दूसरे विश्व युद्ध की एक अनसुनी और रहस्यमयी कहानी
यह घटना साल 1944 की है, जब द्वितीय विश्व युद्ध अपने सबसे भयावह और निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका था। उस दौरान मित्र देशों की सेनाओं का समुद्र पर पूरी तरह से नियंत्रण स्थापित हो चुका था, जिसके कारण जर्मनी और जापान के बीच सतह के जहाजों के माध्यम से संपर्क रखना लगभग असंभव हो गया था। ऐसी विकट स्थिति में, धुरी राष्ट्रों यानी जर्मनी और जापान ने समुद्र की अथाह गहराइयों को अपना सुरक्षित मार्ग बनाने का फैसला किया। जापान ने अपनी सबसे आधुनिक और लंबी दूरी तक सफर करने वाली ट्रांसपोर्ट पनडुब्बी I-52 को एक अति गोपनीय मिशन पर समुद्र की लहरों के बीच उतार दिया। यह महज एक सैन्य मिशन नहीं था, बल्कि इसके भीतर एक ऐसा खजाना छिपा था जो आज भी दुनिया भर के इतिहास के जानकारों और खजाने की तलाश करने वालों के लिए चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
जर्मनी के लिए सोने की खेप और तकनीक की चाह
जापान को उस दौर में युद्ध के मैदान में टिके रहने के लिए जर्मनी की उन्नत युद्ध तकनीक, रडार सिस्टम और औद्योगिक मशीनरी की अत्यंत आवश्यकता थी। उस समय जापान के पास ये संसाधन उपलब्ध नहीं थे। एडोल्फ हिटलर ने इस जरूरत का फायदा उठाते हुए जापान के साथ एक गुप्त समझौता किया। इस सौदे के तहत, I-52 पनडुब्बी में लगभग दो टन शुद्ध सोना यानी 146 सोने की सिल्लियां लादी गईं, जो उस तकनीक की कीमत थी जिसे जर्मनी जापान को मुहैया कराने वाला था। इसके अलावा, पनडुब्बी में भारी मात्रा में रबर, टिन, अफीम और कुनैन जैसी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सामग्री भी भरी गई थी। 109 जापानी नौसैनिकों और तकनीकी विशेषज्ञों के साथ यह पनडुब्बी सिंगापुर से अटलांटिक महासागर की ओर बढ़ी, इस उम्मीद में कि वे किसी की नजर में आए बिना अपनी मंजिल तक पहुंच जाएंगे।
खुफिया जानकारी और समुद्र में बिछी मौत की बिसात
जापानी कमांडर इस बात से पूरी तरह अनभिज्ञ थे कि उनका यह गुप्त मिशन रवाना होने से पहले ही फेल हो चुका था। ब्रिटिश और अमेरिकी खुफिया विश्लेषकों ने जर्मनी और जापान के नौसैनिक संचार नेटवर्क को हैक करके उनके गुप्त संदेशों को डिकोड कर लिया था। अमेरिकी नौसेना को पहले से ही सटीक जानकारी थी कि I-52 कब और कहां जर्मन पनडुब्बी U-530 के साथ मिलेगी और उस पर कितना खजाना लदा है। 23 जून 1944 की तूफानी रात को जैसे ही अटलांटिक के बीच में ये दोनों पनडुब्बियां संपर्क में आईं, अमेरिकी विमानवाहक पोत USS Bogue के शिकारी विमानों ने वहां पहुंचकर हमला कर दिया। लेफ्टिनेंट कमांडर जेसी टेलर ने अपने अवेंजर विमान से अत्याधुनिक Mark 24 होमिंग टॉरपीडो दागा। पानी के नीचे रिकॉर्ड किए गए सोनार सिग्नलों में उस पनडुब्बी के डूबने और समुद्र के अत्यधिक दबाव में उसके नष्ट होने की भयानक आवाजें साफ सुनी जा सकती थीं। उस दिन 109 लोग समुद्र की गहराइयों में समा गए।
पांच दशक बाद हुई रहस्य की खोज
युद्ध के बाद दशकों तक यह पनडुब्बी एक अनसुलझा रहस्य बनी रही क्योंकि अमेरिकी नौसेना द्वारा दर्ज किए गए हमले के स्थान के कोऑर्डिनेट्स में काफी त्रुटि थी। हालांकि, 1990 के दशक में खोजी शोधकर्ता पॉल टिड्वेल ने हार नहीं मानी। उन्होंने कई देशों के मूल युद्ध दस्तावेजों, लॉगबुक्स और डायरियों को खंगाला। आधुनिक RENAV नेविगेशन तकनीक की मदद से उन्होंने पनडुब्बी के डूबने के स्थान को फिर से कैलकुलेट किया, जो आधिकारिक रिकॉर्ड से करीब 10 मील दूर निकला। आखिरकार, 2 मई 1995 को अत्याधुनिक कैमरों और सोनार की मदद से 17,000 फीट की गहराई पर यह पनडुब्बी खोज ली गई। हैरानी की बात यह थी कि समुद्र के भीषण दबाव के बावजूद वह अपनी जगह पर सीधी खड़ी थी।
क्यों नहीं निकला आज तक वो सोना?
विशेषज्ञों का मानना है कि दो टन सोने का वह भंडार आज भी I-52 के अगले हिस्से में पूरी तरह सुरक्षित है। 1995 के अभियान में उसे बाहर नहीं निकाला गया था। यह स्थान उन 109 सैनिकों की जल-समाधि बन चुका है। कानूनी उलझनों, नैतिक विवादों और गहरे समुद्र में काम करने की चुनौतियों के कारण आज तक कोई भी इस खजाने को निकालने की हिम्मत नहीं जुटा सका है। द्वितीय विश्व युद्ध की यह अधूरी कहानी आज भी अटलांटिक महासागर के सन्नाटे में दफन है।
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