एक्सक्लूसिव: भारत से नजदीकी के लिए क्या पाकिस्तान को धोखा देगा तुर्की? एर्दोगान के यू-टर्न की अंदरूनी कहानी

भारत की सख्त कूटनीति और ग्रीस-साइप्रस को ब्रह्मोस मिसाइलें देने की तैयारी के बीच आर्थिक संकट से जूझ रहा तुर्की अब नई दिल्ली से रिश्ते सुधारने को बेताब है। सूत्रों के मुताबिक एर्दोगान पाकिस्तान को किनारे लगाकर भारत के बड़े बाजार से फायदा उठाना चाहते हैं।

भारत की आक्रामक कूटनीतिक चालों और ग्रीस तथा साइप्रस को ब्रह्मोस मिसाइलें सौंपने की तैयारी के सामने आखिरकार तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगान को झुकना पड़ा है। सूत्रों के हवाले से सामने आई रिपोर्ट के अनुसार, गहरे आर्थिक संकट से जूझ रहा तुर्की अब भारत के विशाल बाजार का लाभ उठाने के लिए अपने 'सदाबहार दोस्त' पाकिस्तान से किनारा करने को तैयार दिख रहा है।

पाकिस्तान के सबसे बड़े समर्थक के बदले सुर

भारत ने पाकिस्तान के सबसे करीबी हमदर्द तुर्किए की घेराबंदी इस अंदाज में की है कि वहां के बड़े नेताओं के तेवर अब नरम पड़ गए हैं और वे दोस्ती की पहल करने लगे हैं। जैसे ही भारत ने तुर्किए के कट्टर प्रतिद्वंद्वी ग्रीस और साइप्रस को अपनी अचूक ब्रह्मोस मिसाइलें देने का दांव खेला, वैसे ही तुर्किए के विदेश मंत्री ने कह दिया कि वे भी भारत के साथ हाथ मिलाना चाहते हैं।

ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि तुर्किए अब मुस्लिम भाईचारे की दुहाई भुलाकर पाकिस्तान से दूरी बना सकता है। सीएनएन-न्यूज18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति एर्दोगान ने पाकिस्तान को किनारे लगाने का मन बना लिया है।

एर्दोगान के यू-टर्न की वजह

एक्सक्लूसिव जानकारी के अनुसार, आर्थिक रूप से बेहद कमजोर और कंगाली की कगार पर खड़ा तुर्की अब भारत के बड़े बाजार से मुनाफा कमाने को बेताब है। यही कारण है कि एर्दोगान ने अपनी पुरानी नीतियों से तौबा करने का फैसला किया है। यानी अब तुर्की ने तय कर लिया है कि वह पाकिस्तान की भारत-विरोधी हरकतों में उसका साथ नहीं देगा।

विरोध से लेकर दोस्ती की अपील तक का सफर

एक समय था जब एर्दोगान हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाते थे। संयुक्त राष्ट्र (UN) से लेकर मुस्लिम देशों के संगठन (OIC) तक, उन्होंने कश्मीर के मुद्दे पर हमेशा भारत के खिलाफ रुख अपनाया और पाकिस्तान का खुलकर समर्थन किया। तुर्की ने न सिर्फ कूटनीतिक स्तर पर भारत को घेरने की कोशिश की, बल्कि पाकिस्तानी सेना को मजबूत करने के लिए अपने सबसे आधुनिक और घातक हथियार भी सौंपे। इन्हीं वजहों से दोनों देशों के संबंधों में कड़वाहट गहरा गई थी।

हालांकि 'ऑपरेशन सिंदूर' के साथ ही पूरी स्थिति बदल गई। इस ऑपरेशन के बाद जब सीमा पर तनाव चरम पर पहुंचा, तब पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ तुर्की के दिए खतरनाक लड़ाकू ड्रोन और एडवांस्ड सेंसर टेक्नोलॉजी का जमकर इस्तेमाल किया। भारत की सुरक्षा एजेंसियों ने पाकिस्तान की इस हरकत का करारा जवाब तो दिया ही, साथ ही तुर्की को भी सबक सिखाया।

भारत के कड़े रुख और आर्थिक प्रतिबंधों के डर ने तुर्की के होश उड़ा दिए। तुर्की अब अच्छी तरह समझ चुका है कि अगर उसने भारत से टकराव मोल लिया, तो वैश्विक बाजार में उसकी बची-खुची साख भी मिट्टी में मिल जाएगी।

तुर्की का नया दांव: पाकिस्तान से दूरी, भारत से नजदीकी

खुफिया रिपोर्टों के मुताबिक, तुर्की ने भारत को सीधा संदेश भेजा है कि वह नई दिल्ली के साथ अपने कूटनीतिक रिश्तों को पाकिस्तान के साथ अपने पुराने संबंधों से पूरी तरह अलग रखना चाहता है। तुर्की के अधिकारियों का कहना है कि भारत के साथ उनका कोई सीधा जमीनी या आपसी विवाद नहीं है, इसलिए वे दक्षिण एशिया के झगड़ों से खुद को दूर रखकर भारत के साथ एक व्यावहारिक और मजबूत व्यापारिक साझेदारी बनाना चाहते हैं।

साफ शब्दों में कहें तो तुर्की अब केवल अपने फायदे की सोच रहा है, भले ही इसके लिए उसे पाकिस्तान से दगाबाजी ही क्यों न करनी पड़े।

तुर्की पर भरोसा करने के मूड में नहीं भारत

तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने नई दिल्ली से सफाई देते हुए कहा है कि पाकिस्तान के साथ उनका सैन्य सहयोग केवल पुराना और रूटीन समझौता है और इसे भारत के खिलाफ दुश्मनी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। हालांकि भारतीय खुफिया और सुरक्षा एजेंसियां इस 'शांति राग' पर इतनी आसानी से यकीन करने को तैयार नहीं हैं।

भारत बखूबी जानता है कि तुर्की एक तरफ OIC में अपनी मुस्लिम नेतागिरी भी बचाए रखना चाहता है और दूसरी तरफ भारत के साथ अरबों रुपये का कारोबार भी करना चाहता है। नई दिल्ली इस समय तुर्की की हर चाल पर पैनी नजर रख रही है और ठोस बदलाव के बिना उस पर भरोसा करने की गलती कतई नहीं करेगी।

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