया है।

सागर और दिल्ली के फुटबॉल कल्चर में अंतर

प्रांजल ने सागर और दिल्ली के फुटबॉल इकोसिस्टम के बीच के अंतर को बहुत बारीकी से समझा है। उनका कहना है कि मध्य प्रदेश में यदि कोई खिलाड़ी स्टेट या नेशनल लेवल पर भी खेलता है, तो उसे मैच फीस मिलने का प्रावधान नहीं है, जो कि काफी चुनौतीपूर्ण है। इसके विपरीत दिल्ली में फुटबॉल का कल्चर पूरी तरह से पेशेवर है। वहां खिलाड़ियों के लिए अलग-अलग डिवीजन बने हैं, अच्छे खिलाड़ियों की नीलामी होती है और हर मैच के लिए बाकायदा फीस का भुगतान किया जाता है। प्रांजल का मानना है कि यदि मध्य प्रदेश और सागर में भी इसी तरह का सिस्टम विकसित हो जाए, तो स्थानीय खिलाड़ियों का उत्साह कई गुना बढ़ जाएगा और राज्य से और भी प्रतिभाएं निकलकर सामने आएंगी।

भविष्य के सपने और लक्ष्य

फिलहाल प्रांजल हिंदू कॉलेज में अपनी पढ़ाई पूरी करने के साथ-साथ दिल्ली के कई अलग-अलग क्लबों के लिए फुटबॉल टूर्नामेंट खेल रहे हैं। उनकी आंखों में भारतीय फुटबॉल टीम का प्रतिनिधित्व करने का सपना पल रहा है। वे लगातार मैदान पर पसीना बहा रहे हैं ताकि आने वाले समय में देश के लिए गौरव हासिल कर सकें। प्रांजल की यह कहानी उन सभी युवाओं के लिए एक मिसाल है जो सीमित संसाधनों के बावजूद अपने सपनों को सच करने का साहस रखते हैं।

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