शांति समझौते पर मंडराता युद्ध का साया
अमेरिका और ईरान के बीच शांति बहाल करने के लिए तैयार किए गए 14 सूत्रीय समझौते पर सहमति के संकेत मिलने के बाद भी खाड़ी क्षेत्र में जंग का खतरा टला नहीं है। हालांकि अमेरिका और ईरान फिलहाल सीधी बड़ी सैन्य कार्रवाई से बचते नजर आ रहे हैं, लेकिन इजरायल इस पूरे समीकरण में एक विलेन के तौर पर उभर रहा है। इजरायल का मुख्य उद्देश्य अमेरिका और ईरान की शांति वार्ता को किसी भी हाल में सफल नहीं होने देना है, क्योंकि वह अपने सामरिक लक्ष्यों को पूरा करने से पहले युद्धविराम नहीं चाहता। यही कारण है कि बेंजामिन नेतन्याहू की सेना गाजा से लेकर लेबनान तक लगातार बमबारी कर रही है। इजरायली रक्षा मंत्री ने तो यहां तक चेतावनी दी है कि यदि ईरान ने लेबनान के समर्थन में कोई भी सैन्य कदम उठाया, तो इजरायल अगले 48 घंटे के भीतर ईरान के साथ युद्ध का एक नया मोर्चा खोल सकता है।
इजरायल क्यों बन रहा है शांति में बाधा?
एक तरफ डोनाल्ड ट्रंप यह दावा कर रहे हैं कि दोहा में ईरान के साथ बातचीत प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर ईरान ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान में अमेरिका के साथ किसी भी औपचारिक वार्ता का कोई कार्यक्रम तय नहीं है। इस जटिल स्थिति में युद्ध के दो मुख्य किरदार अलग-अलग दावे कर रहे हैं। हालांकि, तीसरा प्रमुख पक्ष इजरायल इन दावों और कूटनीतिक बैठकों से बेपरवाह होकर लेबनान पर हमले जारी रखे हुए है। यह संकट अब केवल गाजा या लेबनान तक सीमित नहीं है, बल्कि संपूर्ण मध्य पूर्व के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका है।
नेतन्याहू के आगे ट्रंप की डिप्लोमेसी कितनी कारगर?
सवाल यह उठता है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप की कूटनीति इजरायल की आक्रामक मिसाइल नीति के सामने पूरी तरह विफल हो रही है? क्या ईरान को वार्ता की मेज पर लाने के लिए उस पर अत्यधिक दबाव बनाया जा रहा है? यदि ईरान लेबनान के पक्ष में खुलकर आता है, तो मध्य पूर्व में एक महायुद्ध छिड़ने की प्रबल संभावना है। रविवार को ईरान के शीर्ष राजनयिक ने स्पष्ट किया कि उनका देश होर्मुज जलडमरूमध्य यानी Strait of Hormuz के संचालन और निगरानी का काम खुद संभालेगा। उन्होंने इस मामले में किसी भी बाहरी हस्तक्षेप के खिलाफ कड़ी चेतावनी जारी की है।
ईरान की ओर से चेतावनी और भविष्य की चुनौतियां
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने बगदाद की अपनी यात्रा के दौरान इराकी विदेश मंत्री फुआद हुसैन से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने कहा कि इस मामले में किसी भी तरह का हस्तक्षेप या ईरान द्वारा किए जा रहे सुरक्षा इंतजामों में बदलाव करने की कोशिश केवल मुश्किलें और बढ़ाएगी। उन्होंने चेताया कि इससे होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने की प्रक्रिया में बाधा आएगी और तनाव और अधिक बढ़ेगा, जैसा कि हाल ही में वहां हुई घटनाओं के बाद देखा गया है। ईरान ने रविवार को बहरीन और कुवैत को निशाना बनाकर ड्रोन और मिसाइल हमले किए। ईरान का कहना है कि यह हमला इस्लामिक रिपब्लिक पर हुए अमेरिकी हवाई हमलों का जवाब था। ईरान ने यह भी धमकी दी कि यदि अमेरिकी हमले जारी रहे, तो शांति वार्ता हमेशा के लिए बंद हो सकती है। ईरान का दावा है कि फारस की खाड़ी के इस महत्वपूर्ण मुहाने पर केवल उसका नियंत्रण होना चाहिए, जहां से दुनिया का पांचवां हिस्सा तेल और प्राकृतिक गैस व्यापार होता है।
शांति समझौते के सामने खड़े गंभीर संकट
अमेरिका और ईरान के बीच अभी भी अंतरिम शांति समझौते की शर्तों पर बातचीत जारी है। इसमें फारस की खाड़ी से जहाजों की आवाजाही, अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने और ईरान के अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम भंडार के भविष्य जैसे संवेदनशील मुद्दे शामिल हैं। इस महीने की शुरुआत में हुए सहमति पत्र यानी Memorandum of Understanding के तहत दोनों देशों को इन विवरणों को अंतिम रूप देने के लिए 60 दिनों का समय मिला है। हालांकि, मौजूदा हमलों और सैन्य गतिविधियों ने इस समझौते के विफल होने का खतरा पैदा कर दिया है।
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