टमाटर की खेती में हुए नुकसान की भरपाई तोरई से, किसान ने बताया मालामाल बनाने वाला नया तरीका

छत्तीसगढ़ के एक युवा किसान ने बरसात के मौसम में तोरई की वैज्ञानिक खेती कर शानदार मुनाफा कमाया है। मचान विधि अपनाकर उन्होंने न केवल फसलों को सड़ने से बचाया, बल्कि टमाटर के नुकसान की भरपाई भी की।

मानसून में खेती का नया फॉर्मूला

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के अंबिकापुर में युवा किसान इन दिनों खेती के क्षेत्र में अपनी मेहनत और आधुनिक सूझबूझ से नई इबारत लिख रहे हैं। खासकर बरसात के मौसम में जब अक्सर किसानों को फसलों के खराब होने का डर सताता है, तब यहां के किसान तोरई की खेती से बंपर कमाई कर रहे हैं। अनुभवी किसानों का मानना है कि मानसून के दौरान सब्जी वर्गीय फसलों में तोरई का चयन सबसे समझदारी भरा निर्णय साबित हो सकता है। यह न केवल कम लागत में तैयार हो जाती है, बल्कि बाजार में इसकी मांग और कीमत भी अच्छी रहती है।

मचान तकनीक का कमाल

इस नई खेती के बारे में जानकारी देते हुए विवेक गोस्वामी बताते हैं कि मानसून में तोरई, लौकी और करेला जैसी बेल वाली फसलों के लिए सावधानी बरतना अत्यंत आवश्यक है। उनकी सलाह है कि इन फसलों को कभी भी जमीन पर नहीं फैलने देना चाहिए। इसके बजाय बांस, खूंटे, तार और मजबूत रस्सी की सहायता से एक व्यवस्थित मचान का ढांचा तैयार करना चाहिए। जब बेलें जमीन के बजाय मचान पर ऊपर की ओर बढ़ती हैं, तो फल सीधे पानी या गीली मिट्टी के संपर्क में नहीं आते। इसका सीधा लाभ यह होता है कि फल की गुणवत्ता बनी रहती है, वह चमकदार रहता है और मंडी में खरीदार उसे हाथों-हाथ लेते हैं, जिससे किसानों को बेहतर दाम प्राप्त होते हैं।

जलभराव और बीमारियों से सुरक्षा

बरसात में सबसे बड़ी चुनौती खेत में पानी जमा होने की होती है। विवेक गोस्वामी के अनुसार, यदि बेल और फल जमीन पर पड़े रह जाएं, तो बारिश के कारण वहां जलभराव हो जाता है। इससे फल में सड़न और गलन की समस्या पैदा हो जाती है। इसके अलावा, जमीन की नमी से फंगस का प्रकोप भी बढ़ जाता है जो पूरी फसल को नष्ट करने की क्षमता रखता है। किसानों को अपने खेत में ऐसी जल निकासी प्रणाली बनानी चाहिए कि पानी पौधों की जड़ों के आसपास बिल्कुल न रुके।

ऊंची क्यारियों का महत्व

खेती के दौरान अपनाई जाने वाली एक महत्वपूर्ण तकनीक के बारे में बात करते हुए विवेक ने बताया कि पौधों की रोपाई हमेशा हल्की ऊंची क्यारियों या उठे हुए बेड पर करनी चाहिए। यह तकनीक अतिरिक्त बारिश के पानी को आसानी से बाहर निकालने में मदद करती है। जब जड़ों के पास पानी का जमाव नहीं होता, तो पौधा स्वस्थ रहता है और फंगस के हमले का जोखिम काफी कम हो जाता है।

कम निवेश और मोटा मुनाफा

तोरई की खेती का सबसे बड़ा आर्थिक लाभ इसकी कम लागत है। विवेक गोस्वामी के अनुसार, इसमें सबसे अधिक खर्च केवल मचान बनाने के लिए आवश्यक खूंटे, तार और रस्सी खरीदने में आता है। एक बार मचान तैयार हो जाने पर खाद और दवाइयों का खर्च भी अन्य फसलों की तुलना में काफी कम रहता है। कम पूंजी लगाकर अधिक उत्पादन हासिल करना इस तकनीक की बड़ी खूबी है, जिससे छोटे किसान भी आसानी से मालामाल हो सकते हैं।

टमाटर के नुकसान की भरपाई

अपने निजी अनुभव को साझा करते हुए विवेक ने बताया कि उन्होंने पहले अपने खेत में टमाटर की फसल लगाई थी, लेकिन बेमौसम ओलावृष्टि के कारण टमाटर के पौधे पूरी तरह बर्बाद हो गए थे। उस समय हार मानने के बजाय उन्होंने हिम्मत दिखाई और उसी मल्चिंग वाले बेड पर खाली पड़ी जगह में तोरई के बीज बो दिए। उनकी यह मेहनत अब रंग ला रही है और तोरई की फसल पूरी तरह तैयार होकर तुड़ाई के लिए उपलब्ध है। विवेक का स्पष्ट मानना है कि यदि किसान पारंपरिक खेती के ढर्रे को छोड़कर मचान प्रणाली और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाएं, तो वे न केवल उत्पादन बढ़ा सकते हैं बल्कि हर सीजन में शानदार लाभ भी कमा सकते हैं।

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